Friday, June 27, 2014

बुरा जो देखन मैं चला


दूसरों के दोष देखने से हमारा स्वयं का दोष दृढ हो जाता है क्योंकि हम अन्यों में दोष तभी देख सकते हैं जब वे पहले हम में हों. भक्ति करने की पहली शर्त है कि अंतकरण  शुद्ध हो, मन निर्मल हो. यह जगत ईश्वर का बनाया है, इसलिए कि हम अपने शरीर को रख सकें, शरीर के उपयोग के लिए यह बना है न कि उपभोग के लिए. हम इसमें आनन्द ढूँढ़ रहे हैं, इन भौतिक वस्तुओं में आनंद नहीं है, बल्कि इसके पीछे छिपे चैतन्य में आनन्द है. जैसे पारस यदि डिबिया में बंद हो तो वह लोहे को सोने में नहीं बदल सकता. सबके भीतर चैतन्य छिपा है उसे उजागर करना है. यहाँ कोई भी दोषी नहीं है, सभी एक नाटक का पात्र बने हुए अपना अपने रोल निभा रहे हैं. हम कई जन्मों में यह ज्ञान सुन चुके हैं पर हृदय में धारण नहीं कर पाए. कभी बौद्धिक व्यायाम के लिए, कभी यश के लिए, कभी दिखावे के लिए हम आज तक भक्ति करते आये हैं. 

Thursday, June 26, 2014

वही नूर झलके सबमें

दिसम्बर २००६ 
जीवन में यदि योग हो, ईश्वर की लगन हो, सद्गुरु का अनुग्रह हो और मन में समता हो तो परमात्मा को प्रकट होने में देर नहीं लगती, वह तत्क्ष्ण प्रकट हो जाता है. प्रभु का स्मरण यदि स्वतः ही होता हो, मन उसके बिना स्वयं को असहाय अनुभव करता हो, वैराग्य सहज हो जाये तो हमारी पात्रता के अनुसार ईश्वर प्रकट हो जाता है. जो विराट है इतने बड़े ब्रम्हाण्ड का मालिक है, वह एक साधक के छोटे से उर में प्रकट हो जाता है. भक्ति विराट को लघु, असीम को ससीम बनाने में सक्षम है और लघु को विराट व ससीम को असीम बनाने में भी. ऐसी भक्ति ही साधक का ध्येय है, साध्य है. देह और बुद्धि की सार्थकता इसी में है कि इसमें चैतन्य प्रकटे. सजगता साधना की पहली और अंतिम सीढ़ी है, बिना सजग रहे हम कहीं नहीं पहुंच सकते.


Wednesday, June 25, 2014

भोले भाव मिले गोपाला

अगस्त २००६ 
हमारा अंतर्जगत अति विशाल व सूक्ष्म है और उसमें प्रतिपल कितना कुछ घटता रहता है. इसका मूल तत्व मन नहीं भाव है, भाव की संवेदना बहुत दूर तक जाती है, जहां मन नहीं पहुँचता, बुद्धि नहीं पहुंचती, वहाँ भाव के सूक्ष्म कण पहुंच जाते हैं. मन व बुद्धि भी अंतर्भाव से प्रभावित होते हैं, अतः इसकी शुद्धि का सदा ध्यान रखना होगा. भीतर की यात्रा पर जब साधक जाता है तो उसे विचारों के पार भावों के सूक्ष्म लोक में प्रवेश करना होता है. भाव धारा को बदले बिना विचार धारा बदली नहीं जा सकती और विचारों पर ही कर्म आधारित हैं, तथा कर्मों पर हमारा भविष्य, अतः भाव शुद्धि के बिना हम सुखद भविष्य की आशा नहीं रख सकते. 

Tuesday, June 24, 2014

दिप दिप जलती ज्योति भीतर

जुलाई २००६ 
सबसे कीमती वस्तु इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड में एक ही है और वह है परम चेतना और वह चेतना इस सृष्टि के कण-कण में समायी है, जिसने इस सृष्टि का निर्माण किया है, जो इसके नियम चला रही है, जिसने ये नियम बनाये, जो स्वयं भी उन्ही का रूप हो गयी, उसी में समा गयी, वही जानने योग्य है वह चेतना अविनाशी है. जो चेतना हम भीतर अनुभव करते हैं उसी का अंश है. हमारा मन उसी से बना है, पर जानता नहीं और कल्पनाओं में डूबा रहता है. जीवन में उत्सव तभी हो सकता है जब इस सत्य का अनुभव हो जाये.


Monday, June 23, 2014

जीवन नया बनाया उसने

जुलाई २००६ 
सद्गुरु जीवन में एक क्रांति ला देते हैं, हमारी पुरानी सारी मान्यताओं को छुड़ाकर हमें नया बना देते हैं. साधना के पथ पर चलते हुए हम नये से हो जाते हैं और प्रतिक्षण बढ़ते रहते हैं. हमारे भीतर की जड़ता समाप्त हो जाती है. हम आत्मा में रहें तभी वृद्धि को प्राप्त होते हैं, मन तो जड़ है, वह सिकुड़ना जानता है, मन रक्षात्मक है, आत्मा प्रेमात्मक है, वह विस्तार को प्राप्त होती है.


Saturday, June 21, 2014

मूल को जिसने जाना है

जुलाई २००६ 
हमारा ध्यान मूल पर नहीं जाता, पदार्थ पर जाता है, चेतना भीतर जल रही है, उस पर ध्यान जाने से ही सारी समस्याएँ समाप्त हो सकती हैं. चेतना की मलिनता और शुद्धि पर ध्यान नहीं जाने से ही हम परेशान रहते हैं, बाहर अनेक समस्याएं हैं पर सबसे बड़ी समस्या भीतर की है. हम प्रतिबिम्बों के पीछे भागते हैं, परछाईं पर हमारा ध्यान है जिसकी वह परछाई है वह सुधर जाये तभी परछाई सुधर सकती है. वस्तुएं हमें सुविधा तो दे सकती हैं सुख नहीं, सुख भीतर से आता है. हमारे भीतर जो उलझन है वह इसलिए कि हमें अपने मूल तक पहुंचना नहीं आता, हम छोटे से समाधान को समग्र मानकर भ्रान्ति में फंस जाते हैं. चेतना का विकास ही हमारे जीवन को पूर्णता प्रदान कर सकता है. 

Wednesday, June 18, 2014

भक्ति का जब दीप जलेगा

जुलाई २००६
ब्रह्म साकार भी है निराकार भी, वह परमात्मा के रूप में हमारे हृदयों में रहता है. हमारे मन का आधार भी वही है. मन जब कृष्ण समाहित होता है तो वह भीतर-बाहर उसे ही देखता है. मन के पार दोनों एक ही हैं. पर साधक यहीं आकर ठहर नहीं जाता, इसके बाद भक्ति के फूल खिलाता है. भक्ति के बाद ही जीवन में रस मिलता है, आनन्द प्रकट होता है, उल्लास प्रकटता है. उसकी व्यापकता का, भव्यता का ज्ञान होने के बाद ही भीतर कृतज्ञता का भाव उमड़ता है. धन्यभागी होने का भाव जगता है और तब जीवन में पूर्णता आती है. इस अनंत ब्रह्मांड को जो संकल्प रूप से रचते हैं वह परमात्मा हमारे आराध्य हैं यह भाव जगते ही मन प्रेम से झुक जाता है.