Wednesday, February 22, 2017

स्वयं के निकट देह से दूर

२२ फरवरी २०१७ 
उपवास का वास्तविक अर्थ है स्वयं के निकट निवास करना, अर्थात देह से पृथक भीतर की चेतना के निकट वास करना. जब साधक अपने पास रहने की कला सीखना चाहता है तो ध्यान के द्वारा प्रसाद रूप में पाया उपवास इसमें सहायक है. भीतर यह भान होने लगता है  कि भूख देह को लगती है आत्मा इसे देखने वाला साक्षी मात्र है, भोजन आवश्यक है पर इसके प्रति आसक्ति आवश्यक नहीं है. साधक जब उपवास को सही अर्थों में समझने के बाद ही इसे करने का व्रत लेता है तो स्वयं को आत्मा के निकट सहज ही  पाता है. स्वयं का होना ही उसे पर्याप्त लगता है. जब देह का स्मरण ही नहीं आता तब ही सच्चा उपवास घटता है. मन में तरह-तरह के व्यंजनों को खाने की इच्छा हो और उपवास के नाम पर उनका सेवन हो तो आत्मा से दूरी बढ़ जाएगी और मन देह में ही वास करेगा. 

Saturday, February 11, 2017

लय और ताल सधे जीवन में

११ फरवरी २०१७ 
प्रकृति के हर काम में एक लय झलकती है. दिन-रात के होने और ऋतु परिवर्तन के अनुसार मन के भी मौसम होते हैं। उन्हें समझकर जो उनके अनुरूप स्वयं को ढाल लेता है, वह स्वस्थ रह सकता है। प्रातःकाल मन शांत होता है, उस समय का उपयोग स्वाध्याय व साधना में लगे तो दिन भर ताजगी रहेगी. जीवन में संगीत तभी प्रकटेगा जब एक लय हमारे मन, वचन तथा कर्मों में होगी। नियत समय पर नियत कार्य होते रहें तो  मन देह से ऊपर जा सकता है, अन्यथा सामान्य जीवन से परे भी एक अलौकिक जीवन है, इसकी ओर दृष्टि ही नहीं जाती।

Wednesday, February 8, 2017

मृत्यु जीवन का सच है

८ फरवरी २०१७ 
संत कहते हैं मन में सदा मृत्यु का स्मरण रखना चाहिए, मृत्यु किसी भी पल हमें अपना ग्रास बना सकती है. वह हमारे दो कदम पीछे ही चल रही है साथ-साथ. वास्तव में हर पल हम अपनी मृत्यु के लिए मार्ग बना रहे हैं., हर नया दिन मृत्यु को और करीब ले आता है. हम इस सबसे अनभिज्ञ ऐसे जिए चले जाते हैं जैसे सदा ही बने रहेंगे. जीवन की भव्यता से भी परिचित नहीं पाते, यदि किसी को यह पता चल जाये कि कल उसे मरना है तो वह आज को किस शिद्दत से न जियेगा. संत ऐसे ही जीते हैं हर पल को गहराई से महसूस करते हुए, कुदरत के नजरों को देख निहाल होते हुए और मन को सदा हल्का और खाली रखते हुए. इसका अर्थ हुआ मृत्यु ही जीवन को सुंदर बनाती है.

Monday, February 6, 2017

जीवन बने सात्विक सबका

७ फरवरी २०१७ 
सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों से सारी प्रकृति आच्छादित है. सत्व गुण प्रकाश, सुख  और ज्ञान को बढ़ाता है. रज हमें क्रियाशील बनाता है और तम निद्रा और जड़ता का कारण है. हमारा जीवन तभी सुंदर होगा जब रज और तम ये दोनों गुण संतुलित मात्रा में हों. आज समाज में जो दुःख और विषाद छाया है, उसका कारण तमस की अधिकता है. बच्चे और युवा रजस की अधिकता से पीड़ित हैं, वे शांत बैठना नहीं चाहते, नींद का समय खिसकते-खिसकते आधी रात तक चला गया है. आधुनिक गैजेट्स उनके मस्तिष्क को उत्तेजित किये रहते हैं. सत्व की अधिकता होने पर व्यक्ति मुक्ति की ओर सहज ही कदम बढ़ाता है और सत्व की कमी होने पर रोगों का शिकार हो जाता है. अब प्रश्न यह उठता है कि सत्व को कैसे बढ़ाएं, सात्विक भोजन, सात्विक दिनचर्या अर्थात योग साधना से दिन का आरम्भ, नियमित स्वाध्याय, जीवन में अनुशासन, ध्यान का अभ्यास आदि सत्व गुण को पोषित करते हैं. देह स्वस्थ हो, मन शांत हो और बुद्धि तीक्ष्ण हो यह कौन नहीं चाहता, इसके लिए आवश्यक है कि रज और तम को धीरे-धीरे कम करते जाएँ.

सरल अति हो जीवन अपना

६ फरवरी २०१७ 
मानव के शरीर में हर क्षण कुछ न कुछ घट रहा है. श्वास का आना-जाना कितना सहज है पर इसके पीछे का विज्ञान कितना जटिल है. इसी तरह इस विशाल प्रकृति में पल-पल कितना कुछ घट रहा है, इसे जानना सबके वश में नहीं है पर इन सबके साथ एक मैत्री भाव का अनुभव करना, इन्हें अपना जानना हर किसी के हाथ में है. जीवन तब सरल हो जाता है, जब सारा संसार अपना घर लगता है, पर ऐसी स्थिति तक पहुंचने के लिए अपने  छोटे से  घर से ममता का त्याग करना होगा, अंतर को इतना विशाल बनाने के लिए लघु से मोह को तो छोड़ना ही होगा. अहंकार के लिए तब कोई काम नहीं बचेगा, क्योंकि अपना कहने जैसा तब कुछ भी नहीं होगा, सृष्टि जितनी अपनी है उतनी ही हर किसी की, सहजता और सरलता तब जीवन के सूत्र बन जायेंगे. 

Thursday, February 2, 2017

एक विशाल गगन भीतर है

३ फरवरी २०१७ 
प्रकृति में निरंतर एक संगीत गूंज रहा है, हम अपने मन में चल रहे शोर के कारण उसे सुन न पायें वह बात अलग है. सत्य एक शून्य की भांति, आकाश की भांति चारों ओर फैला हुआ है, हम उसे स्पर्श नहीं कर पाते न ही देख पाते हैं, दोनों का आयाम ही अलग है. दोनों के गुण धर्म ही अलग हैं, जब तक कोई देह और मन के पार की झलक नहीं पा लेता तब तक उसके जीवन में प्रकाश नहीं उतरता.  

सुख-दुःख दोनों रचना मन की

२ फरवरी २०१७ 
स्वयं को जाने बिना हम यह उम्मीद करते हैं कि दूसरे हमें जानें, स्वयं को समझे बिना हम दूसरों को समझने की कोशिश करते हैं. दोनों ही बार निराशा ही मिलने वाली है. इस दुनिया में हमें जो कुछ दिखाई दे रहा है वह स्वयं के दर्पण पर प्रतिबिम्बित होकर ही दिखाई दे सकता है. स्वयं में यदि कहीं कोई उलझाव है तो प्रतिबिम्ब भी स्पष्ट नहीं बन सकता. साधना का एकमात्र उद्देश्य यही है कि हम स्वयं को भीतर बाहर अच्छी तरह परख लें. किस बात से हम दुःख बनाते हैं और किस बात से सुख, सुख-दुःख का निर्माता हमारा स्वयं का मन ही है, यह बात जब अनुभव के तौर पर नजर आने लगती है तो तत्क्षण हम दुःख के पार हो जाते हैं.