सद्ग्रन्थों का अध्ययन हमें उन्नत करता है. सद्विचार हमारे मन को महकाते हैं. भावों के गुलाब जब हृदय के बगीचे में खिलते हैं तो आसपास सब कुछ महकने लगता है. चेहरे पर मुस्कुराहट हो और आँखों से ही अपनी बात कहने की कला आ जाये, वाणी खामोश हो और मन का चितन भी शांत हो. न बाहर से शब्दों को ग्रहण करें और न ही भीतर से सम्प्रेषण ...गहन मौन में ही परम सत्ता का वास है.
Saturday, January 7, 2012
Thursday, January 5, 2012
कृतज्ञता ही भक्ति है
परमात्मा हमें हर पल दे रहा है. उसके प्रति कृतज्ञता तो हमें जाहिर करनी ही चाहिए, अन्यथा हम केवल उनसे लेते ही लेते रहेंगे. उसके नाम का स्मरण और उच्चारण करने से भी यह कृतज्ञता व्यक्त हो सकती है, उस समय हम उसी के सान्निध्य में होते हैं. क्योंकि ईश्वर और उसका नाम एक ही हैं. सच्ची प्रार्थना भी वही है जिसमें यही चाह हो कि मन में निज स्वार्थ की कोई चाह न उठे. उसके प्रति प्रेम मन में बढ़ता रहे और बढ़ते-बढ़ते इतना विशाल रूप ले ले कि सभी प्राणी उसकी गिरफ्त में आ जाएँ. जब सारे प्राणियों के अंतर में वही परम पिता दिखाई देने लगें. तभी समझना चाहिए कि भक्ति का उदय हृदय में हुआ है.
ज्ञान की ज्योति
परम का ज्ञान हमारे जीवन की नौका का लंगर खोल कर उसे दिशा प्रदान करता है. कर्मों को शुद्ध करता है. हृदय में सत्य के प्रति प्रेम हो और अधरों पर भक्ति के नगमे तो दुनिया कितनी हसीन हो जाती है. स्वयं को भुला दें अहं त्याग दें तो अपना आप कितना हल्का लगता है. अहं ही तो हमें भारी बनाता है वरना तो हम फूल से भी हल्के हैं. उसने हमारी सारी आवश्कताओं की व्यवस्था पहले से ही कर द है. वह हर क्षण हम पर नजर रखे हुए है. हम ‘मैं’ की रट लगा कर व्यर्थ ही खुद को विषाद में डाल लेते हैं. यह दुनिया भी तो उसी की है. अन्यों के दोषों पर निगाह नहीं जाती जब सारे अपने ही लगते हैं. एक बार जहाँ उजाला हो जाये वहाँ अंधकार कैसे टिक सकता है.
Tuesday, January 3, 2012
पूरा प्रभु आराधिये
सितम्बर २००२
आकाश पर कभी घने बादल छा जाते हैं, रिमझिम फुहार और ठंडी हवा के झोंके तन-मन को सिहरा देते हैं. कभी चमचमाती हुई तेज धूप सारे माहौल को रोशन कर देती है. ऐसे ही जीवन भी हर पल रंग बदलता है. कभी मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं फिर साक्षी भाव से देखते रहें तो चुपचाप चली भी जाती हैं. ऐसे ही सुख भी आता है तो टिकता थोड़े न है, चला जाता है. हम वहीं के वहीं रह जाते हैं, अपने आप में पूर्ण, न तकलीफ आने से हमारा कुछ घटता है न सुख आने से कुछ बढ़ता है. मान हो तब भी कुछ नहीं बढ़ता अपमान हो तब भी कुछ नहीं घटता. हम पूरे हैं पूरे ही रहते हैं हर क्षण, उस पूर्ण परमात्मा की तरह.
Monday, January 2, 2012
तन्मयता (एकाग्रता)
अगस्त २००२
जीवन के एक पक्ष में जब तन्मयता आती है तो उसका प्रभाव अन्य पक्षों पर पड़ना स्वभाविक है. लिखना तभी संभव है जब मन किसी एक विचार पर टिके. जब कोई उद्देश्य लेकर हम काम करते हैं तो मन को एक आधार मिल जाता है, तन को नियम. आत्मा को उसकी पहचान मिलने का सिलसिला शुरू हो जाता है. हम पहले से कहीं ज्यादा खुश रहते हैं, ज्यादा स्पष्ट सोच सकते हैं. वस्तुओं को उनके वास्तविक रूप में देखने लगते हैं. अन्यों के प्रति हमारा व्यवहार अधिक स्नेहपूर्ण हो जाता है. क्रोध अजनबी हो जाता है. ज्ञान भीतर टिकने लगता है. इस सब के पीछे परम की अहैतुकी कृपा ही एक मात्र कारण है ऐसा कृतज्ञता का भाव भी जन्म लेता है. धर्म के सिद्धांत जो पहले मात्र पढ़ने की वस्तु थे, जीवन में उतरने लगते हैं. धर्म वही तो है जो धारण किया जाये. प्रेम का अविरल स्रोत हमारे भीतर है, वह सूखने न पाए इसके लिये भी तन्मयता जरूरी है.
आत्मिक स्तर कितना सुंदर
अगस्त २००२
हमारी यह देह हमें (आत्मा को) मिला हुआ एक साधन है साध्य नहीं, उसकी देख-रेख करना, नियमों के पालन द्वारा व्याधियों से मुक्त रखना हमारा कर्त्तव्य है. भौतिक स्तर पर किया हुआ कोई भी कार्य जो देह, मन बुद्धि द्वारा संचालित होता है, पूर्ण होने पर ही हमें इच्छित फल देता है. पर आत्मिक स्तर पर किया सूक्ष्म से सूक्ष्म कार्य भी हमें उसी क्षण फल देता है. सात्विक आनंद की प्राप्ति कराता है, हृदय की सौम्यता को बढ़ाता है. अंतर में एक गहन नीरवता को जन्म देता है, जिसे कोई बाहरी शोर भंग नहीं कर सकता. हमारा मन ठहर जाता है और विश्रांति का अनुभव करता है. विश्रांति सामर्थ्य को जन्म देती है, फिर हम अपने नियत कर्मों को उत्साह से कर सकते हैं, शिथिलता नहीं आती, सजग रहते हैं. मन में व्यर्थ के संकल्प-विकल्प भी नहीं उठते. भीतर निर्भयता का जन्म होता है. आध्यात्मिक स्तर पर की गयी थोड़ी सी प्रगति भी हमें उस परम सत्य के निकट ले जाती है, जिस तक जाने अनजाने सभी को पहुंचना है. जीवन में समय सीमित है, हर क्षण कीमती है, जो भी हमारा कर्त्तव्य हो उसे आत्मिक स्तर पर रहते हुए करना होगा तब हमारे सभी कार्य परम की ओर ले जाने वाले होंगे. कोई सदगुरु कोई संत हमारी उतनी ही मदद कर सकते हैं कि पहला कदम उठाने की प्रेरणा दें, उससे आगे तो हमें खुद ही चलना होगा.
Sunday, January 1, 2012
बहो बस बहो
अगस्त २००२
जीवन में ताजगी चाहिए तो जो कुछ हमें मिला है उसे बाँटना चाहिए. तितलियाँ, फूल, खुशबू और प्रेम को तिजोरी में नहीं रख सकते. बहता हुआ पानी ही स्वच्छ रहता है. हवा एक तरफ से प्रवेश करे और दूसरी तरफ से निकलने की भी व्यवस्था हो तो सब कुछ ताजा रहेगा. स्वार्थ वश जब वस्तुओं को हम मात्र अपने लिये चाहते हैं तो स्वयं को भी बंधन में बांध लेते हैं और मुक्त भाव से जीना भी भूल जाते हैं. जबकि हमारा मूल स्वभाव यह नहीं है और इसी लिये हम बेचैन हो जाते हैं, फिर उस बेचैनी को दूर करने के लिये हम और संग्रह करते हैं और यह दुष्चक्र चलता ही रहता है. न जाने कब जीवन की शाम आ जाये, आत्मज्ञान ही हमें इस अंधी दौड़ से मुक्त कर सकता है.
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