Monday, January 16, 2012

श्रद्धावान लभते ज्ञानम


अक्तूबर २००२ 
मन श्रद्धा से भरा हो तभी विश्वास भी टिकता है. वही विश्वास हमें कैसी भी परिस्थिति में डिगने नहीं देता. परमात्मा अथवा सदगुरु का स्मरण भी हृदय को कैसी शीतलता पहुंचाता है. वे साक्षी भाव में रहते हुए जगत को देखते हैं, उससे लिप्त नहीं होते. उन्हें कोई कामना नहीं सताती और न किसी वस्तु के खो जाने का भय रहता है. आत्मा से बढ़कर वे किसी को नही जानते और आत्मा को न खोया जा सकता है न पाया जा सकता है, उसकी मात्र प्रतीति की जा सकती है, जीवनमुक्त आत्म भाव में रहकर सहजता का जीवन जीते हैं. वे हमें भी उसी पथ पर चलने की प्रेरणा देते हैं.

Sunday, January 15, 2012

ऐसी बानी बोलिए




साधना में वाणी के संयम पर बहुत बल दिया गया है. वाणी सत्य तो हो ही, प्रिय और हितकारी भी हो, शांति प्रदान करने वाली हो. स्वल्प निंदा भी हमें पथ से भटका सकती है. कड़वाहट यदि बाहर आ  रही है तो इसका अर्थ है कि भीतर अभी कड़वाहट शेष है, जब भीतर उस परमात्मा को बैठाया है तो विकारों को आश्रय देना छोड़ना होगा. कल्याणमयी वाणी, प्रसन्न वदन, शक्ति और शांति से भरा मन ये इस पथ पर हमारे सहायक हैं. मुख से वचन तभी निकलें जब आवश्यक हों व उस वक्त मन, आत्मा व वाणी एक हों भीतर बाहर एक, क्योंकि वह परम तो हर जगह है जितना बाहर उतना ही भीतर भी. हमारे चारों ओर का वातावरण वाणी से ही सजाया जा सकता है, अन्यथा मौन ही सधे.

Thursday, January 12, 2012

विश्वास ज्योति है


सितम्बर २००२ 
जो परमात्मा का प्रिय भक्त होता है वह अपने अंतर में विश्वास की ज्योति जला कर रखता है, उसी की लौ के सहारे-सहारे वह अंदर बाहर दोनों ही जगह उजाला पाता है. विश्वास तभी गहरा होता है जब अनुभूति हो जाये अनुभव साधना से ही आता है, अनुभव के बाद कृतज्ञता से मन भर जाता है, और हम जीवन निश्चिंत होकर एक-एक क्षण का आनंद लेते हुए जीते हैं. साधना की अग्नि में तपकर ही हम अपनी सम्भावनाओं को तलाश सकते हैं. देह और मन हमें साधन रूप में मिले हैं, जिन्हें स्वस्थ रखना हमारा कर्तव्य है, ताकि आत्मा स्वयं को प्रकाशित कर सके, वही तो परमात्मा का प्रतिबिम्ब है जो मन के दर्पण में झलकना चाहता है. 

Wednesday, January 11, 2012

कृपणता


सितम्बर २००२ 

हमारी कथनी और करनी में कितना अंतर होता है, इसका पता तब चलता है जब कोई हमसे मदद मांगता है, हम तत्क्षण मदद करने के बजाय सोच-विचार शुरू कर देते हैं. मन जो सदा हानि-लाभ की बात सोचता है, कैसे कैसे तर्क देने लगता है. मन की पकड़ का कोई अंत नहीं. और ऐसे में यदि कोई हमें ऐसी ही सलाह देता है जो हमारी बात का समर्थन करती हो तो हम फौरन उससे राजी हो जाते हैं. धर्म की ऊपरी सतह पर ही हम पहुँच पाते हैं, स्वयं को कष्ट पहुँचे फिर भी यदि किसी के माँगने पर झट हाँ ही निकले तो ही हमने धर्म का मर्म जाना है. ईश्वर हमें हर क्षण दे रहा है, तो हम क्यों कृपण बनें.

Tuesday, January 10, 2012

निर्विकार साक्षी


सितम्बर २००२ 
ईश्वर पुरातन है, आदि है, अनादि है, शाश्वत है और अनंत है. सारी सृष्टि का वही अध्यक्ष है, वह कण-कण में व्याप्त है. हमें अपने अंदर उसकी उपस्थिति का अहसास करना है. उसको अपने जीवन का केन्द्र बना लें तो जीवन शांतिमय, सुखमय और रसमय हो जाता है. पानी जैसे तापमान के बदलने पर अपनी अवस्था बदलता रहता है वैसे ही हमारा मन बाहरी परिस्थितियों के बदलने पर बदलता रहता है, लेकिन इसको देखने वाला निर्विकार रहता है. जो अचल है, शुद्ध है, नित्य है, पूर्ण ज्ञान, पूर्ण प्रेम व पूर्ण आनंद है. हम हर क्षण किसी न किसी कर्म में रत हुए इसका अनुभव नहीं कर पाते. कर्मों के बंधन को तोड़ने के लिये हमें कर्म फल में आसक्ति का त्याग करना होगा. तब हमें लाभ-हानि की चिंता नहीं होगी. कोई कामना या वासना पूर्ति हमारे कर्मों का उद्देश्य नहीं रहता. वैराग्य यदि हममें दिखाई दे तो मानना चाहिए कि भक्ति का उदय हो रहा है. निष्काम भक्ति से ही भीतर ज्ञान प्रकट होता है.

Monday, January 9, 2012

चेतना जगानी है


सितम्बर २००२ 
हम चेतन हैं, पर जड़ की ओर हमारा झुकाव है. जब हम अपनी चेतना को परम चेतना के साथ जोड़ते हैं तो सारे कर्म योगमय हो जाते हैं, अन्यथा कर्म बंधन में डालते हैं. कृष्ण कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति को न कुछ पाने की तृष्णा सताती है न कुछ खोने का भय, न उससे किसी को भय होता है न उसे ही किसी से भय रहता है. तब तो सारी सृष्टि हमें मित्रवत ही प्रतीत होगी. जहाँ कहीं भी शुभ है वहीं दृष्टि जायेगी, दोषों पर यदि दृष्टि जाये भी तो कटुता का भाव उदय न होगा.. संसार को उसके दोषों व गुणों सहित हम अपना लेने में समर्थ होंगे.  

Sunday, January 8, 2012

सहज ज्ञान


सितम्बर २००२ 
अंतर्मुखी होकर, ध्यानस्थ होकर भीतर जो भी दिखे वह सहज ज्ञान है. भगवद्ज्ञान कहीं बाहर से मिलने वाला नहीं है बल्कि इसी सहज ज्ञान का आश्रय लेकर पाया जा सकता है. परमात्म प्राप्ति का या आनंद प्राप्ति का या सत्य प्राप्ति का निश्चय दृढ़ हो तो जीवन को एक ऐसी दिशा मिल जाती है जो ऊर्जा को नष्ट नहीं होने देती. कुछ क्षणों के लिये मन अशांत होता भी है तो झट भीतर कोई कहता है जो हम देते हैं वही पूरे ब्याज के साथ हमें मिलता है. प्रेम दो तो प्रेम मिलेगा, आनंद देने पर आनंद और विरोध करने पर विरोध ही हाथ आयेगा. संसार चाहे कितना भी मिल जाये ज्ञान के बिना दुखमय ही रहेगा. सजगता के साथ जियें तो यह अनुकूल हो जाता है, ज्ञान के बिना हम एक क्षण के लिये भी सुरक्षित नहीं हैं. कर्म बंधन से मुक्ति चाहिए तो हमारे सारे कर्म, विचार, वाणी परमात्मा से युक्त होने चाहिए, अर्थात सजगता पूर्ण. योग भी तभी सधेगा जब लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति का हो, क्योंकि अन्य चाह न रहने से मन सहज विश्राम में रहता है. इसी में हमारा कल्याण है और हमारे इर्द गिर्द के वातावरण का भी इसी में कल्याण है.