Monday, August 6, 2018

भीतर बाहर एक हुआ जो


६ अगस्त २०१८ 
संत कहते हैं, मनसा, वाचा, कर्मणा हमें एक होना है, जैसा हम सोचते हैं, वैसा ही वाणी में प्रकटे, उसी के अनुसार हमारे कृत्य हों. तभी जीवन में सच्चा योग फलित होता है. हो सकता है हमारे भाव शुद्ध हों पर वाणी कठोर हो जाती हो, अथवा जितना कार्य हम करना चाहते हों, उतना करते न हों. हमारे संकल्प जब तक पूर्णता को प्राप्त नहीं हो जाते तब तक योग जीवन में नहीं उतरा. कोई व्यक्ति बहुत श्रम करता है किंतु करते समय प्रसन्न नहीं है, अर्थात उसका मन कार्य के साथ एक नहीं हुआ. कोई ऊपर से बहुत मधुर बोलता है पर मन से उसके विपरीत सोचता है, तब भी भीतर संघर्ष बना ही रहेगा. जिस क्षण हम पूर्ण सकारात्मक हो जाते हैं, बाहर कैसी भी परिस्थिति हो मन में एक शांति का अनुभव करते हैं, तब बोलते समय वाणी की सजगता बनी रहेगी, कृत्य करने में त्रुटियाँ भी कम होंगी. जीवन का हर दिन एक नयी चुनौती लेकर आता है, बल्कि हर क्षण ही हमारे सामने एक अवसर होता है, जिसमें हम योग के पद पर स्थित रह सकते हैं अथवा उससे नीचे उतर सकते हैं.

Thursday, August 2, 2018

हर पल बने सार्थक अपना


३ जुलाई २०१८ 
सुबह से शाम तक सभी को समय एक जैसा मिला है, कोई उन्हीं क्षणों में कितना कुछ कर जाता है और कोई समय की कमी का रोना रोता रहता है. समय अति बहुमूल्य है, यह जानते हुए भी हम कितना समय व्यर्थ के कामों में गंवा देते हैं. वास्तव में जब तक हमारे द्वारा जीवन में प्राथमिकतायें तय नहीं होतीं, हमारा समय यूँही व्यय होता रहेगा. देह को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम और मन को स्वस्थ रखने के लिए ध्यान उसी तरह आवश्यक है, जैसे देह बनाये रखने के लिए भोजन, जब तक यह हम पूर्णतया स्वीकार नहीं कर लेते तब तक साधना के लिए समय निकालना जरूरी नहीं लगेगा. इसी तरह यदि कोई तय कर ले कि लेखन यदि प्रतिदिन नहीं किया जाता तो विचारों का प्रवाह रुक जाता है, उसमें सहजता नहीं रहती, तब वह उसे भी प्राथमिकता देना आरम्भ कर देगा. मात्र हमारा भौतिक अस्तित्त्व बना रहे, इतना ही तो पर्याप्त नहीं है. इस होने में निरंतर प्रज्ञा का विकास हो तभी अपने स्वरूप में हम बने रह सकते हैं.

Monday, July 30, 2018

जामे दो न समाय


३० जुलाई २०१८ 
साधना का लक्ष्य है अहंकार का विसर्जन, अर्थात इस अनंत ब्रह्मांड में स्वयं को एक इकाई न मानकर संम्पूर्ण का अंश मानना. जब तक ‘मैं’ बचा हुआ है, न ज्ञान है, न प्रेम, न भक्ति और न ही आनंद. भीतर जब इस ज्ञान की किरण उतरती है तो ज्ञान ही रह जाता है, ज्ञानी खो जाता है ! जगत के साथ जब भीतर एक्य का अनुभव होता है तभी परमात्मा का आनंद बरसता है, आनंद का अनुभव ही शेष रह जाता है, अनुभव करने वाला खो जाता है. भीतर जब प्रेम की रसधार बहती है तो प्रेम ही रह जाता है, प्रेमी खो जाता है ! इसी तरह परमात्मा से जब मिलन होता है तो भक्त खो जाता है, केवल परमात्मा ही रह जाता है.

Tuesday, July 24, 2018

जीवन कितने भेद छिपाए


२४ जुलाई २०१८ 
जीवन की परिभाषा अनेक लोगों ने अनेक शब्दों में दी है. जीवन इतना विशाल है कि हर परिभाषा छोटी पड़ जाती है. किसी ने यह भी कहा है, जीवन एक पाठशाला है. यहाँ हमें हर दिन एक विद्यार्थी बनकर प्रवेश करना है, यदि कोई यह मानकर बैठा है कि उसने सब कुछ जान लिया है, तो वह मानो जीवन में प्रवेश ही नहीं कर सकता. यदि कोई यह सोचता है कि उसने सब सीख लिया है, उसे तो अब सिखाना है, वह भी जीवन की गहराई से अछूता ही रह जाता है. यहाँ तो अनजान और मासूम बालक बनकर ही प्रवेशद्वार पर पहुँचा जाता है. सृष्टि में हर घड़ी इतना कुछ घट रहा है कि विस्मय से मन ठिठक जाता है. घास की नोक पर टिकी एक छोटी सी बूंद में पडती सूर्य की किरणों का रंग हो या शाम ढलते ही झींगुरों का राग, आत्मीयता से भरा कोई स्पर्श हो या किसी मूक प्राणी की आँखों में उठा कोई भाव, जीवन हर पल कितना कुछ दिखाता है, सिखाता है.

Monday, July 23, 2018

हीरा जनम अमोल था


२३ जुलाई २०१८ 
जब तक हमारे पास समय है, देह में शक्ति है, मन में उत्साह है, तभी तक हम जीवित हैं, ऐसा मानना चाहिए. एक कहानी हम सबने सुनी है कि रात्रि के अंधकार में एक व्यक्ति नदी किनारे बैठकर एक-एककर पत्थर फेंकता रहा, जब प्रभात का प्रकाश जगा तो उसके हाथ में एक ही पत्थर बचा था, जिसे देखकर वह चौंक गया, जो एक कीमती हीरा था. जीवन की शाम ढले और हमें यह महसूस हो कि कीमती घड़ियाँ हाथ से फिसली जा रही हैं, उसके पूर्व ही स्वयं के भीतर छिपे हीरे को पहचान लेना है. शांति और प्रेम का वह अनमोल रत्न जिसकी पहचान मीरा को उसके सद्गुरु ने कराई थी, सभी के भीतर है, और उतना ही सच्चा और अनमोल जितना किसी जागे हुए के भीतर होता है. जिसकी पहचान होते ही जीवन में तृप्ति का अहसास होने लगता है. और जिसकी पहचान न होने तक मन एक तलाश में खोया रहता है. मन जब एकाग्र होकर अपने आप में रुकना सीख जाता है, उसे संतुष्टि का अनुभव होने लगता है, मानो वह हीरा हाथ लग गया जो सदा से अपने ही पास था.

Monday, July 16, 2018

सुख सपना दुःख बुलबुला


१७ जुलाई २०१८
सुख की तलाश जब तक बाहर है, दुःख मिलने ही वाला है. सुख-दुःख दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक के साथ दूसरा मुफ्त में मिलता है. सुख जब अपने होने में ही मिलने लगता है, तब उसका कोई प्रतिद्वंदी नहीं होता, क्योंकि अपने होने में तो किसी को आज तक संदेह नहीं हुआ. हमारी तकलीफ यह है कि हम कभी भीतर जाकर अपने सही स्वरूप को खोजते नहीं. जगत के साथ हमारा जो संबंध है, उसी के नाते हम स्वयं को दी गयी उपाधियों से ही जानते हैं. कोई हमसे हमारी पहचान पूछे तो झट हमारा उत्तर होगा, अपना नाम, जबकि वह तो बदला जा सकता है, राष्ट्रीयता अथवा धर्म भी बदला जा सकता है, व्यवसाय भी बदल सकता है, रिश्ते भी जो आज हैं कल बदल  सकते हैं. स्वयं को हम जब तक शुद्ध रूप में पहचान नहीं लेते अपने होने का स्वाद हमें नहीं मिल सकता. तब तक सुख की तलाश बाहर ही जारी रहेगी और पीछे-पीछे दुःख भी मिलता रहेगा.

Sunday, July 15, 2018

निर्मल बोध जगे जब भीतर


१६ जुलाई २०१८ 
मन के भीतर चल रहे द्वंद्व को हम जितना-जितना मिटाने का प्रयत्न करते हैं, उतना ही उसे पोषित करते चले जाते हैं. हमारा ध्यान जहाँ भी होगा, ऊर्जा उधर ही बहेगी और उस स्थिति को समाप्त करने के बजाय उसे और भी बढ़ाएगी. इससे तो बेहतर होता कि हम प्रार्थना में बैठ जाते, अथवा ध्यान स्वयं की तरफ ले जाते, निज स्वरूप में ही शांति का अनुभव किया जा सकता है. मन की दुविधा को मन भला कैसे शांत कर सकता है, कोई अपनी ही बनाई हुई मूर्ति को जिस तरह नहीं तोड़ना चाहता, वैसे ही मन स्वयं के बनाये हुए मनोराज्य को ध्वंस नहीं कर सकता. उसे तो बोध के द्वारा ही समझाया जा सकता है. भीतर के मौन में टिक कर ही उस शांत अवस्था का अनुभव किया जा सकता है जहाँ कोई द्वंद्व नहीं है. परमात्मा से प्रार्थना, उसकी स्तुति, और उपासना के द्वारा हम इस निर्मल बोध को अनुभव कर सकते हैं.