Sunday, January 20, 2019

साईं इतना दीजिये


२१ जनवरी २०१९ 
मन की गागर को जितना भरें वह खाली ही रहती है, हर उपलब्धि कुछ दिनों बाद कम पड़ जाती है. हर अनुभव कुछ दिनों बाद खो जाता है. भीतर एक रिक्तता का अहसास है कि जाता ही नहीं, एक तलाश जैसे हर बार कुछ नया पाने को उकसाती है. एक खोज निरंतर चलती ही रहती है, और यही खोज मानव को एक दिन उसकी असलियत से रूबरू करा सकती है. उसी असलियत को संत और शास्त्र नये-नये उपायों से समझा रहे हैं, ज्ञान योग, भक्ति योग या कर्म योग उसी एक मंजिल पर ले जाने के लिए है. यहाँ तक कि यदि कोई सजग होकर अपने सामान्य जीवन का भी अध्ययन करे तो वह उसी निष्कर्ष पर पहुँच जायेगा. वास्तव में मन की गागर की कोई पेंदी ही नहीं है, अतल है उसकी गहराई और अनंत है उसकी चाहने की क्षमता. एक जन्म तो क्या हजार जन्म लेकर भी इस मन को तृप्त नहीं किया जा सकता, एक तरह से हम सभी एक असाध्य कार्य में लगे हैं. कितना अच्छा हो कि अपने पुरुषार्थ द्वारा जो मिला है उसमें संतुष्ट रहकर इस संसार को बेहतर बनाने में जितना हो सके योगदान करें. क्योंकि देने की ख़ुशी ही वह शै है जो मन को तृप्त कर सकती है.

Friday, January 18, 2019

मानुष जनम अमोल है


१८ जनवरी २०१८ 
संत और शास्त्र जिस बात की ओर संकेत कर रहे हैं, वह अनमोल है. हमारे पास जो भी कीमती वस्तु हो उससे अधिक अनमोल, किन्तु हम उसका महत्व नहीं समझ पाते. वे कहते हैं, देवता भी मानव जन्म के लिए लालायित रहते हैं, क्योंकि इसी जन्म में हम अपने मूल स्रोत तक पहुंच सकते हैं. मन और बुद्धि के जो उपकरण हमें प्रकृति से मिले हैं, उनके द्वारा मानव ने कितनी उन्नति कर ली है, किन्तु वह अपने मूल से दूर निकल गया है. यदि कोई बालक कोई प्रदर्शनी देखने घर से निकल जाये और फिर वापसी का रास्ता भूल जाये तो उसे भटकना पड़ता है, उसके दुःख की कल्पना हम कर सकते हैं. मन रूपी बालक भी आत्मा रूपी माँ से बिछड़ कर संसार की रंगीनियों में खो गया है, उसे तो यह भी याद नहीं कि उसका कोई घर भी है. अपने मूल से जुड़ा हुआ मन उस नाव की तरह होता है, जिसका लंगर उसके साथ है, वह कभी डूबती नहीं. वह उस घर की तरह होता है जिसकी नींव धरती में गहरी खुदी है, जो रेत का महल नहीं है.

Friday, January 11, 2019

एक तू जो मिला


१२ जनवरी २०१९ 
शायर कहता है, ‘जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है’. आखिर उसके पास कौन सी आँख है, जिसके द्वारा उसे एक वही नजर आता है. संत और शास्त्र भी कहते हैं, ‘एकै साधे सब सधे..’ उस एक को ही पाना है, एक को ही जानना है. उस एक का रास्ता अपने भीतर से होकर जाता है, पर हम हैं कि दुनियाभर की खबर रखना चाहते हैं. ट्रम्प ने क्या कहा, मोदी के भाषण पर कितनी तालियाँ बजीं, किसे कितने लाइक मिले और कौन यूरोप घूमने गया. इतना सब कुछ करते हुए क्या हम अपने से बेखबर नहीं हैं. किसी किसी को तो एक घंटा यदि अकेले रहना पड़ जाये तो बोर हो जाता है, यानि अपना साथ ही हमें नहीं भाता. क्यों न नये वर्ष में खुद को मित्र बनाएं, दैहिक, मानसिक, सामाजिक या अध्यात्मिक कोई भी समस्या हो तो स्वयं को ठीक उसी प्रकार समझाएं जैसे किसी मित्र को समझाते आये हैं. अन्यों की हर समस्या का हल हमारे पास सदा ही तैयार रहता है. स्वयं को देह, मन, बुद्द्धि से अलग करके कभी देखा ही नहीं सो अपनी समस्या के हल के लिए अन्यों का सहारा लेते हैं. एक बार मन को समझने-समझाने वाला भीतर मिल गया, तो वह भी गायेगा, जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है !   

नये वर्ष में खुद को जानें


११ जनवरी २०१९ 
कहने को नया वर्ष आया है, पर गहराई से देखें तो जीवन हर क्षण नया है. हर सुबह पहले से अलग, हर रात्रि पूर्व से भिन्न. नेत्रों के सामने यहाँ दृश्य निरंतर बदल रहे हैं, पंछियों के सुर भोर में अलग होते हैं और दोपहरी में कुछ और. संत कहते हैं, दृश्य को देखने वाला कभी नहीं बदलता, उसी द्रष्टा में ठहरना सीख लिया तो जगत की धूप-छाँव प्रभावित नहीं करेगी, दोनों में मन एकरस रह सकता है. वह द्रष्टा कहाँ है, कौन है, उस तक कैसे पहुंचा जा सकता है, इसे जानना ही साधना का लक्ष्य है. हम मन व बुद्धि से ही जगत को देखते हैं. मन पूर्व धारणाओं का समूह है और बुद्धि आजतक प्राप्त हुए ज्ञान का. यदि उसी चश्मे से जगत को देखा तो हम उसके वास्तविक रूप को कभी जान ही नहीं सकते. आश्चर्य तो इस बात का है कि असल में हम ही द्रष्टा हैं, पर इस बात को भुला बैठे हैं. स्वयं को जाने बिना जगत को जाना भी कैसे जा सकता है. जितनी बार भी इस बात को दोहराया जाये कम है. मंजिल तक पहुँचने से पहले तो खुद को याद दिलाते ही रहना है.

Friday, December 14, 2018

दृष्टिकोण बदल जाये जब


१५ दिसम्बर २०१८ 
उपनिषदों में कहा  गया है, जिसे जानकर मनुष्य कृत-कृत्य हो जाता है, प्राप्त–प्राप्तव्य हो जाता है, ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है, वह आत्मा का ज्ञान है. शास्त्र हमें नवीन जीवन दृष्टि देते हैं. स्वयं का, जगत का प्रकृति का और परमात्मा का ज्ञान कराते हैं. हमारे कर्म उन धारणाओं पर आधारित होते हैं जो हमने स्वयं, जगत व परमात्मा के बारे में अपने भीतर बनाई होती हैं. यदि हम स्वयं को सीमित देह मानते हैं तो भय तथा असुरक्षा से घिरे ही रहेंगे. जगत के साथ हमारा संबंध भी प्रतिद्वन्दता का होगा. परमात्मा हमें दूर प्रतीत होगा. यदि असीम आत्मा मानेंगे, तो उसमें सब कुछ समाहित हो जायेगा, जगत अपना आप ही प्रतीत होगा, भय का कोई कारण ही नहीं रहेगा. इसी प्रकार यदि हम स्वयं को मन, बुद्धि मानते हैं तो सुख-दुःख के झूले में झूलते ही रहेंगे, क्योंकि मन सदा एक सा नहीं रहता, छोटा सा आघात भी उसे हिला देता है और ज्यादा सुख को भी वह सह नहीं पाता. बुद्धिगत ज्ञान हमें सांसारिक सुविधाएँ तो दिला सकता है पर आन्तरिक संतुष्टि से हम दूर ही बने रहते हैं. स्वयं का असली परिचय ही हमें सदा समता में रख सकता है, जिससे एक न खत्म होने वाली अटूट शांति और सहजता हमारे जीवन का अंग बन जाती है.

Sunday, December 9, 2018

स्वयं में ही विश्रांति मिले जब


१० दिसम्बर २०१८ 
मन में कामना उठती है किसी न किसी अभाव का अनुभव करने के कारण. उस अभाव की पूर्ति के लिए हम कर्म में तत्पर होते हैं. कर्म का एक संस्कार भीतर पड़ता है और भविष्य में उसका निर्धारित फल भी मिलने ही वाला है. उदाहरण के लिए यदि हमारे भीतर कहीं जाने की कामना उत्पन्न हुई, इसका अर्थ है हम जहाँ हैं वहाँ कोई अभाव है, गन्तव्य पर जाकर हम पूर्णता का अनुभव करेंगे. यात्रा के दौरान कितने ही संस्कार मन पर पड़े और लक्ष्य पर पहुँच कर जिस प्रसन्नता का हमने अनुभव किया, उसे पुनः-पुनः अनुभव करने की नई कामना ने भीतर जन्म लिया. अब उस स्थान पर भी भीतर अभाव का अनुभव होगा, यही बंधन है. जीवन इसी चक्र का दूसरा नाम है, हम जिस कामना की पूर्ति के लिए इतना श्रम करते हैं, वह हमें पुनः वहीँ पहुँचा देती है, जहाँ से हम चले थे. क्या कोई ऐसा क्षण हो सकता है, जब भीतर कोई अभाव न हो, पूर्ण तृप्ति का अनुभव हो और हम पूर्ण स्वाधीनता का अनुभव करें. मन की धारा यदि बाहर से लौट आए और भीतर की तरफ यात्रा करे एक बिंदु पर आकर वह स्वयं में खो जाती है और जो शेष रहता है वही सहज विश्राम है, जिसमें कोई अभाव नहीं रहता.

Thursday, December 6, 2018

मन की नदी मिले सागर से


७ दिसम्बर २०१८ 
नदी पर्वत से निकलती है तो पतली धार की तरह होती है, मार्ग में अन्य जल धाराएँ उसमें मिलती जाती हैं और धीरे-धीरे वह वृहद रूप धर लेती है. अनेकों बाधाओं को पार करके सागर से जब उसका मिलन होता है, वह अपना नाम और रूप दोनों खोकर सागर ही हो जाती है. जहाँ से वह पुनः वाष्पित होगी और पर्वत पर हिम बनकर प्रवाहित होगी. जीवन भी ऐसा ही है, शिशु का मन जन्म के समय कोरी स्लेट की तरह होता है, माता-पिता, शिक्षक, समाज, राज्य, राष्ट्र और विश्व उसके मन को गढ़ने में अपना योगदान देते हैं. अनेक विचारों, मान्यताओं व धारणाओं को समेटे होता है उसके मन का जल. यदि उचित समय पर मार्गदर्शन मिले और मृत्यु से पूर्व वह पुनः मन को खाली कर पाए, नाम-रूप का त्याग कर समष्टि मन से एक हो जाये तो वह भी सागर बन सकता है. ऐसा तभी सम्भव है जब मन भी नदी की भांति निरंतर बहता रहे, किसी पोखरी की भांति उसका जल स्थिर न हो जाये.