जीवन की परिभाषाएं कितनी ही देते चलो, जीवन है कि चूकता ही नहीं, हाथ में आता ही
नहीं. नित नये रंग बिखेरे चला जाता है. जीवन के रंग अनंत हैं और इसके ढंग भी अनंत
हैं. इसे किसी खांचे में फिट नहीं किया जा सकता. यदि कोई सोचे कि विकासशील देश के
किसी सुदूर गाँव में ही असली जीवन है तो वह भी आधा सच होगा और यदि कोई कहे विकसित
देशों में ही सच्चा जीवन है तो वह भी अर्धसत्य होगा. जीवन के मर्म को जाने बिना हम
कुछ भी करें, कहीं भी रहें एक तलाश भीतर चलती ही रहती है. यही माया है. सर्व
सुविधा सम्पन्न होकर भी कुछ यहाँ अभाव का अनुभव करते हैं और कुछ न होते हुए भी
अलमस्त देखे जाते हैं. इसका अर्थ हुआ जो भी जहाँ है वहाँ यदि थोड़ा गहराई से देखे कि
जिस जीवन को ढूँढने में हम सारा श्रम लगा रहे हैं, वह तो एक दिन हाथ से फिसल जाने
वाला है, और जो हमारे पास इस समय है वह अमूल्य है. वर्तमान के क्षण में जिसने जीवन
से मुलाकात नहीं की वह भविष्य में कभी करेगा, ऐसी कल्पना दिवास्वप्न के सिवा कुछ
भी नहीं.
Thursday, July 11, 2019
Wednesday, July 10, 2019
पल पल सजग रहे जो मन
मन सदा ही परिचित मार्गों पर जाना चाहता है. नयापन उसे डराता है अथवा तो उसकी उस
जड़ता को तोड़ता है, जिसकी मन को आदत हो गयी है. किसी दार्शनिक ने कहा है, मनुष्य
आदतों का पुतला है. हम बहुत कुछ केवल स्वभाव वश ही करते हैं, जो आदतें हमारे लिए
हानिकारक भी हैं, जिनका हमें ज्ञान भी है, फिर भी हम उन्हें त्यागना नहीं चाहते.
जो आदतें अच्छी हैं उनको भी हम यदि असजग होकर दोहराते रहते हैं तो जितना लाभ मिलना
चाहिए उतना नहीं ले पाते. जैसे किसी को यदि सुबह उठकर गीता पाठ करने का नियम है और
वह बिना भाव के या अर्थ समझे ही उसका नित्य पाठ करता रहे, तो यह अच्छी आदत होते
हुए भी उसके जीवन में विशेष परिवर्तन नहीं ला सकती. हम जो भी करते हैं उसकी पूरी
जिम्मेदारी हमारी है, उसका जो भी फल मिलेगा उसका भागीदार हमें ही होना है. असजगता
हमें अपने शुद्ध स्वरूप से दूर ले जाती है, अथवा तो जब भी हम अपने मूल स्वभाव से
दूर होते हैं, असजग होते हैं. योग का अर्थ है, स्वयं के शुद्ध स्वरूप से जुड़े
रहना, इसी योग की साधना हमें करनी है.
Monday, July 8, 2019
आशीषें ही जो देते हैं
'मातृ देवो भव', 'पितृ देवो भव', 'गुरू देवो भव' और 'अतिथि देवो भव' का अतुलित
संदेश वेदों में दिया गया है. गुरू में दिव्यता का अनुभव हम कर सकते हैं, क्योंकि
वह ईश्वर का प्रतिनिधित्व करता है, अतिथि में भी हम दिव्यता की धारणा कर सकते हैं,
किंतु जिसने माँ और पिता में दिव्यता के दर्शन कर लिए उसके जीवन में सहजता अपने आप
आ जाती है. शिशु जब छोटा होता है वह पूरी तरह से माँ-पिता पर व परिवार पर निर्भर
होता है, जैसा वातावरण और शिक्षा उसे मिलती है, उसके मन पर वैसी ही छाप पड़ने लगती
है, पूर्व के संस्कार भी समुचित वातावरण पाकर ही विकसित होते हैं. इसमें माता-पिता
की बड़ी भूमिका है. जो पीढ़ी अपने बुजुर्गों का सम्मान करना भूल जाती है, वह अपने
भविष्य के लिए अंधकार का निर्माण ही कर रही है. आयु में अथवा पद में चाहे कोई
कितना भी बड़ा हो जाये, जब तक सिर पर कोई स्नेह भरा हाथ हो, तब तक एक रसधार भीतर
बहती है. निस्वार्थ प्रेम का जो वरदान माँ-पिता से मिलता है, उसका कोई विकल्प नहीं
है.
Sunday, July 7, 2019
शक्ति जगे भीतर जब पावन
हमें सत्य को पाना नहीं है, उसे अपने माध्यम से प्रकट होने का अवसर देना है.
परमात्मा को देखना नहीं है उसके गुणों को स्वयं के भीतर पनपने का अवसर देना है. आदिम
युग में मानव ने जब परमात्मा की ओर पहली-पहली बार निहारा होगा तो उस अदृश्य शक्ति
से सहायता की गुहार लगाई होगी, किंतु अब इतने बुद्धों के अवतरण के बाद परमात्मा के
प्रति उसका दृष्टिकोण परिपक्व हो गया है. वह परमात्मा को आदर्श मानकर स्वयं को
उसके लिए उपलब्ध पात्र बनाना चाहता है, वह जान गया है परमात्मा मानवीय सम्भावनाओं
की अंतिम परिणति है. कभी कोई कृष्ण कोई राम, मानव होकर भी उस ऊँचाई को प्राप्त कर
सकता है तो इसका अर्थ है हर मानव में यह शक्ति निहित है. उस शक्ति को अपने भीतर
जगाना और उसे देह, मन, बुद्धि के माध्यम से व्यक्त होने का अवसर देना यही
आध्यात्मिकता है.
Thursday, July 4, 2019
बीती ताहि बिसार दे
अतीत की बातों को हमारा लेकर दुखी होना वैसा ही है जैसे कोई वर्षों पूर्व आयी आँधी
के द्वारा फैलायी गंदगी को आज बाल्टियाँ भर-भर कर धोये. पानी व्यर्थ जायेगा, श्रम
भी व्यर्थ जायेगा और वह गंदगी जो अब है ही नहीं भला साफ कैसे हो सकती है. मन हर
दिन नया हो रहा है, रोज जो भोजन हम ग्रहण करते हैं उसके सूक्ष्म संश से ही मन बनता
है, जो श्वास हम आज ग्रहण कर रहे हैं वही हमें ऊर्जा से भर रही है, जो आज मिला है
वह आज के लिए है, इस ऊर्जा को हम व्यर्थ ही पुरानी बातों को याद करने में लगते हैं
फिर दुखी भी होते हैं. स्मृतियाँ सुखद हों तब भी उन्हें ज्यादा तूल देना ठीक नहीं,
बल्कि आज को एक सुखद स्मृति बनाने के लिए ऊर्जा का सदुपयोग करना उचित है. सबसे
प्रमुख बात है कि सारे अनुभव वर्तमान के क्षण में ही होते हैं, अतीत में जो भी
सुखद हुआ, वह उस समय के लिए वर्तमान में ही घटा था, आज एक नये अनुभव के लिए स्वयं
को खाली रखना है, वरना कोल्हू के बैल की तरह अतीत लौट-लौट कर हमारे सम्मुख वर्तमान
की शक्ल में आता रहेगा, क्योंकि हम उसे भूलना ही नहीं चाह रहे हैं.
Tuesday, July 2, 2019
एक यात्रा है अनंत की
भगवद् गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को अभ्यास और वैराग्य का उपदेश
देते हैं. अभ्यास समर्पण का और वैराग्य सांसारिक सुखों से. हमारा समर्पण बार-बार
खंडित हो जाता है, और जगत से वैराग्य भी नहीं सधता. जरा सी प्रतिकूलता आते ही भीतर
संदेह भर जाता है, अल्प सुख के लिए हम जगत के पीछे निकल पड़ते हैं. गुरु कहते हैं,
हजार बार भी टूटे फिर भी समर्पण किये बिना अंतर की शांति को अनुभव नहीं किया जा
सकता. इसी तरह एक दिन साधक सुख के पीछे जाना छोड़ देता है क्योंकि उसका सुख बार-बार
दुःख में बदल गया है. वह असत्य की राह भी त्यागता है क्योंकि उस पथ पर कांटे ही
कांटे मिले. अनुभवों से सीखकर ही हम आगे बढ़ते हैं. साधना का पथ एक अंतहीन यात्रा
पर हमें ले जाता है. परमात्मा अनंत है, हमारे सारे प्रयास अल्प हैं, किंतु संतों
का जीवन देखकर भीतर भरोसा जगता है, वे भी इसी तरह पग-पग चल कर ही इस अनंत शांति और
आनंद के भागी हुए हैं.
शुभता का जब कुसुम खिलेगा
यदि कोई सत्य की राह में चलता है तो उसे अस्तित्त्व से अपने आप मार्ग मिलने लगता
है. यदि कोई सिर बन्दगी में झुकता है तो आशीर्वाद उसी तरह अपने आप बरसने लगते हैं,
जैसे खाली जगह देखकर हवा कहीं से चली ही आती है. इस सृष्टि में हरेक के लिए अवसर
है. इस जीवन से हम क्या चाहते हैं, यह भर हमें तय करना है. हृदय की गहराई से निकली
हर चाह अपनी पूर्ति के लिए ऊर्जा साथ लेकर ही उत्पन्न होती है. जैसे एक बीज में
फूल बनकर खिलने का पूरा सामर्थ्य है वैसे ही हर शुभ इच्छा एक बीज ही है जो एक न एक
दिन खिलने वाली है. हमारा आज वही तो है जो कल हमने चाहा था, आने वाला कल भी हमें एक
खाली कैनवास की तरह मिला है, जिसमें रंग भरने की हमें पूरी आजादी है.
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