जीवन जितना सरल है
उतना ही जटिल भी. जिसने यह राज समझ लिया वह सरलता और जटिलता दोनों से ऊपर उठ जाता
है. जिस क्षण में जीवन जैसा मिलता है, उसे वह वैसा ही स्वीकार करता है. वन में जहरीले
वृक्ष भी हैं और रसीले भी, गुलाब में कंटक भी हैं और फूल भी, यदि हम एक को
स्वीकारते हैं और दूसरे को अस्वीकारते हैं तो मन सदा एक संघर्ष की स्थिति में ही
बना रहता है. ध्यान में जाने का पहला मन्त्र है मन को सभी धारणाओं से मुक्त कर
लेना. जो जैसा है वैसा ही स्वीकार कर लेना. सभी द्वन्द्वों के साक्षी बनकर ही पूर्ण
विश्राम का अनुभव किया जा सकता है. जहाँ कोई अपेक्षा नहीं, वहीं पूर्ण स्वतन्त्रता
है, स्वतन्त्रता हर आत्मा की आन्तरिक पुकार है. मन का सारा तनाव परतन्त्रता से ही
उत्पन्न होता है. हम कुछ चाहते हैं पर कर नहीं सकते, यही संघर्ष भीतर चलता रहता
है. हर इच्छा हमें गुलामी की ओर धकेलती है. जगत हमें कुछ देता है तो उसकी कीमत भी
वसूलता है, यह चक्र न जाने कब से चल रहा है, संत और शास्त्र हमें एक नये जीवन की
झलक दिखाते हैं, जिसमें सहजता है, सरलता है आनंद है पर उसके विपरीत कुछ भी नहीं,
यहाँ पूर्ण स्वतन्त्रता है, यहाँ अनंत नीले नभ की निर्मलता का अनुभव भी सहज ही किया
जा सकता है. यही ध्यान है, यही अपने स्वरूप में स्थित होना है.
Sunday, September 8, 2019
Monday, September 2, 2019
सेवा का जो मर्म जान ले
परमात्मा की बनाई इस सुंदर सृष्टि
में हममें से हरेक को अपनी भूमिका निभानी है. एक ही सत्ता जड़ और चेतन के अनंत-अनंत
रूपों में प्रकट हो रही है. जहाँ सभी किसी न किसी तरह से एक-दूसरे पर निर्भर हैं. गणपति
की लीला भी यही बताती है, उनका वाहन मूषक है, और सर्प को उन्होंने अपने उदर पर
बाँधा हुआ है. मूषक सर्प का आहार है, सर्प मोर का आहार है, जो कार्तिकेय का वाहन
है. वन में सभी जीव एक-दूसरे पर आश्रित हैं. एक समर्थ मानव पर अनेकों जन आश्रित
होते हैं. जिस का हृदय सहज ही अन्यों की सहायता करने के लिए तत्पर हो जाता है, उसे
वैसी सामर्थ्य भी अस्तित्त्व द्वारा मिलने लगती है. साधना में योग, स्वाध्याय, ईश्वर
भक्ति के साथ-साथ सेवा का भी समान महत्व है, बल्कि साधना की सिद्धि के बाद तो सेवा
के अतिरिक्त कुछ करने को भी साधक के पास नहीं रह जाता. गणपति उत्सव में भी अन्य
सामाजिक उत्सवों व पर्वों की तरह समाज के अनगिनत जन किसी न किसी प्रकार की सेवा
देते हैं. अंतर इतना ही है, एक सिद्ध व्यक्ति इस सत्य को जानकर सेवा करता है कि अपने
हर सेवा कर्म में वह परमात्मा की ही सेवा कर रहा है. साधक अपने अहंकार को मिटाने
के लिए सेवा करता है और अज्ञानी व्यक्ति अहंकार के पोषण के लिए सेवा करता है.
Tuesday, August 27, 2019
हे जन्मभूमि भारत
भारत में परिवर्तन की हवाएं चल
रही हैं. ये हवाएं अपने साथ कितने ही संदेश लेकर आ रही हैं. दुनिया आज भारत की ओर
आशा भरी नजर से देख रही है. आधुनिकता के नाम पर जब धरती के सारे स्रोतों को नष्ट
किया जा रहा हो, तब वेदों में दिए गये संदेश जैसे उसके घावों पर मरहम रखते से लगते
हैं, जिनमें कहा गया है धरती हमारी माँ है और हम उसके पुत्र हैं, माँ जो प्रेम की
मूरत है, वह अपना सब कुछ संतानों पर लुटाने को तैयार ही है. नदियों की पूजा करने
का वास्तविक अर्थ क्या है आज उसे समझने व समझाने का समय आ गया है. वृक्षों को
आराध्य मानना और पंच तत्वों को परमात्मा का स्थूल शरीर मानना क्या हमें अपने
पर्यावरण को सरंक्षित रखने का संदेश नहीं देता. अध्यात्म की सुगंध यहाँ की हवा में
बसी हुई है, भौतिक उन्नति के शिखर पर पहुँचा हुआ व्यक्ति भी यहाँ संतों के चरणों
में अपना सिर झुकाने में स्वयं को भाग्यशाली मानता है. जीवन के मर्म को समझने के
लिए आदिकाल से हर देश के यात्री भारत आते रहे हैं, हम कितने भाग्यशाली हैं कि
पृथ्वी के इस भूभाग में हमारा जन्म हुआ है, जिसका अर्थ ही है प्रकाश. जैसे प्रकाश
के अभाव में जगत होते हुए भी दिखाई नहीं देता वैसे ही ज्ञान रूपी प्रकाश के न होने
पर ही दुःख रूपी अंधकार ने हमें घेर लिया है, ऐसा भ्रम होने लगता है.
Monday, August 26, 2019
काहे री नलिनी तू कुम्हलानी
संत कबीर कहते हैं, 'काहे री
नलिनी तू कुम्हलानी'. हमारा मन रूपी कमल भी अक्सर कुम्हला जाता है, हम अपने आपसे
यह सवाल पूछें तो उत्तर मिल सकता है. दिक्कत यह है कि हमने स्वयं को मन ही समझ
लिया है, इसलिए मन के उदास होते ही हम भी परेशान हो जाते हैं और सवाल पूछना तो दूर
सामान्य व्यवहार भी भुला बैठते हैं. दुखी व्यक्ति न बोलने योग्य बोल देता है, न
सोचने योग्य सोच लेता है और विषाद के कारण हुए तनाव से तन को भी रोगी बना लेता है.
हम अन्यों को सलाह देने में कितने दक्ष हैं, किसी की भी, कैसी भी समस्या हो, हमारे
पास उसका निदान सदा ही रहता है. कितना अच्छा हो यदि एक क्षण के लिए भी मन पर बादल
छाये तो हम उससे पूछें और एक समझदार मित्र की तरह उसे इस दुःख से बाहर निकलने की सलाह
दे सकें. ऐसा करने के लिए मन के साथ हुआ तादात्म्य तोड़ना होगा. नीले आकाश की तरह
विस्तृत हमारा स्वरूप है और उस पर उड़ते हुए बादलों की तरह विचार हैं, दोनों में
कोई तादात्म्य नहीं, दोनों पृथक हैं. विचारों के पार जाते ही मन के सुख-दुःख के हम
साक्षी मात्र रहते हैं, वे हम पर अपना असर नहीं डाल सकते.
Sunday, August 25, 2019
जो रहे कमलवत सदा जगत में
जगत में विविधता है, रूप, रंग,
गंध, ध्वनि और स्वाद के न जाने कितने विषय हमारे चारों ओर बिखरे हैं. आँख को एक
दृश्य दिखाएँ या हजार, उसे कोई भार नहीं लगता. नासिका ने हजारों गंध का ज्ञान
ग्रहण किया है पर एक और गंध लेने के लिए उसे कोई प्रयास नहीं करना पड़ता. इसी
प्रकार मन जो इन्द्रियों के द्वारा दिखाए गये ज्ञान को ग्रहण करता है, न जाने
कितने जन्मों से यह कार्य कर रहा है, उसे कभी असुविधा नहीं होती, हर दिन नये-नये
विषयों का ज्ञान प्राप्त करने की उसकी आकांक्षा को कोई बाधा नहीं पड़ती. यहाँ तक की
बात जो समझ लेता है वह मन के हजार चिन्तन करने पर भी स्वयं को सहज अवस्था में रख
पाने में समर्थ हो जाता है. मन में एक विचार आये या हजार विचार आयें, यदि हम स्वयं
को मन से परे एक सत्ता के रूप में अनुभव कर सकते हैं, उसी तरह जैसे रूप से परे आँख
है और आँख से परे मन है, तो हम सदा अपने निर्विकार रूप में बने ही रहते हैं. जीवन
में रहकर भी कमल की तरह अलिप्त.
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Thursday, August 22, 2019
कृष्ण, कन्हैया, माधव, केशव
कृष्ण का नाम याद आते ही मन में
स्मृतियों का एक अनंत भंडार खुल जाता है. याद हो आती हैं गोपियाँ और ग्वाल-बाल, नंद-यशोदा,
गोकुल और वृन्दावन. मथुरा की जेल में कैद देवकी और टोकरी में नन्हे कान्हा को उठाये
यमुना पार करते वसुदेव भी याद आते हैं. कदम्ब का पेड़ और बांसुरी की तान भी देश के लोकमानस
में इस तरह रची-बसी है कि कहीं भी, कोई भी बांसुरी बजाये, कृष्ण की स्मृति मन को
तरंगित कर जाती है. ब्रजभूमि का तो हर रजकण कृष्ण के स्पर्श को भीतर धारण किये हुए
है. पूतना और बकासुर के नाम भी कृष्ण से वैसे ही जुड़े हैं जैसे सुदामा और उद्धव के.
कृष्ण अर्जुन के सखा हैं और भीष्म पितामह के आराध्य भी, द्रौपदी के तारणहार हैं तो
रुक्मणी के प्रिय द्वारकाधीश. राधा का नाम तो कृष्ण के साथ एक हो गया है, उसे अलग
से गिनाने की भी जरूरत नहीं है. भारत उसी तरह कृष्णमय है जैसे उपवन में सुगंध हो
या दीपक में ज्योति. चित्रकला, संगीत, वास्तुशिल्प, साहित्य या अन्य कोई भी विधा
हो कृष्ण के बिना कोई भी पूर्ण नहीं होती. महाभारत को गीता रूपी रत्न से सुशोभित
करने वाले कृष्ण का आज जन्मदिन है. यही प्रार्थना है कि जन्माष्टमी का यह पर्व भारत
के सुन्दर भविष्य की नींव रखने वाला सिद्ध हो.
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पहला सुख निरोगी काया
'पहला
सुख निरोगी काया', हम यह शब्द बचपन से सुनते आये हैं. मानव देह परमात्मा की बनाई
सुंदर कृति है, जो सौ वर्ष तक जीव का साथ दे सकती है. आयुर्वेद के अनुसार प्राकृतिक
नियमों का पालन करते हुए जीवन जीने से मानव सहजता पूर्वक स्वास्थ्य व दीर्घायु
प्राप्त कर सकता है. स्वस्थ रहने के उपाय भी हर कोई अपनी क्षमता के अनुसार करता है
फिर भी कभी न कभी देह अस्वस्थ होती है. जिसका पहला कारण है हमारी जीवन प्रणाली. सुख-सुविधाओं
के साधन बढ़ने के कारण ज्यादा शारीरिक श्रम नहीं होता, तथा जीवनस्तर बढ़ने के कारण वसायुक्त
गरिष्ठ आहार हमारे भोजन का अंग बन गया है. चिकित्सक भी यह मानते हैं कि मधुमेह,
रक्तचाप था हृदयरोग का मूल कारण आहार तथा दिनचर्या है. बाहर भोजन करने की आदत तथा
टीवी के सामने घंटों बैठे रहने के कारण भी शरीर स्वयं को स्वस्थ नहीं रख पाता.
कितना अच्छा हो यदि सुबह सूर्योदय से पहले उठकर आधा घंटा भ्रमण के लिए निकालें,
फिर एक घंटा आसन तथा प्राणायाम आदि करके दिनचर्या का आरम्भ करें. हल्का पौष्टिक
नाश्ता लेकर काम पर लगें तथा हर घंटे पर पांच दस मिनट के लिए शरीर की
हिलाना-डुलाना न भूलें. दोपहर के भोजन के बाद दिन में आधे घंटे से अधिक विश्राम न
करें. संध्या को भी नियमित रूप से कोई खेल खेलें, तैरें, साइकलिंग करें या टहलने
जाएँ. नियमित ध्यान का अभ्यास भी शरीर व मन को स्थिरता प्रदान करता है. रात्रि
भोजन के बाद भी कुछ देर चहलकदमी करनी आवश्यक है.
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