Sunday, July 31, 2011

पूजा


जुलाई २००१ 
गुरुनानकदेवजी ने कहा है कि यह विशाल गगन ही उस परमेश्वर की आरती का थाल है, सूर्य, चन्द्र, तारे उसमें जलते हुए दीपक हैं, हवा फूलों और वनस्पतियों रूपी धूप की सुगंध फैला रही है और चंवर डुला रही है ... ऐसे विराट स्वरूप को क्या हम मन्दिरों में कैद कर सकते हैं...मंदिर हम जाते हैं ताकि उसकी याद आ सके, लेकिन वहाँ की पवित्रता भी यदि भीतर कोई परिवर्तन नहीं ला रही, तो भाव शून्य होकर पूजा करना समय व शक्ति का पूरा-पूरा उपयोग नहीं कहा जा सकता. हमारे भीतर पूर्ण जीवन की सम्भावनाएं छिपी हुई हैं, सृजन, सुख और आनंद के स्रोत हैं जो हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं. भीतर के मंदिर के द्वार खुलें यही बाहर के मंदिर की सार्थकता है. 

Friday, July 29, 2011

ईश्वरीय प्रेम


जुलाई २००१ 
ईश्वर को प्रेम करने का अर्थ संसार विरोधी हो जाना नहीं है. जब हमारे जीवन में प्रेम होता है तो वह सबके लिये होता है उसमे सारी समष्टि समा जाती है. ईश्वर, प्रकृति, मानव उससे कुछ भी अछूता नहीं रहता. प्रेम की बाढ़ सब कुछ बहा कर ले जाती है, उसमें गहन ऊर्जा छिपी है, जो आस-पास की हर वस्तु को एक नए दृष्टिकोण से दिखाती है.

Thursday, July 28, 2011

मैं कौन हूँ


july 2001
साधक के जीवन में एक स्थिति ऐसी भी आती है जब परमेश्वर की स्मृति में उसका मन सहज रूप से लगने लगता है, उसे लगाना नहीं पड़ता, अर्थात वह अपने वास्तविक रूप को पहचान लेता है. बस एक झीना सा पर्दा है हमारे और उसके बीच. जब तक यह पर्दा है हमें उसकी पूजा करनी पड़ती है जबकि वह हर क्षण हमारी श्रद्धा का केन्द्र है ही. वही ‘मैं’ का आधार है, आत्मा के आधार के बिना मन कैसे टिक सकता है. बाहरी सुविधाओं के पीछे हम भागते रहते हैं पर कोई न कोई कमी रह ही जाती है और इसी में जीवन पूरा हो जाता है. उस एक से प्रीति होने पर परम सुविधा मिलती है जो कभी छूटती नहीं. हम वास्तव में क्या हैं यह न जानने के कारण ही सारा भ्रम है, एक अँधेरी रात में एक ठूंठ को एक व्यक्ति चोर समझता है दूसरा साधु और तीसरा रोशनी करके उसकी असलियत जान लेता है. हमें भी इस जगत की असलियत जाननी है, न ही यह हमारे राग के योग्य है न ही द्वेष के, तभी हम मुक्त हैं और वही हम हैं. 

ध्यान की शक्ति


ध्यान के समय जब मन किसी वस्तु का चिंतन करने लगे तो यह भाव करना होगा कि उस वस्तु को देखने वाला मानस चक्षु और सोचने वाला मानस भी उसी आत्मा का ही अंश है. अपनी श्वास पर ध्यान ले जाने से भी ध्यान पुनः टिक जाता है. हमारी श्वास तथा विचारों में बड़ा सम्बन्ध हैं, साँस को नियंत्रित करके हम अपनी भावनाओं को भी नियंत्रित कर सकते हैं. शरीर में होने वाले कई रोग जो नकारात्मक भावनाओं के परिणाम हैं, दूर किये जा सकते हैं. श्वास के द्वारा पहले हमें भावनाओं को सकारात्मक बनाना है और फिर ध्यान के द्वारा सुप्त शक्तियों को जगाना है प्रेम की शक्ति और ज्ञान की शक्ति.

Wednesday, July 27, 2011

भीतर-बाहर


अहंकार रूपी पवन हमारी मन रूपी तरंग को संसार सागर के तट से टकराती रहती है. जो हम इस दुनिया को बांटते हैं, वही हमें वापस मिलता है. सारा ब्रह्मांड एक प्रतिबिम्ब है एक प्रतिध्वनि है. हम जैसा दिखाना चाहते हैं, देखना चाहते हैं, वही हमें दिखाई पड़ता है. जो कुछ बाहर है वही भीतर है और जो कुछ भीतर है वही बाहर है. बाहर की सच्चाई को हम बुद्धि के स्तर पर समझ सकते हैं पर भीतर के सत्य को अनुभूति के स्तर पर समझना होगा. प्रतिपल अंतर को साक्षी भाव से देखने की कला विकसित करनी है. जो भी स्फुरणा जगे उसके प्रति सजग होकर संवेदना को देखना है. धीरे धीरे संवेदना शांत होती जाती है और स्फुरणा भी शांत होती जाती है. 

Monday, July 25, 2011

जागरण


मई २००१ 
उठ जाग मुसाफिर भोर भई” यह गीत बचपन में प्रभात फेरी में गाते थे पर इसमें किस जागरण कि बात कही गयी है तब यह समझ नहीं आता था. संत बताते हैं कि जागना है अपने जीवन के प्रति... कुछ बनने की दौड़ में जो द्वंद्व हम भीतर खड़े कर लेते हैं उनके प्रति. अकड़ जो हमारे मन को जकड़ लेती है बेहोशी की निशानी है, खाली मन जागरण की, क्योंकि मन का स्वभाव ही ऐसा है कि इसे किसी भी वस्तु से भरा नहीं जा सकता इसमें नीचे पेंदा ही नहीं है, तो क्यों न इसे खाली ही रहने दिया जाये व्यर्थ के झंझट से भी छूटे, मुक्ति का अहसास उसी दिन होता है जब सबसे आगे बढ़ने की वासना से मुक्ति मिल जाती है. 

Saturday, July 23, 2011

कर्म और कर्म फल


मई २००१ 
किसान यदि बीज बोते हुए सजग है तो फल अपने आप ही अच्छा आयेगा. कर्म करते समय यदि हम सजग रहें तो कर्म के फल की चिंता करने की जरूरत नहीं रहेगी. प्रकृति के इस नियम को जिसने मात्र बुद्धि के स्तर पर नहीं, अनुभूति के स्तर पर समझ लिया तो धर्म उसके जीवन में स्वतः आ जायेगा. धर्म सरल है उनके लिये जो चित्त से सरल हैं. करेले का बीज लगाकर कोई आम की आशा करे तो उसे क्या कहेंगे ऐसे ही कोई भी कर्म चाहे वह कितना ही छोटा हो स्वार्थ वश, मलिन भाव से अथवा क्रोध से किया गया हो तो परिणाम दुखद ही होगा. भीतर यदि संकीर्णता हो तो बाहर का सुख भी व्यर्थ ही सिद्ध होता है.