Sunday, April 28, 2013

तोरा मन दर्पण कहलाये


  अगस्त २००४ 
हमें अपने भीतर उस प्रज्ञा को जगाना है जो मन को धूमिल न होने दे, जैसे धूल से ढके दर्पण में चित्र स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ता वैसे ही अशुद्ध बुद्धि होने पर हम व्यक्तियों, घटनाओं तथा वस्तुओं को उनके सही रूप में नहीं देख पाते, सत्य का भान हमें नहीं होता. सत्य को परखने के लिए हमें उसे कई कोणों से देखना होगा. हम जो भी हैं अथवा हमारे इर्द-गिर्द का संसार, वातावरण जैसा भी है, उसे हमने ही बनाया है. हमारे भूतकाल की छाया हमारे वर्तमान पर पड़ रही है, हमारा वर्तमान ही भविष्य को बनाएगा. समस्त पूर्वाग्रहों को छोड़कर जो बुद्धि निर्णय देती है, जिस पर भूत की छाया न हो, वह शुद्ध है. मन को सारे संकल्पों-विकल्पों से मुक्त रखते हुए हमें वर्तमान का हर पल जीना है. ऐसा होते ही हम परम ऊर्जा से भर जाते हैं, हमारे भीतर सामर्थ्य आता है अंतर्मन को भेदकर भीतर छिपी क्षमताओं को बाहर लाने का. तभी भीतर ज्ञान के मोती निकलेंगे और जब ज्ञान स्थिर होगा वही प्रेम में बदल जायेगा. प्रेम जो हमारे व्यवहार द्वारा अन्यों तक जायेगा, स्वतः जैसे झरना बहता है.

Friday, April 26, 2013

सुख की आस सदा भरमाये


अगस्त २००४ 
कृष्ण कहते हैं, कामना यदि पूरी न हो तो क्रोध को जन्म देती है, क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति लोप और स्मृति विभ्रम से अशांति, अशांत व्यक्ति सुखी नहीं रह सकता. कामना यदि पूर्ण हो जाये तो मन पर उसका संस्कार गहरा होता जाता है और बार-बार हम उसकी पूर्ति चाहते हैं. अपने सहज सुख को भुलाकर, जो बचपन में हम कांच-मिट्टी के खिलौनों से ही अथवा तो ऐसे ही पाए हुए थे, हम क्षणिक सुखों के गुलाम बनते जाते हैं. लगता है जैसे हम अपनी आँखें बंद किये बैठे हैं. जो दाता है वह भिक्षु बना हुआ है. सुख की परिभाषा ही यदि गलत होगी तो सच्चा सुख हमें मिलेगा भी कैसे? जो किसी व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति पर निर्भर न हो. जो मुक्त करता हो, ऊर्जा से भर देता हो. जो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, ऐसा सुख ही हमें पूर्णता की और ले जाता है.

Thursday, April 25, 2013

साईं नाथ तेरे हजारों हाथ


  मन की व्यग्रता इस बात की द्योतक है कि हमें अभी जगत में रहना नहीं आया, जगत में रहना जब किसी को आ जाता है तो वह परमात्मा के द्वार पर रहने लायक भी हो जाता है. मान-अपमान, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों रूपी चक्की के पाटों में वही पिसने से बच जाता है. व्यर्थ की बातों में फंसकर जब हम स्वयं को उलझा लेते हैं, कल्पनाओं के जाल में फंसकर स्वयं को सुखी-दुखी करते हैं, तब हम यह भूल जाते हैं कि कल्पना का यह महल कब तक रहेगा, इसे तो गिरना ही होगा. प्रामाणिकता यदि हमारे आचरण में नही है तो सुख भी प्रामाणिक नहीं हो सकता. हमें तो उस शांति को पाना है जो हमारी निज की सम्पत्ति है, उस प्रेम को, जो हमारा स्वरूप है. जगत में जो कुछ भी घट रहा है वह  अनंत करवा रहा है, वही हमारा शत्रु बन कर आता है, वही मित्र बनकर, वही हमारे भीतर है, हमें अपने मूल स्रोत तक पहुँचाने के लिए वह निरंतर हम पर दृष्टि रखे है. हम सुरक्षित हाथों में हैं. 

Wednesday, April 24, 2013

एक ही जीवन रूप अनेक


 अगस्त २००४ 
 जीवन का उपवन कभी एक सा नहीं रहता, कभी वसंत तो कभी पतझड का सामना उसे करना ही पड़ता है, लेकिन इस परिवर्तन के पीछे भी जीवन स्वयं तो एक ही है, उस एक को स्थिर मानकर ही हम अस्थिरता का अनुभव करते हैं. मन है तो कभी उसमें संसार झलकता है कभी आत्मा, अब यह मन पर निर्भर करता है कि वह स्वयं को किस के साथ जोड़े. आत्मा से जुड़कर अपनी ऊर्जा को बचा सकता है, सहज रह सकता है, तब संसार में बिना आसक्ति के रहा जा सकता है. 

Tuesday, April 23, 2013

सबसे बड़ा संतोष धन


जुलाई २००४ 
संतजन कहते हैं, जो भी हम करें, सौ प्रतिशत लगकर करें तो हमारा वह कार्य भी सफल होगा और भीतर संतोष भी जगेगा. संतोष से सुख उपजता है जो भीतर के आनंद की ही झलक देता है. आनंद किसी कार्य का मोहताज नहीं बल्कि वह तो कार्यों के रूप में प्रकट होता है, वह सहज होता है जैसे इस जगत में सहज ही दिन-रात घटते हैं. उसके होने का कोई कारण नहीं, वह तो सब कारणों का कारण है. इसलिए सहज संतोष भाव में जब कोई होता है तो यह उसके भीतर से वैसे ही छलकता है जैसे फूल से उसकी सुगंध, झरने से उसका निनाद, तथा आकाश से उसकी नीलिमा. प्रकृति सहज है तभी तक सुंदर है वरना तो विनाश भी ढा सकती है, वैसे ही मानव जब तक सहज है, आनंद का स्रोत है, वरना उसके भीतर ज्वालामुखी भी फट सकते हैं. अपनी असहजता के कारण वह खुद के साथ-साथ औरों को भी पीड़ा देता है. 

Monday, April 22, 2013

समाधि ही देती समाधान


 जुलाई २०१३ 
 चित्त के समाधान के लिए पहला कदम है विनम्रता, उद्दन्डता से चित्त समाधि में प्रविष्ट नहीं हो सकता. अपना ही दृष्टिकोण सही है, यह दुराग्रह रखने वाला समर्पित नहीं हो सकता. चित्त यदि व्याकुल है तो अवश्य अपने मार्ग से भटका है. सुख मिलने पर सुखी और दुःख मिलने पर दुखी तो पशु भी हो लेते हैं, साधक दोनों से परे होने की कला सीखता है., आत्मारामी होता है. आत्मा अव्यय है, अविनाशी है, अप्रमेय है, प्रकृति इसके विपरीत है. समपर्ण के द्वारा ही प्रकृति के पार जाया जा सकता है. एकनिष्ठ चित्त ही समाहित होता है. समाहित चित्त ही समाधि तक पहुंचता है. 

Friday, April 19, 2013

नित नवीन सृष्टि का क्रम यह


जुलाई २००४ 
जीवन सभी प्राणधारियों में है, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु सभी के भीतर चेतना है. जब हमें यह लगता है कि जानने योग्य सब जान लिया तब हम जड़वत हो जाते हैं. हमारे भीतर जब तक सीखने की प्रवृत्ति काम कर रही है, तभी तक हममें चेतना जागती रहती है. जीवन प्रतिपल नया है, जन्म से लेकर आजतक हर पल हमारे लिए नया है, हर दिन एक नया सूर्योदय लेकर आता है, हर सुबह एक नया  संदेश लेकर आती है. हर दिन कुछ नया सिखाने ही आता है. हमारी हर श्वास पहले वाली श्वास से भिन्न होती है. इसी तरह वह ब्रह्म भी जो नूतन ढंग लेकर हरेक से मिलता है, नित नवीन है, कोई उसे पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर सकता, अथवा वह कब का पुराना पड़ गया होता. अनगिनत संतों, महात्माओं व भक्तों को उसका अनुभव हुआ है, पर सभी ने उसे अपने-अपने ढंग से बतलाया है.