Wednesday, September 14, 2011

मृत्यु बोध


दिसम्बर २००१ 
हर रात हम एक छोटी मृत्यु का अनुभव करते हैं, पर एक विश्वास के साथ कि कल सुबह पुनः सूर्योदय देखेंगे. एक दिन ऐसी भी रात आएगी जिसकी सुबह हमारे परिचित माहौल में नहीं होगी. उस वक्त हमारा ज्ञान, हमारा ईश्वर के प्रति विश्वास ही हमारे साथ होगा. जीवन सदा के लिए नहीं मिला है, यह स्मरण रहे तो हम इसे पूर्णता से जी सकते हैं, अन्यथा व्यर्थ की दौड में पड़ कर हम अपनी ऊर्जा बहाते हैं और कुछ सार्थक हाथ नहीं आता.  

Monday, September 12, 2011

भक्ति


दिसंबर २००१ 

भक्ति हृदय को शुद्ध करती है, इससे सामर्थ्य उत्पन्न होता है. ईश्वर की समीपता का अनुभव हमें भक्ति से ही होता है. भक्ति सरल है, सहज है, अन्य योगों के सिद्धांत कठिन लग सकते हैं पर भावपूर्ण हृदय को ईश्वर को समर्पित कर देना सरल है. भक्ति में स्वयं से ही स्वयं को पाना है, जबकि अन्य योगों में शरीर, मन व बुद्धि आदि को साधन बनाना है. 

Saturday, September 10, 2011

मिलन का क्षण


दिसंबर २००१ 

हमारा मूल तो वही है और वही हमें पोषता है. हमने न जाने कितने लेप खुद पर चढा रखे हैं. कभी बेबस और निरीह होकर सहानुभूति बटोरना चाहते हैं, कभी कुछ करके प्रशंसा बटोरना चाहते हैं. स्वयं राजा होकर मंगता बने बैठे हैं. कल्पना और स्मृति की दुनिया में विचरण करने वाले हम खुद से ही अपरिचित हैं. एक क्षण में ही यदि हम यह मुल्लमा उतार फेंके तो वही क्षण मिलन का क्षण होगा. एक पुकार यदि दिल से उठे तो वह सारे पर्दे खोल कर अपनी झलक दिखाता है. वह हमारा हितैषी हर पल बाट जोहता है कि कब हम भूले-भटके वापस घर लौट आयें.

Thursday, September 8, 2011

आत्मा की भाषा


दिसम्बर २००१ 

परदेश में कोई अपनी भाषा बोलने वाला मिल जाये तो जैसी खुशी होती है वैसी ही ध्यान में स्वयं को परमात्मा से मिलकर होती है... हमारी आत्मा उसी की भाषा बोलती है, मौन की भाषा ! जबकि मन संसार की भाषा बोलता है.. तभी दिल व दिमाग में द्वंद्व बना ही रहता है. यही द्वंद्व सारे तनाव का कारण है. ध्यान में चेतन मन शांत हो जाता है. मौन में संवाद होता है जिसकी भाषा अनूठी है और ध्यान से आने के बाद भी उसकी तरंगे मन तक पहुंच जाती हैं, कुछ पल को वह भी आत्मा के संग हो लेता है पर फिर दुनियादारी की धूल उस पर चढ़ जाती है, इसीलिए नियमित ध्यान वैसे ही जरूरी है जैसे नियमित स्नान.

Wednesday, September 7, 2011

क्षमा भाव


आध्यात्मिकता का एक सूत्र है, सदा दूसरों को क्षमा करते जाना...यदि हमने ऐसा स्वभाव नहीं बनाया तो आनंद व शांति हमसे दूर ही रहेंगे. आत्मभाव में स्थित रहना हमारा प्रथम और अंतिम कर्त्तव्य है, यदि हम हृदय को द्वेष से मुक्त नहीं रख पाए अर्थात अन्यों के दोष दर्शन में ही लगे रहे तो यह सम्भव ही नहीं हो सकता. एक सूक्ष्म बात यहाँ ध्यान देने की यह है कि मन व बुद्धि भी आत्मा के लिए पर ही हैं, अत स्वयं को भी दोष नहीं देना है... ईश्वर की न्याय व्यवस्था में अखंड विश्वास ही हमें ऐसा करने का साहस देता है.  

Tuesday, September 6, 2011

आत्मा का स्वराज्य


हमें अपने भीतर स्वराज्य की स्थापना करनी है. मन व इन्द्रियों का स्वामी बनना है. स्वयं का राज्य स्थापित होने का अर्थ है स्वयं को जानना और तब आनंद के लिए प्रयत्न नहीं करना पड़ता, सारा का सारा विषाद न जाने कहाँ चला जाता है. भय भी हृदय से पलायन कर जाता है. भाव शुद्धि होती है, प्राण शक्ति बढती है, और कुछ न भी हो तो परमात्मा के प्रति भक्ति का जन्म होता है. यही निष्काम भक्ति हमें पूर्ण संतुष्टि देने में समर्थ है. संसार की अन्य कोई वस्तु हमें सदा के लिए तृप्त नहीं कर सकती. परम चेतना ही इस विश्व का कारण है. एकमात्र उसी का शासन हमें अपने मन पर स्वीकार करना होगा यदि हम सदा के लिए परम शांति की कामना करते हैं.

Sunday, September 4, 2011

साधन और साध्य


नवम्बर २००१ 

प्रियजनों के स्नेह में जो आनंद झलकता है वह हमारी आत्मा का ही प्रकाश है. राग-द्वेष अर्थात आसक्ति व विरक्ति मन के कार्य हैं, स्वास्थ्य-रोग आदि देह के, जो सुख-दुःख के रूप में हमे मिलते हैं. वह हमारा वास्तविक परिचय नहीं है. आत्मा ही हमारा सच्चा स्वरूप है. देह व मन तो उपकरण मात्र हैं, साधन हैं, इनकी तृप्ति साध्य नहीं है आत्मा का पूर्ण उद्घाटन ही मानव का साध्य है. उसी में आनंद है और उसी में हमारी शक्तियों का पूर्ण विकास सम्भव है. मन यदि छोटी सी धारा है तो आत्मा सागर. जब तक धारा सागर तक न पहुंचे उसे चैन कहाँ से आयेगा.