Wednesday, May 7, 2014

प्रज्ञा का जब दीप चलेगा

फरवरी २००६ 
अज्ञान दशा में आत्मा तथा शरीर आपस में एकमेक होकर रहते हैं, जिससे तीसरा पदार्थ अहंकार उत्पन्न होता है, राग-द्वेष व मोह इसी अहंकार की सन्ताने हैं. ज्ञान दशा में दोनों पृथक रहते हैं, अलग-अलग प्रतीत होते हैं तब अहंकार का स्थान प्रज्ञा ले लेती है. प्रेम, शांति, आनन्द का अनुभव होता है जो प्रज्ञा का परिणाम हैं. तब हमारी दृष्टि में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता, प्रेम में सब समान होते हैं, प्रेम तभी टिकता है जब हम स्वयं को विशेष नहीं मानते, अहंकार ही भेद बुद्धि उत्पन्न करता है, तब जगत से हमारा सम्बन्ध नाराजगी का ही रहता है, हम दोष दृष्टि से मुक्त हो ही नहीं पाते. भले ही कोई कितने शास्त्र पढ़ ले जब तक भीतर आत्मा व देह अलग नहीं प्रतीत होते तब तक ईश्वर भी हमारी सहायता नहीं कर सकते. सूर्य तो चमक रहा है पर कोई अपनी खिड़की ही बंद रखे तो प्रकाश कहाँ से मिलेगा.  

Tuesday, May 6, 2014

सुंदर पथ है ज्ञान का

फरवरी २००६ 
ज्ञान में स्थित रहकर जीना ही वास्तविक जीवन है. ज्ञान का अर्थ है राग-द्वेष से मुक्त होकर जीना, जहां राग होगा वहाँ द्वेष भी होगा ही, जहाँ मान मीठा लगेगा अपमान कड़वा लगेगा ही. राग से छुटकारा पाने का उपाय यही है कि हम किसी की गलती कभी न देखें, जब तक हमें दोष दिखाई देते हैं तब तक प्रेम नहीं पनपा है ऐसा ही मानना चाहिए. ज्ञान में जीने का अर्थ यह भी है कि स्वयं को शुद्धात्मा देखें, व अन्यों को भी वैसा ही देखें. देह, मन आदि जड़ हैं, इन्हीं को नाम मिला है, जो हमारा नाम है वह वास्तव में इन्हीं का है, तो जो भी अनुभव होता है वह उसी को होता है, स्वयं उससे पृथक है, यह भाव दृढ़तर करते जाना है. तब कर्मों का बंधन नहीं होगा. कितना अद्भुत है यह ज्ञान जो सारे दुखों से मुक्त करता है, हमारे भीतर उस आनन्दमय राज्य का सृजन करता है, जिसकी कामना अनंत काल से मानव करता आया है. 

ज्योति प्रीत की जलती भीतर

जनवरी २००६ 
मन की धारा यदि भीतर की ओर मुड़ जाये तो राधा बन जाती है इसी तरह मन की हजारों वृत्तियाँ गोपियाँ क्यों नहीं बन सकतीं, हमारी ‘आत्मा’ ही वह कृष्ण है जिन्हें रिझाना है. जीवन का कोई भरोसा नहीं है, श्वास रहते-रहते उस तक जाना है, जाना है, कहना भी ठीक नहीं, वह तो सहज प्राप्य है. मध्य में जो आवरण है उसे हटाना है. संसार से सुख पाने की वासना का त्याग करना है, तभी सहज प्राप्त सुख दीखने लगेगा. एक ही निश्चय रहे तो सारी ऊर्जा उस एक की तरफ बहेगी. एक ही व्रत हो और एक ही लक्ष्य, भीतर के प्रकाश को बाहर फैलाना. जिसके आने पर जीवन में बसंत छा जाता है. सद्विचारों के पुष्प खिल जाते हैं और प्रीत की मंद बयार बहने लगती है. जैसे वसंत में दिन-रात समान हो जाते हैं, वैसे ही भीतर हानि-लाभ समान ही हो जाते हैं. 

Monday, May 5, 2014

धीरे धीरे हे मना

जनवरी २००६ 
अहंकार न रहे तो मौन स्वाभाविक ही उपजता है, बाहर का मौन ही फिर मन को भी मौन कर देता है. तब ‘स्वयं’ का अनुभव होता है, जिस क्षण भी यह अनुभव हुआ वह क्षण अपने आप में पूर्ण होता है, ऐसे क्षणों की श्रृंखला बन जाये तो ध्यान घटता है. ध्यान में हम स्वयं को देखते हैं, वहाँ द्रष्टा को दृश्य बना देते हैं, दूसरे दृश्यों का लोप हो जाता है. उस समय मन पूरा विश्राम पा रहा होता है. उसका शुद्धिकरण भी तभी होता है. पुराने संस्कार मिटते हैं था शुभ संस्कार दृढ़ होते हैं. जितना समय हम ध्यान में होते हैं परमात्मा के निकट होते हैं, तभी उसके प्रेम व शांति का अनुभव होता है. एक दिन ऐसा आता है जब पूर्ण आत्मा उघड़ जाती है, साधक को असीम धैर्य के साथ साधना करनी है और उस घड़ी का इंतजार करना है.

Saturday, May 3, 2014

नजर सदा हो अपनी ओर

जनवरी २००६ 
कभी–कभी ऐसा होता है कि उत्साह और प्रेम से भरे हम किसी से मिलने जाते हैं और जब लौटते हैं तो लगता है कहीं कुछ खो गया है, जैसे ऊर्जा निचोड़ ली गयी है. इसके कारण में पड़ने से तो अच्छा है अपने मन को देखें, कहीं वह अहंकार का शिकार तो नहीं हो गया था, कहीं भेद भरा वर्तन तो नहीं किया, कहीं लोभ तो नहीं जगा जिसकी पूर्ति में बाधा आई हो और मन बुझ गया हो. कहीं वाणी का दोष तो नहीं हुआ, मौन से बढकर सम्प्रेष्ण का कोई साधन नहीं है पर मौन को त्याग हम वाणी का आश्रय लेते हैं, न कहने योग्य भी कह जाते हैं. अपनी ऊर्जा स्वयं ही गंवाते हैं, जो चुकता है वह अहंकार ही है, जिसे पीड़ा होती है वह भी अहंकार था, ‘स्वयं’ तो ऊर्जा का अनंत भंडार है, ‘स्वयं’ तो प्रेम ही देना जानता है, ‘स्वयं’ तो सदा एक सा है, सदा एक सा था, एक सा रहेगा...मौन की तरह... 

Friday, May 2, 2014

ऊधो मन नाहीं दस बीस

जनवरी २००६ 
मन यदि एक बार ईश्वर को अर्पित कर दिया तो फिर लाख कोशिश करने पर भी वापस नहीं मिलता, बार-बार उसी की ओर लौटना चाहता है. मन आखिर क्या है क्या ? मन एक रास्ता है संसार से ईश्वर की ओर जाने का रास्ता ! यह एक पुल है बाहर से भीतर जाने का अथवा भीतर से बाहर आने का. मन सत्पथ है, प्रेम पथ है जो प्रभु के पास हमें ले जाता है ! मन यदि आत्मा से जुड़ा रहेगा तभी स्वस्थ रहेगा. मन जब आत्मा में विश्राम पाकर लौटता है तो सबल हो जाता है. आत्मा उसका घर है और संसार उसका कर्मक्षेत्र है. बुद्धि भी तभी प्रज्ञावान होती है, जब आत्मा से पोषित होती है. 

Thursday, May 1, 2014

जहाँ अभाव नहीं है कोई

जनवरी २००६ 
कभी-कभी साधक को लगता है कि मन स्थिर नहीं है, ऊपर-ऊपर से देखें तो लगता है कोई विशेष कारण नहीं है पर गहराई में जाकर देखें तो पता चलता है मन किसी अभाव का अनुभव कर रहा है, उसे क्या चाहिए यह भी उसे पता नहीं है, पर अभाव उसी को होता है जिसकी कोई कामना शेष रह गयी है. मानव की सबसे बड़ी कामना होती है खुद को जानने की, आनंद को पाने की, पर मन यह नहीं जानता कि स्वयं को मन के पार जाकर ही पाया जा सकता है. मन को मिटना होगा उस आनन्द को पाने के लिए और मन वास्तव में है भी मरणशील क्योंकि जड़ प्रकृति का अंश है. स्वयं को जानने का अर्थ यही है कि द्रष्टा भाव में रहकर मन में उठने वाली वृत्तियों को देखना, देखने मात्र से वह शांत हो जाता है और स्वयं ही चुप होकर बैठ जाता है.