Wednesday, June 18, 2014

धर्म वही जो मुक्त करे

जून २००६ 
सद्गुरु कहते हैं, जो भीतर गया वह भी तर गया, अपने में शिफ्ट होकर ही कोई तर सकता है. मुक्ति का आनंद न तो गिफ्ट में मिलता है न ही किसी के द्वारा दी लिफ्ट में मिलता है, वह तो अपने में शिफ्ट होने पर मिलता है. जीवन में मुक्ति की साधना करनी है तभी हम स्वयं में आ सकते हैं, यानि पहले देहस्थ फिर मनस्थ और अंत में आत्मस्थ. अभी तो हमारा मन चौबीस घंटे बाहर ही भागता रहता है. यद्यपि हम जो भी करते हैं मुक्ति के लिए ही करते हैं पर उसका अंत बंधन में होता है. हमारा प्रेम भी बंधन हो जाता है और ज्ञान भी. स्वयं में गये बिना मोक्ष सम्भव नहीं है.                                                                                                                    

Tuesday, June 17, 2014

लघुता में है छिपा महान

अप्रैल २००६ 
अस्तित्व सूक्ष्म है, उससे परिचय हो जाये तो हम सूक्ष्मतर आत्मा के स्वरूप में रहने लगते हैं, तब हम लघुत्तम पद में आने लगते हैं. क्रिया से अहंकार होता है, पर यह ज्ञान क्रिया से नहीं मिलता, ज्ञान से ही मिलता है. कर्म हमें पहचान देता है, पर वह पहचान अहंकार जनित होने के कारण सुख-दुःख से प्रभावित होती रहती है. ज्ञान से मिली स्वयं की पहचान स्वभाव जनित है अतः कभी बदलती नहीं, यह हमें जगत से तोडती नहीं, विशिष्ट नहीं बनाती वरन सारी दुनिया तब अपनी हो जाती है. कोई विरोध नहीं रहता. छोटा ‘मैं’ एक विशाल ‘मैं’ में बदल जाता है जो पूर्ण है. 

Monday, June 16, 2014

सुरभि समान सहज सुख राशि

अप्रैल २००६ 
सच्चा सुख वह है जो शाश्वत है. वह व्यक्ति, वस्तु, स्थान से मिल ही नहीं सकता क्योंकि ये सभी प्रतिपल बदल रहे हैं. जब तक हमारी दृष्टि में द्वैत है, वह सुख हमें नहीं मिल सकता. अद्वैत का अनुभव होते ही दोष दृष्टि मिट जाती है, मन व वाणी का तप तब सहज ही घटता है. तब यह प्रतीति होने लगती है कि जीवन प्रभु के प्रेम से भरपूर है, उसी तरह जैसे फूलों में खुशबू. एक अखंड शांति तब साये की तरह हर क्षण साथ रहती है.


Saturday, June 14, 2014

द्रष्टा से जो जुड़ जाता है

अप्रैल २००६ 
मन की कल्पना ही हमें सुख-दुःख देती है, जो इस मन को कभी स्थिर कभी चलायमान देखता है, वही तत्व जानने योग्य है. जो हर एक के पीछे सामान्य सत्ता के रूप में स्थित है उससे जुड़े रहें तब प्रभु हमें बुद्धियोग देते हैं. उस जानने वाले को जानकर ही सन्त सहज हो जाते हैं और हमें भी वैसा ही बनाने का प्रयत्न करते हैं. हम जितने-जितने सरल व सहज होते हैं, उतने-उतने ही दुखों से दूर होते जाते हैं, जब हम सारे आग्रह छोड़ देते हैं तो जीवन अपने आप चलने लगता है. सारे कार्य तो वैसे भी हो रहे हैं, हम व्यर्थ ही स्वयं को कर्ता मानकर अभिमान का भार ढोते हैं. 

Friday, June 13, 2014

जिसकी डोरी उसके हाथ


यदि कोई साधना के पथ पर चलना चाहे तो ईश्वर उसके लिए सुविधा कर देते हैं. परमात्मा और सद्गुरु हर पल साधक को अपनी नजर में रखते हैं. एक पल के लिए भी वह उनसे जुदा नहीं है. उसके भीतर के अज्ञान को मिटाने के लिए भी वह तरह-तरह की परिस्थितयां जीवन में भेजते रहते हैं. हृदय में जब तक कोई भी कामना शेष रहे तब तक हम सत्य का अनुभव नहीं कर सकते, तो वह उसकी शुभकामना की पूर्ति करने में भी बाधा खड़ी कर देते हैं. साधक को अपने अंतर को पूर्णतया खाली करना है, सारे राग मिटाने हैं, जगत के माध्यम से जीवन में ऐसे कितने ही पल आते हैं जब उसे यह जांचने का मौका मिलता है कि भीतर समता बनी है या नहीं. ईश्वर के रूप में ही वह सुखद या दुखद परिस्थिति को स्वीकारता है. अपने जीवन की पूरी बागडोर प्रभु के हाथों में सौंप देना ही समपर्ण है. जहाँ भेद है वहाँ समपर्ण है ही नहीं. ध्यान में जो एकता अनुभूत हो ती है वही एकता यदि हर समय अनुभव करें तो बाह्य परिस्थिति हमें विचलित नहीं कर सकती. 

Thursday, June 12, 2014

हर पल कोई साथ सदा है

अप्रैल २००६ 
एक समय ऐसा आता है, जब साधक को लगता है कि उसके जीवन की कहानी का सूत्रधार कहीं बैठ-बैठा इसके पन्नों को खोल रहा है, बाद में कुछ घटने वाला है इसके लिए वह पहले पृष्ठभूमि तैयार करता है. सदा ही ऐसा होता आया होगा पर पहले सजगता नहीं थी. ईश्वर को अपने भक्तों का अहंकार जरा भी पसंद नहीं है, प्रकृति को भी हमारा प्रमादी रहना पसंद नहीं है, तभी तो उसके नियमों के विपरीत चलने पर हमें उसका परिणाम भुगतना ही पड़ता है. जो हम दूसरों के साथ करते आए हैं, वही जब खुद के साथ घटने लगता है तभी हम सीखते हैं.  


Wednesday, June 11, 2014

बिन विवेक नहीं होए प्रतीति

अप्रैल २००६ 
चंचल बालक की तरह मन संकल्प-विकल्प करता है पर समझदार माँ की तरह बुद्धि उसे सम्भालती है, मन एक निरंकुश अश्व की तरह छलांगे मरना चाहता है पर सवार की तरह बुद्धि उसे सही रास्ते पर लाकर नियमित चाल से चलना सिखाती है. साधक अपने मन अथवा विचारों का ही तो प्रतिबिम्ब है. मन एक आईने की तरह होता है जिसमें विचार झलकते हैं, यदि बुद्धि का साथ हो तो मन का दर्पण उजला रहता है अथवा वह धुंधला जाता है और वह अपने आप को ही नहीं पहचान पाता, सब अस्पष्ट हो जाता है. और ऐसा मन लिए वह नये संकल्प करता है और धीरे-धीरे एक ऐसे कुचक्र में फँसता जाता है जिसमें से निकलना कठिन होता जाता है, विवेक को प्रश्रय दिए बिना उद्धार नहीं होता.