Saturday, July 12, 2014

सत्य ही हो लक्ष्य हमारा

सितम्बर २००६ 
कृष्ण व्यापक है, परम सत्य व्यापक है किन्तु हम मद तथा मूढ़ता की कारण उसे देख नहीं पाते. सत्य में स्थित रहकर कोई स्वयं को भूल नहीं सकता. हर हाल में जो शांत है, भीतर की समता बनाये रखता है, वह भक्त कृष्ण का प्रिय है. कृष्ण तथा सद्गुरु हमारे मद को दूर करने के लिए कभी-कभी कठोर हो जाते हैं. जब हम सत्य की खोज में निकलते हैं तो मन भटकाता है, हम केंद्र से दूर हो जाते हैं. सत्य शास्त्र से नहीं मिलता, शास्त्र उसका अनुमोदन भर करते हैं. हम जहाँ हैं वहीं थमकर देखने से मिलता है. सत्य जब प्रकट होता है तो ही भीतर का प्रेम प्रकट होता है, उसी प्रेम के कारण भक्त कभी गाता है, अश्रु बहाता है, नृत्य करता है.


Friday, July 11, 2014

बिन पुरुषार्थ सफल नहीं कोई

सितम्बर २००६ 
जब शरीर में पानी का स्तर कम हो जाता है तो हमें प्यास लगती है. जब मन में आनंद का स्तर कम हो जाता है तब ज्ञान की जरूरत होती है. ज्ञान हमें बताता है कि हम शुद्ध आत्मा हैं. शुद्धता शांति और सुख की जननी है. जहाँ ये चारों हैं, वहाँ प्रेम आता है, जिसके पीछे-पीछे शक्ति आ जाती है और इन सबके होने पर हमें पता चलता है कि हम आनन्द स्वरूप हैं. जब इतने सारे सद्गुण हमारे भीतर विद्यमान हैं तो हमें कमी का अहसास क्यों होता है, क्योंकि हम अपने को पहचानते नहीं, इन्हें पाने के लिए हमें वैसे ही पुरुषार्थ करना पड़ेगा जैसे भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करते हैं. 

Wednesday, July 9, 2014

तेरा तुझको अर्पण

सितम्बर २००६ 
संतजन कहते हैं परमात्मा को अपना प्रेम अर्पित करो तो कृपा रूप में वही वापस मिलेगा. प्रसाद भी वही होता है जो प्रभु के चरणों में अर्पित करके वापस मिलता है. जो हम देते हैं उससे कई गुणा लौटा कर वह हमें देते हैं. परमात्मा का बखान करना सूर्य को दीप दिखाने जैसा ही है फिर भी हृदय चाहता है कि वाणी उसका बखान करे, आँखें चाहती हैं कि आँसू उनका बखान करें और मन चाहता है कि भाव उसका अनुभव कर शब्दों के माध्यम से उसकी सुगंध दूर-दूर तक फैलाएं ! ‘रसो वैः सा’ वह परमात्मा रस पूर्ण है, पर उसका स्वाद तो उसकी अनुभूति होने पर ही मिल सकता है. एक न एक दिन तो सभी को उस पथ का राही बनना है.

Tuesday, July 8, 2014

वही साँवरा संवारे मन को

सितम्बर २००६ 
ध्यान से पूर्व यदि कोई संकल्प करें तो ध्यान उसे पूर्ण करने की सामर्थ्य देता है. असम्भव कार्य तो मन को शांत करना ही है, ध्यान इसे भी सम्भव बना देता है. जो सहज प्राप्य है, हमारे भीतर है, जो हमसे जुड़ा है, जो है तो हम हैं, हमें उसी का ज्ञान नहीं है, वह कौन है ? जब तक हम संसार से सुख पाने की कामना भीतर संजोये रहेंगे तब तक उसका मिलना नहीं होगा. ध्यान हमें भीतर का सुख देता है, भीतर के द्वार पर खटखटाना सिखाता है, भीतर एक अमृत का घट  भरा है जिस पर मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के चार पर्दे पड़े हैं, ध्यान उन्हें हटाता है और हम उस अमृत का पान करने में सफल होते हैं. न जाने कितने जन्मों की कितनी गांठें हमने अपने भीतर बाँध रखी हैं, कितने दुःख कितने भय और दर्द भीतर दबे पड़े हैं. ध्यान उन्हें निकाल के अंतःकरण स्वच्छ करता है. जैसे कोई पार्लर में जाये और नया व सुंदर होकर बाहर निकले वैसे ही हमारे मन को सुंदर बनाने का कार्य ध्यान करता है. सहज होकर परम को समर्पित होकर जब हम बैठते हैं तो वह अपना काम सुगमता से कर पायेगा. केश बनाने वाला सिर को चाहे जैसा घुमाये हम कहाँ दखल देते हैं, परमात्मा हमारे मन का ब्युटीशियन है, पूरा खाली होकर नम्र भाव से जब अपना मन उनके हवाले कर देते हैं चाहे वह उसे मोड़े, घुमाये, और फिर हम जब ध्यान से बाहर आयेंगे तो मन आत्मा के दर्पण में चमचम करता हुआ दिखेगा, हम शायद स्वयं ही उसे न पहचान सकें !  

Monday, July 7, 2014

चलती चाकी देख के

सितम्बर २००६ 
संतजन कहते हैं कि हम समस्या मूलक भी बन सकते हैं और समाधान मूलक भी. यदि हम अपने केंद्र से जुड़े नहीं हैं तो समाधान मूलक हो जाते हैं. केंद्र से जुड़े रहने के लिए एक आधार चाहिए, एक सूक्ष्म तन्तु, जो कि प्रेम ही हो सकता है. यदि हम परिधि पर ही रह गये तो दूसरों के साथ-साथ स्वयं के लिए भी समस्या खड़ी कर देंगे. परिधि पर रहने से हम डगमगाते रहते हैं, केंद्र से जुड़े रहना स्थिरता प्रदान करता है. आत्मा केंद्र है, मन परिधि है, मन स्वयं ही योजनायें बनता है फिर उन्हें तोड़ता है. वह कल्पनाओं का जाल अपने इर्द-गिर्द बुना लेता है. हमें सच्चाई की ठोस जमीन चाहिए न कि कल्पना का हवा महल. हम सत्य के पारखी बनें.  

Sunday, July 6, 2014

असली याद वही करता है

सितम्बर २००६ 
भक्त परमात्मा की कृपा को हर क्षण अनुभव करता है. गुरू के वचन उसके लिए अमृत के समान होते हैं जो भीतर की सारी पीड़ा को धो डालते हैं. वह सद् मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं. उनकी दी हुई शक्ति से भर कर वह भविष्य के प्रति आशावान रहता है और वर्तमान के प्रति सजग. भक्त कभी उसे याद न भी करे तो वह स्वयं अपनी याद दिलाता है. कभी-कभी जो भक्त के भीतर आनन्द के फूल बेवजह ही खिलने लगते हैं, गीत स्वतः झरने लगते हैं तो उसी ने किसी रूप में पुकारा होता है. उसकी महिमा के गीत यूँही ही तो नहीं गाए गये. वह क्या है यह तो शायद वह स्वयं भी नहीं जानता.  

एक डोर बांधे है सबको

सितम्बर २००६ 
लक्ष्य का चुनाव, एकाग्रता, तादात्म्य तथा अंत में गुणों का अपने भीतर संक्रमण यह साधना का क्रम है. साधक का लक्ष्य तो भाव शुद्धि, वाणी शुद्धि, तथा कर्म शुद्धि का ही हो सकता है. ये तीनो बातें सद्गुरु में अथवा इष्टदेव में हैं. उसके साथ तादात्म्य हो जाये तो उसके गुण अपने आप भीतर प्रवेश करने लगेंगे. जो चेतना हमारे भीतर है वही उनके भीतर है, उन्हें उसका ज्ञान है हम चाहे इससे अनभिज्ञ हों. वही चेतना हरेक के भीतर है, सभी एक-दूसरे पर आश्रित हैं, इसका बोध हमें भी करना है. स्वयं को सारी सृष्टि से पृथक मानना ही अहंकार है, जो सारे दुखों का कारण है.