Thursday, December 8, 2016

पूर्णमदः पूर्णमिदं

९ दिसम्बर २०१६ 
उपनिषद कहते हैं सृष्टि पूर्ण है, पूर्ण ब्रह्म से उपजी है और उसके उपजने के बाद भी ब्रह्म पूर्ण ही शेष रहता है, सृष्टि ब्रह्म के लिए ही है. इस बात को यदि हम जीवन में देखें तो समझ सकते हैं मन पूर्ण है, पूर्ण आत्मा से उपजा है अर्थात विचार जहाँ  से आते हैं वह स्रोत सदा पूर्ण ही रहता है, मन आत्मा के लिए है. विचार ही कर्म में परिणित होते हैं और कर्म का फल ही आत्मा के सुख-दुःख का कारण है. यदि आत्मा स्वयं में ही पूर्ण है तो उसे कर्मों से क्या लेना-देना, वह उसके लिए क्रीड़ा मात्र है. हम इस सत्य को जानते नहीं इसीलिए मात्र 'होने' से सन्तुष्ट न होकर दिन-रात कुछ न कुछ करने की फ़िक्र में रहते हैं. 

Tuesday, December 6, 2016

टिक जाये जब मन ध्यान में

७ दिसम्बर २०१६ 
जीवन के स्रोत से जुड़े बिना मन सन्तुष्ट नहीं हो सकता, जिस तक जाने का उपाय है ध्यान। पहले-पहल  जब कोई ध्यान का आरम्भ करता है तो भीतर अंधकार ही दिखाई देता है, विचारों का एक हुजूम न जाने कहाँ  से आ जाता है, किन्तु साधना व निरन्तर अभ्यास से मन ठहरने लगता है और उस स्रोत की झलक मिलने लगती है जहाँ  से सारे  विचार आते हैं. मन के पार जाये बिना कोई मन को देख नहीं सकता उस पर नियंत्रण का तो सवाल ही नहीं उठता। ध्यान का  अनुभव किये बिना उस अनन्त शांति का स्वाद नहीं मिल सकता जिसका जिक्र सन्त कवि करते हैं, ध्यान ही वह राम रतन  है जिसे पाकर मीरा नाच उठती है. एक मणि  की तरह वह भीतर छिपा है जिसकी खोज ही साधक का लक्ष्य है.

Monday, December 5, 2016

मन है छोटा सा

६ दिसम्बर २०१६ 
जैसे हम अपने घर में वस्तुओं का संग्रह करते रहते हैं, न केवल आवश्यक वस्तुओं का बल्कि कई बार तो ऐसी वस्तुओं का भी जिनकी आवश्यकता कभी नहीं पड़ती अथवा तो पुरानी वस्तुएं जिनकी उपयोगिता भी नहीं रही ; उसी तरह हम मन में विचारों का भी संग्रह करते चले जाते हैं, मन जो एक उपवन बन सकता था उसे अस्त-व्यस्त जंगल बना देते हैं जहाँ  यादों के जाल  हैं और मान्यताओं और विश्वासों के कैक्टस भी. जहाँ  फूल खिलने के लिए सूर्य की रौशनी को पहुँचने  के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है. आस-पास का वातावरण खुला-खुला हो, जरूरतें कम हों तो मन भी हल्का रहता है और इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि  इस दुनिया से रुखसत करते समय हमें अल्प पीड़ा होगी क्योंकि जो छूट रहा होगा वह थोड़ा सा ही होगा।

जब जैसा तब तैसा रे

५ दिसम्बर २०१६ 
जीवन हमें नित नए रूप में मिलता है. यदि हमारा मन सीमाओं में बंधा है, मान्यताओं में जकड़ा है तो हम इसकी नवीनता को अनदेखा कर देते हैं और एक ही ढर्रे में जिए चले जाते हैं. यदि हर पल को वह जिस रूप में मिलता है वैसा ही स्वीकार करने का स्वभाव बना लिया जाए तो मन फूल की तरह ताजा बना रहेगा और निर्भार भी. 

Sunday, December 4, 2016

योग साधना होगा सबको


संसार का अर्थ है जो पल-पल बदलता है, अगले पल क्या होने वाला है कोई नहीं जानता. कोई कितना भी प्रयास करले  उसके जीवन की परिस्थितियां सदा उसके अनुकूल नहीं रहतीं। हर सुख अपने पीछे दुःख छिपाये है, तो आखिर मानव के पास कोई विकल्प है या नहीं, इसका उत्तर योग के द्वारा ही मिल सकता है. योग ही एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा हर मानव अपने भीतर एक ऐसी अवस्था को प्राप्त कर सकता है जिसे बाहर की कोई परिस्थिति छू भी नहीं पाती। योगी ही सदा समता में रहना सीख पाता है.  

Friday, December 2, 2016

प्यास लिए मनवा हमारा यह तरसे


जीवन का उद्देश्य क्या है, यदि कोई गहराई से इस पर सोचे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि  हर आत्मा अखंड प्रसन्नता का अनुभव करना चाहती है. उसके सारे  प्रयास इसी दिशा में होते रहते हैं. इन्द्रियों के विषयों के द्वारा सुख प्राप्त करना उसमें सबसे पहला साधन है. धन के बिना यह सम्भव नहीं तो मानव श्रम करता है, सुख-सुविधा के साधन जुटाता है. विकास की ओर  बढ़ता हुआ समाज उसी सुख की आशा करता है जो आत्मा की पुकार है. समाज सेवा के द्वारा भी कुछ लोग संतोष  का अनुभव करते हैं और कई पुण्य  कमाकर, किन्तु बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो इस सच्चाई को स्वीकार करते हैं कि जिस सुख की तलाश वह बाहर कर रहे हैं वह सहज ही उन्हें  मिल सकता है. ऐसा सुख ही अनवरत बहती हुई धारा  की तरह निरंतर उन्हें तृप्त कर सकता है. इसके बाद वे जो कुछ भी करते हैं उसके पीछे कुछ पाने की कामना नहीं रहती बल्कि भीतर का संतोष ही कृत्यों के रूप में बाहर प्रकट होता है.

Thursday, December 1, 2016

ऋत के साथ एक हुआ जो

२ दिसंबर  २०१६
जब हम ऋत  के नियमों का  पालन करते हैं, उसके साथ जो एक हो जाते हैं, तब  जीवन से द्वंद्व मिट जाता है. आचरण को जो शुद्ध कर लेता है बहुत सारी  परेशानियों से बच जाता है, किन्तु जो न प्रकृति के साथ एक होता है न ही सामान्य आचार  का सम्मान करता है वह दुःख को निमन्त्रण दे रहा होता है. परमात्मा अथवा प्रकृति हर हाल में सबके प्रति समान व्यव्यहार करती है हम स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माण करते हैं.