अल्प से हमें सुख
नहीं मिलता, हमें अधिक की चाह है, किन्तु अधिक मिलने पर और अधिक की चाह खत्म नहीं
होती. इसलिए संत कहते हैं हम अल्प से संतुष्ट होना सीख जाएँ तो अधिकतम से मिलने
वाले आनंद को महसूस कर सकते हैं. जीवन का गणित भौतिक गणित से उल्टा है. यहाँ सब
कुछ छोड़कर हम सब कुछ पा सकते हैं. संसार में बहुत कुछ पाकर भी कुछ नहीं पाया, ऐसा भी
अनुभव कर सकते हैं. मानव के लिए जीवन में सबसे बड़ी संपदा है मन का उत्साह,
उत्साहित व्यक्ति अपना रास्ता खोज ही लेता है और जगत को उससे क्या लाभ मिल सकता
है, इसके विषय में चिन्तन करता है. जिसके जीवन में जड़ता है, वह स्वयं का लाभ भी
नहीं कर पाता, वह लोभी हो जाता है. लोभ ही हिंसा को जन्म देता और अंततः दुःख में
ले जाता है. अंतर में सेवा का भाव ही व्यक्ति को उदार बनता है और एक दिन अनंत प्रेम
का फल उसके जीवन में लगता है. ऐसा साधक अस्तित्त्व के प्रति कृतज्ञ होकर उसके
साथ एकत्व का अनुभव भी कर सकता है.
Friday, March 29, 2019
Thursday, March 28, 2019
न द्वेष्टि न कांक्षति
भगवद् गीता में कृष्ण कहते
हैं जो न किसी से द्वेष करता है और न ही किसी की आकांक्षा करता है, वह मुक्त ही है. मन में यदि किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के प्रति द्वेष है तो मन
शांत रह ही नहीं सकता, अशांत मन में सुख नहीं टिकता और सुख की राह पर चलकर ही तो
आनंद के फूलों को पाया जा सकता है. परमात्मा प्रेम, शांति और आनंद ही तो है. यदि
भीतर ये तीनों नहीं हैं तो उससे मुलाकात हो नहीं सकती, और यदि हम उससे ये तीनों
मांगते हैं तो ऐसे हृदय में जहाँ द्वेष है, इन्हें रखेंगे कैसे. आग और पानी जैसे
एक साथ नहीं रह सकते, वैसे ही शांति और दुःख एक साथ नहीं रहते. इसी प्रकार जिस
हृदय में आकांक्षा बसती है, वहाँ भी बेचैनी है, फिर ईश्वर को पुकारने का धैर्य
कहाँ बचता है. यदि उससे आकांक्षा पूर्ण करने की प्रार्थना की तो वह पूरी हो भी
सकती है पर उससे मिलन नहीं होगा और कुछ समय बाद एक नई आकांक्षा जन्म ले लेगी.
परमात्मा के निकट जाना हो तो मन को खाली करके जाना होगा, तभी वह स्वयं आकर उसमें
रहेगा.
Wednesday, March 27, 2019
तेरी है जमीं तेरा आसमां
यह पृथ्वी हमारा घर
है, इसका नीला समुन्दर और विशाल गगन मंडल हमारी कल्पनाओं को बहने और उड़ने के लिए एक
सहज और सुंदर आधार देता है. हरे-भरे जंगल और सुंदर पशु-पक्षी इसको कितना आकर्षक
बनाते हैं. यह सुंदर पृथ्वी विभिन्न अन्नों व फलों-शाकों से हमें पोषित करती है. चन्द्र
और सूर्य रात और दिन के प्रहरी की तरह जीवन को विकसित होने के लिए ऊष्मा देते हैं.
मानव की गरिमा इस बात में है कि वह इस सारे आयोजन का साक्षी है, वह चाहे इसमें
अपना अल्प योगदान ही दे सकता हो किन्तु यदि उसकी चेतना विकसित होकर इसका आनंद भी
लेना सीख जाती है, तो परमात्मा का तात्पर्य सिद्ध हो गया जानना चाहिए. मानव जब
स्वार्थ में या संकीर्णता के कारण इस सृष्टि को आँख भर कर निहारे भी नहीं और इसे
नष्ट करने के उपाय खोजे तो दिव्यता का अपमान होता है. जो सत्य, शिव और सुंदर है
उसे देखने के लिए पहले भीतर उसके प्रति सम्मान और प्रेम तो जगाना ही होगा.
ज्ञान के पथ पर चलता है जो
संत कहते हैं जैसे
एक ही धातु से भिन्न भिन्न आकार व क्षमता वाले उपकरण बनाये जा सकते हैं, एक धातु से ही भगवान की मूर्ति भी बन सकती है और
हथियार भी गढ़े जा सकते हैं. उसी प्रकार चेतना शक्ति एक ही है उसी से प्रेम भी
प्रकट हो सकता है और नफरत भी. अक्षर वही हैं, एकता का संदेश भी दे सकते हैं और वैमनस्य की आग भी
फैला सकते हैं. सुर और असुर एक ही ऋषि की संताने हैं. यह हमारे ज्ञान पर निर्भर
करता है कि हम किसे चुनते हैं और किस वस्तु का प्रयोग किस प्रकार करते हैं. अंततः
अज्ञान ही सारे क्लेशों के मूल में है और विवेक ज्ञान द्वारा ही इस अज्ञान को
मिटाया जा सकता है. अनुभव के स्तर पर होने वाला ज्ञान ही वास्तव में विवेक है, जो
सत्य-असत्य, सही-गलत, नित्य-अनित्य का भेद करना सिखाता है. ऐसा ज्ञान ही वक्त पड़ने
पर हमारे काम आता है.
Tuesday, March 26, 2019
यज्ञ बने यह जीवन अपना
समय की धारा अपनी
सहज गति से बहती जाती है. कोई उसके तट पर बैठ कर भी प्यासा रहे तो यह उसकी भूल है.
जीवन का हर पल अपने भीतर एक सम्भावना को व्यक्त करने की क्षमता रखता है. कभी हम उस
पल को पहचान लेते हैं और स्वयं के भीतर उस तृप्ति को महसूस करते हैं जो मन को
अभीप्सित है. अक्सर हम समय को व्यर्थ ही गुजर जाने देते हैं. ऐसा नहीं है कि वह
तृप्ति कोई ऐसी वस्तु है जिसे हम सहेज कर रख सकते हैं, पर जो पल हम सजगता के साथ
जीते हैं वे भविष्य के लिए एक थाती बनकर हमारे साथ हो लेते हैं. जो समय यूँही चला
जाता है वह खुले हुए नल से नाली में बहते पानी की तरह ही बह जाता है, उसका कोई प्राप्य
नहीं है. सृष्टि में प्रतिपल कुछ न कुछ घट रहा है, मानव को छोड़कर सभी एक यज्ञ में
अपनी आहुतियां डाल रहे हैं. हमें भी अपने हिस्से का योगदान इसमें करना है, यह भाव
बना रहे तो प्रकृति उसके लिए साधन जुटा ही देती है.
Friday, March 22, 2019
बाँध सके न कर्म जिसे
जीवन के दो ढंग हो सकते हैं. पहले में हम अपने सुख-दुख के लिए स्वयं
को जिम्मेदार समझते हैं और दूसरे में जगत को. संसार में रहते हुए जो भी कर्म हमें
करने हैं उनके पीछे की चेतना यदि पहले प्रकार की है तो वह कर्म को पूरी निष्ठा के
साथ करेगी, व्यक्तिगत हानि-लाभ से ऊपर उठकर जो भी आवश्यक है उसके लिए प्रयत्न
करेगी. जबकि दूसरे प्रकार की चेतना वाले व्यक्ति कर्म को भार भी समझ सकते हैं और
अपने अहंकार को बढ़ाने का साधन भी. कर्म चाहे कोई भी हो, सेवा, दान, धर्म अथवा
खेती, नौकरी और व्यापार, इसे करने वाले के मन की स्थिति कैसी है इस बात पर उस कर्म
का फल उसे मिलेगा. स्वयं को जाने बिना हम यह कभी नहीं जान पाएंगे कि किस कर्म का
कौन सा फल हमने अपने लिए नियत कर लिया है. इसीलिए योग साधना का इतना महत्व है.
Monday, March 18, 2019
बासंती बहे बयार जब
फागुन माह के आगमन के साथ ही ह्रदयों में इन्द्रधनुष बनने-संवरने
लगते हैं, और पूर्णिमा आते-आते दिलों में उमंग बढ़ जाती है. इस बासंती रुत में प्रकृति
अपने पूरे श्रृंगार के साथ खिल जाती है. पलाश, कंचन, सेमल और अशोक के वृक्ष
कुसुमों का परिधान पहन लेते हैं. नींबू और आम के वृक्ष जैसे साल भर से संग्रहित
हुआ अपना सुरभि स्रोत उड़ाने को व्याकुल हैं. हवा में एक मदमस्त कर देने वाली सुगंध
अनायास ही समाई रहती है. बगिया रंग-बिरंगे फूलों से सजी है, सभी मानो एक-दूसरे से
होड़ ले रहे हैं. खेतों में गेहूँ और सरसों झूमती-इठलाती नजर आती हैं. फागुनी हवा
चलती है तो लोकमन भी संकोच की बेड़ियाँ तोड़कर ढोल-मंजीरे व झांझ की ताल पर थिरकने को
आतुर हो उठता है. कण-कण से वसंत राग सहज ही फूटने लगता है. ऐसे में होलिकादहन के
उत्सव में जो हृदय के सारे वैर और द्वेष भाव को जला देता है, उसके अंतर में ही आह्लाद
सुरक्षित रहता है. उसी आह्लाद को उल्लास पूर्ण वातावरण में एक-दूसरे के साथ बांटने
का नाम होली है.
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