Wednesday, December 10, 2014

तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्हीं हो

जुलाई २००७ 
परमात्मा के नाम के सिवा सभी कुछ नश्वर है, इसका बोध होते ही सारा दृश्य बदल जाता है. अस्तित्त्व मुखर हो जाता है. ऐसा बोध आत्मा की गहराई से उपजता है. भीतर जो सत्य, आनंद का स्रोत है वहाँ से. जो चमत्कार कर सकता है, अभाव व प्रभाव से निकाल कर वह हमें स्वभाव में लाता है. सहज ही अकर्ता भाव सधने लगता है. परमात्मा हमारा सुहृदय है, सखा है, आत्मीय है, मीत है और ऐसा हितैषी जो कभी राह से भटकने नहीं देता. उससे विमुखता ही असजगता है. असजग होकर हम अपने स्रोत से दूर हो जाते हैं, आत्मा के पद से हट जाते हैं. ऐसा होते ही दुःख हमें घेर लेता है.

Tuesday, December 9, 2014

योग साधना है मन का

जून २००७ 
जो बोलना चाहिए, वह बोलें. जो धारण करना चाहिए उसे ही धारें. वही कर्म करें जो करणीय हो. हमारा मन तन से जुड़ा है, तन की यदि हमने सही देखभाल नहीं की तो अस्वस्थता मन पर भी छा जाएगी. लेकिन मन यदि आत्मा से जुड़ा हो, समाहित हो, तृप्त हो और भीतर शांति का साम्राज्य हो तो मन तन पर प्रभाव डालकर उसे भी स्वस्थ कर सकता है. मन अनंत का ही प्यासा है, जगत का कितना ही सुख उसे मिले वह तृप्त नहीं होगा. मन लेकिन तभी परमात्मा से जुड़ेगा, जब वह खाली हो अर्थात कामनाओं से मुक्त हो. अलौकिक सुख की चाह भी चाह ही है, ख़ाली होते ही स्वयं ही आनंद का अनुभव होता है. जीवन जब तक है इस तन में उस आत्मबोध को पा लेना है. यही साधना है.

Monday, December 8, 2014

घूँघट के पट खोल रे

जून २००७ 
चंचल मन रोके नहीं रुकता और हम हेय को भी ग्रहण कर लेते हैं, उपादेय को छोड़ देते हैं, किन्तु जब मन यह जान लेता है कि अब उसकी दाल नहीं गलने वाली तो वह सारी कामनाओं का त्याग कर देता है. मन उसी क्षण खो जाता है, जब हम जाग जाते हैं. आत्मा का जन्म मन का अमन होना है. यूँ आत्मा सदा से ही थी पर मन का पर्दा पड़ा था. पर्दा हटा तो तो वह प्रकट हो जाती है.  जब हमें एक बार अपना पता चल जाता है तो मन का पर्दा रहने पर भी जब चाहे हम उसे हटा कर आत्मा के देश में प्रवेश कर सकते हैं.


तुझ संग ही नाते हों सारे

जून २००७ 
अद्वैत का अनुभव ध्यान में होता है जब आत्मा और परमात्मा के मध्य कोई अंतर नहीं रहता, दोनों एक हो जाते हैं. जीवात्मा के रूप में हम मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार के साथ होते हैं, तब हम परमात्मा के अंश हैं. जब हम चिन्तन-मनन करते हैं अथवा मौन रहते हैं तब द्वैत होता है. मन लहर है तो आत्मा सागर है, मन बादल है तो आत्मा आकाश है. व्यवहार काल में हम उस परमात्मा के दास हैं. वह साकार भी है और निराकार भी. उसकी मूर्ति भी उसका साकार रूप है और उसकी बनाई ये चलती-फिरती मानव मूर्तियाँ भी. हमारा कर्त्तव्य है इन्हें किसी भी प्रकार का दुःख न देना. सेवक को अपना सुख-दुःख नहीं देखना है, उसका अहंकार भी मृत हो गया है, क्योंकि वह तो परमात्मा का अंश है. ऐसा हमें हर पल स्मरण रहे तो सदा हम परमात्मा के साथ हैं !

Friday, December 5, 2014

मन भीजे जब रस पावन में

जून २००७ 
हमें स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाना है, जहाँ कोई भेद नहीं है, वहाँ अद्वैत है. स्थूल में भेद है, वहाँ सारे विकार हैं. सूक्ष्म निर्विकार है, वह सारे दुखों से परे है. उस सूक्ष्म को पाना हो तो पहले तन रूपी घट को तपना होगा, मन रूपी दूध को जमाना होगा तब आत्मा रूपी नवनीत प्रकट होगा. तन से निष्काम कर्म, मन से समता को जो साध ले वही आत्मा को जान सकता है. अहंकार ही हमें आत्मा से दूर रखता है. अहंकार भीतर के रस को सुखा देता है. मात्र बौद्धिक ज्ञान कब तक हृदय को हर-भरा रखेगा, उसे तो भक्ति का पावन जल चाहिए. आत्मा का आनंद भक्ति के सहारे मिल सकता है. जिसकी प्रज्ञा जगे तो विनम्रता आ ही जाती है.  

किससे नजर मिलाऊँ तुझे देखने के बाद

जून २००७ 
किससे नजर मिलाऊँ तुझे देखने के बाद” जिसे एक बार अपने भीतर उस आनंद की झलक मिल जाये, वह खुद को ही भूल जाता है, संसार की तो बात ही और है. कवि कहता है, “अपना पता न पाऊं तुझे देखने के बाद” और ऐसा मन स्वालम्बी होता है, वह एक का शैदाई होता है, उसे जो चाहिए उसके लिए वह अपने ही दिल का द्वार खटखटाता है, वह जो चाहता है वह भीतर ही मिल जाता है. वह अनुभव अनोखा है, वह इस ब्रह्मांड की सबसे कीमती शै है !


Wednesday, December 3, 2014

मुक्त हुआ जो द्वन्द्वों से

जून २००७ 
साधक को कभी भी संतोषी नहीं होना चाहिए. कभी-कभी ऐसा होता है जिस अनुभव को वह उच्च मानता है वह तो भूमिका से भी पूर्व की स्थिति होती है. भीतर इतने द्वंद्व होते हुए भी कोई स्वयं को ज्ञानी मानने की भूल कर सकता है. आनंद और शांति की प्राप्ति ही साधक का लक्ष्य नहीं है, बल्कि मन को सारे द्वन्द्वों से मुक्त करना है. मन, वाणी तथा कर्म से कोई ऐसा कृत्य न हो जिससे स्वयं को या किसी अन्य को रंचमात्र भी दुःख पहुँचे. करुणा, मुदिता, स्नेह तथा उपेक्षा इन चारों में से परिस्थिति के अनुसार किसी एक का प्रयोग करके हम मुक्त रह सकते हैं. अपने से श्रेष्ठ को देखकर मुदिता, हीन को देखकर करुणा, दुष्ट के प्रति उपेक्षा तथा समान के प्रति स्नेह, यही व्यवहार का आधार होना चाहिये. हरेक को यह जीवन एक महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मिला है, जब तक वह न मिले, एक क्षण के लिए भी प्रमादी नहीं होना है. दुःख हमें सजग करते हैं, आँखें खोलते हैं, हम दुखों का कारण खोजने पर विवश होते हैं तो अपने भीतर के विकारों को स्वच्छ करने की प्रेरणा मिलती है. हम न तो अहंकारी बनें न ही अन्याय के सामने झुकें. एक विनम्र प्रतिरोध की आवश्यकता है. प्रेम भरी दृढ़ता तथा सत्य के लिए कुछ भी सहने की क्षमता !