Friday, February 9, 2018

स्वप्न सा यह जगत सारा


१० फरवरी २०१८ 
स्वप्न में देखे हुए दृश्य जैसे हमें जागने पर प्रभावित नहीं करते, जागृत में हुए अनुभव भी कुछ ऐसे ही हैं. बचपन में जिन वस्तुओं के बिना हम रह नहीं पाते थे, वे अब व्यर्थ हो गयी हैं. कल जो मित्र अपने निकट थे, आज वह दूर हैं, और उनकी याद भी नहीं आती. जो कुछ भी मन के द्वारा अनुभव किया जा सकता है, वह सभी बाहर है, उसके बिना भी हमारा अस्तित्त्व बना रह सकता है, बना रहा है. क्यों न हम उसे तलाशें जो हमसे अलग किया ही नहीं जा सकता, और वह तत्व है हम स्वयं...हमारा होना किसी बाहरी संयोग पर निर्भर नहीं है. ध्यान ही ऐसी प्रक्रिया है जो हमें हमारे मूल  तक ले जाती है. अपने मूल से जुड़कर ही कोई इस जगत को अपना क्रीड़ा स्थल बना सकता है, जहाँ बिताया हर क्षण आनंदित करने वाला है.

Thursday, February 8, 2018

जिन डूबा तिन पाइयाँ

९ फरवरी २०१८ 
संत कहते हैं, चिन्मय होते हुए मनुष्य स्वयं को मृण्मय मान बैठा है. असीम होते हुए सीमा में बंध गया है, सुख स्वरूप होते हुए सुख की कामना में दौड़ रहा है. यदि कोई संतों की इस बात पर विचार करे और उसका अनुभव भी कर ले तो उसका जीवन कितना सुंदर हो जायेगा. आत्मा यदि सागर है तो मन की उपमा लहरों से दी जाती है, किन्तु सागर हो या लहरें, वास्तव में तो दोनों जल ही हैं. इसी प्रकार आत्मा हो या मन वास्तव में दोनों परमात्मा ही हैं. जैसे लहरों ने सागर को ढक लिया है, हम लहरों को देखकर ही सागर को देख लिया मान लेते हैं, सागर की अतल गहराई का उसके विशाल विस्तार का हमें ज्ञान ही नहीं होता, नाम और रूप हमें इस तरह प्रभावित कर लेते हैं कि जल को तो हम देखते ही नहीं. ऐसे ही मन को देखकर ही हम व्यक्ति को देख लिया मान लेते हैं. आत्मा की अतल गहराई का हमें ज्ञान ही नहीं होता. जिस चेतन तत्व से वे बने हैं, उस परमात्मा को तो हम देखते ही नहीं. यदि दृष्टि जल पर हो तो सागर, लहरों, बुदबुदों और फेन में एक ही सत्ता दिखेगी. यदि परमात्मा पर दृष्टि हो तो आत्मा, मन, बुद्धि, अहंकार सबके पीछे एक ही सत्ता दिखेगी. सबके भीतर एक ही तत्व को देखते ही सारा भेद मिट जाता है और वसुधैव कुटुम्बकम का भाव सहज ही जग जाता है.  

Wednesday, February 7, 2018

बचपन और बुढ़ापा इक सा

८ फरवरी २०१८ 
एक कहावत है, पूत के पाँव पालने में ही देखे जाते हैं, अर्थात कोई बच्चा बड़ा होकर कैसा बनने वाला है, उसकी झलक बचपन में ही मिल जाती है. इसी कहावत को यदि थोड़ा आगे बढ़ाया जाये तो ऐसा भी कह सकते हैं कि किसी की युवावस्था देखकर उसकी वृद्धावस्था का अनुमान लगाया जा सकता है. यदि कोई अनुशासित जीवन जीता रहा है तो उसका बुढ़ापा भी अनुशासित ही होगा. इसी तरह कोई वृद्ध यदि संतुष्ट है और जीवन के प्रति आशावान है तो उसका नया रूप यानि अगला जीवन कैसा होगा, यह भी जाना जा सकता है. अक्सर हम वृद्धों को अपने बीते हुए दिनों की बातें करते देखते हैं, लेकिन जो बीत गया उसे दोहराना पानी पर लिखने जैसा है, जिसका कोई अर्थ नहीं. यदि वृद्ध अपने अगले बचपन के विषय में सोचे और उसकी तैयारी करे तो जीवन कितना सुंदर हो सकता है. बुढ़ापा बचपन की पूर्वावस्था ही तो है, बल्कि वृद्धावस्था में ही इसके लक्षण आरम्भ हो जाते हैं. पोपला मुख, बात-बात पर तुनकना और शारीरिक असमर्थता बच्चों में होती है और बूढों में भी. सन्यास आश्रम में गया वृद्ध बालवत् ही होता है, तभी वह सबका प्रिय हो जाता है.  

Tuesday, February 6, 2018

नाम-रूप से पार जो देखे

६ फरवरी २०१८ 
प्रतिपल इस जगत में कितना कुछ घट रहा है, सृष्टि के इस अनंत पटल पर न जाने कब से असंख्य खेल खेले जा चुके हैं, जा रहे हैं और खेले जायेंगे. आश्चर्य की बात यह है कि उस पटल पर उनका चिह्न भी शेष नहीं रहता. जैसे स्वप्न में हम किले बनाते हैं, विशाल पर्वत रच लेते हैं और जगने पर उनका नामोनिशान नहीं मिलता, वैसे ही यह जगत प्रतिपल ‘हाँ’ से ‘नहीं’ हुआ जा रहा है. जो इसे ही वास्तविक मान लेते हैं वह इस नाम-रूप के जगत के पीछे छिपे अव्यक्त कारण की खोज नहीं करते. जैसे सागर में उठी लहरें नाशवान हैं, वे सागर का ही एक रूप हैं और लहर नाम से जानी जाती हैं. लहरों के नाश होने पर सागर का नाश नहीं होता. सागर भी जल का एक रूप है और सागर नाम से जाना जाता है, यदि कभी सागर भी सूख जाये तो जल का नाश नहीं होता. इसी तरह मन भी आत्मा के सागर में उठी लहर ही है, और देह मन के सागर में उठी लहर. देह व मन के नाश हो जाने पर आत्मा का नाश नहीं होता.     

Monday, February 5, 2018

श्रावक बन जाता है जो भी

५ फरवरी २०१८ 
साधक के लिए श्रवण का बहुत महत्व है. वेदों को श्रुति भी कहा गया है, जिनमें ऋषियों की वाणी को सुनकर ही संकलित किया गया है. ‘सुनना’ और सही प्रकार से सुनना जिसे आता है, वह सत्य को शीघ्र ही अनुभूत कर सकता है. सामान्य व्यवहार काल में भी यदि हम सामने वाले की बात को सुने बिना ही अपनी राय देने लगते हैं, अथवा ठीक से समझ नहीं पाते तो इसका एक मात्र कारण है श्रवण की कला का न जानना. एक सच्चा श्रावक ही सच्चा साधक बन सकता है. बिना किसी पूर्वाग्रह  और मान्यता के कही गयी बात को सुनने से ही उसके पीछे का सत्य उद्घाटित हो जाता है. सुनते समय यदि मन कहीं  और है अथवा हम अपने ही प्रश्नों में उलझे हैं तो सुनने का भ्रम हो सकता है, वास्तव में हमने सुना ही नहीं. हम संतों की वाणी सुनते हैं, पर हजार बार सुनकर भी हमें अपने भीतर उस सत्य की झलक नहीं मिलती, जिसका जिक्र वे निरंतर करते हैं. सुनने की कला जिसे आ जाती है वह एक न एक दिन उस अव्यक्त को भी सुन लेता है, मौन की गूंज भी उसे सुनाई देती है. 

Friday, February 2, 2018

उस विराट की करें कामना

३ फरवरी २०१८ 
सत्य के प्रति आग्रह जब मानव को देव बना देता है, महात्मा बना देता है, असत्य का आश्रय लेने वाला कहाँ पहुँचेगा इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है. अल्प की कामना करने से विराट कैसे मिल सकता है, उसके लिए तो विराट की ही कामना करनी होगी. इन्द्रियों व मन से मिलने वाला हर सुख अल्प है, मन के पार जहाँ द्वंद्व नहीं है, वहाँ आत्मा का सुख है, जो कभी खत्म नहीं होता. संत के मुख से यह बात सुनकर भी हमें भरोसा नहीं होता, हम छोटे-छोटे सुखों को ही अपनी झोली में भर कर प्रसन्न होते रहते हैं. ओस की बूंदों की तरह ये सारे सुख शीघ्र समाप्त हो जाते हैं, फिर खाली झोली लिए हम मायूस हो जाते हैं. क्यों न एक बार उस परमसुख की कामना करें जिसके गीत गाते हुए कृष्ण थकते नहीं.  

Thursday, February 1, 2018

दो के पार ही जाना हमको

२ फरवरी २०१८ 
जीवन द्वंद्वों से बना है. यहाँ जो वस्तुएं, घटनाएँ, गुण तथा मूल्य एक दूसरे के विपरीत दिखाई पड़ते हैं, वे विपरीत न होकर एक दूसरे के पूरक हैं. दिन के बिना रात नहीं होती, सुख के साथ दुःख लगा ही है. मित्रता और शत्रुता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. जो हमारे प्रिय पात्र हैं वे ही कल अप्रिय भी लग सकते हैं. एक का अस्तित्व दूसरे पर ही टिका है. बीमारी न हो तो स्वास्थ्य की कीमत कौन जानेगा. अशांति न हो तो शांति की चाह किसे होगी. संत जगत की इस व्यवस्था को जानकर उनसे ऊपर उठ जाते हैं. जहाँ दो नहीं हैं विश्राम वहीं है.