दिसम्बर २०१२
जिसे अपने आप का ज्ञान नहीं है, उसे ही अभिमान, ममता, लोभ, मोह आदि के कारण दुःख होते हैं. मन का यह नाटक तब तक चलता रहता है जब तक हम अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित नहीं होते. हमारा अहं तभी तक है जब तक हम स्वयं को शरीर से भिन्न व मन से अलग नहीं देखते. ऐसा तभी संभव है जब हम स्वयं के कण-कण से परिचित हों, सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रति सजग रहें. कब क्या मन में उठ रहा है इसे जानते रहें. जब सजगता खो जाती है तब संसार मन पर अपना अधिकार जमा लेता है. जब सजग रहते हैं तब भीतर से एक रस की धार सदा बहती रहती है उसमें आप्लावित रहते हैं. मन बाहर भी जुड़ा हुआ है और भीतर भी बुद्धि से जुड़ा है. जब वह भीतर लौट आता है नमः हो जाता है.
