Thursday, April 26, 2012

आत्मा का फूल


वही इस जगत का आधार है. वही सारे स्पन्दनों का आधार है. पहले शब्द हुआ फिर उसके अनुरूप आकृति. हमारे भीतर भी वही आदि सत्ता विद्यमान है. यह जगत हमें इसीलिए तो प्रिय लगता है, क्योंकि यह सब कुछ उसी का है. एक उसी को चाहो तो प्रकृति भी साथ देने लगती है. जगत जो  हर पल अपना शासन मन पर करना चाहता है, वह भी प्रिय लगने लगता है. समय का प्रतिबंध, जीवन में अनुशासन, और एक कर्म बद्धता अपने आप आने लगती है. वह हमारे ह्रदय की हर बात जानते हैं, गुणातीत, सबके मध्य होते हुए भी अलिप्त,, सुख-दुःख से परे, उद्वेग रहित, आकाश की भांति... उनसा होने के लिये ही उनको चाहना, धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहना है. यदि परम के प्रति प्यास जगी है तो उस पौधे को सींचते रहना चाहिए. अन्यथा वह पौधा सूख जायेगा. सभी को पूर्णता की तलाश है. तन और मन के स्तर पर हम कभी पूर्ण नहीं हो सकते, आत्मिक स्तर पर ही हम पूर्णता का अनुभव कर सकते हैं. इसकी झलक मिलते ही अपना आप जैसे सारे ब्रह्मांड को व्याप्त कर लेता है. दुनिया एक खेल लगती है...एक नाटक. ध्यान से देखें तो जीवन का अर्थ क्या है ? क्या यह फूलों के खिलने और और फिर मुरझा कर झर जाने जैसा नहीं है. पर मुरझाने से पूर्व वे अपनी सारी खुशबू को लुटाते हैं जो उनके भीतर है. आत्मा में भी प्रेम की खुशबू  है, हमारे तन व मन भी प्रेम की मांग करते हैं, आत्मा के लिये वे भी ‘पर’ हैं, उसका सबसे पहला प्रेम तो उन्हें ही मिलता है. इसके बाद वह अपने आप बिखरने लगता है.


Tuesday, April 24, 2012

तमसो मा ज्योतिर्गमयः


फरवरी २००३ 
हम प्रकाश के उपासक  हैं. प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है. ज्ञान की उपासना करें तो हृदय में कैसी शांति का अनुभव होता है जो अधरों को सदा खिला रखती है. अंतर में प्रसन्नता का अनुभव तभी हो सकता है जब कोई उद्वेग न हो, मान की चाह न हो, संक्षेप में कहें तो जब मन माया पर विजय प्राप्त कर ले. माया अर्थात जो है नहीं पर दिखता है. जो कुछ भी हमें चारों ओर दिख रहा है प्रतिपल बदल रहा है, नहीं की ओर जा रहा है. जिसका प्रभाव क्षणिक है उसका असर मन पर लेना मूर्खता ही है. उसे सत्य मान कर उसमें स्वयं को लिप्त कर लेना ही अज्ञान है, जितनी शीघ्र इस अज्ञान से मुक्ति मिलेगी उतना शीघ्र हमारे भीतर ज्ञान का सूर्य चमकेगा. यह जो कभी-कभी मन में विक्षिप्तता घर कर लेती है, किसी की कही बात, किसी का किया व्यवहार हृदय को, एक क्षण के लिये ही सही, बींधता है तो इसका अर्थ यही है कि अभी भीतर अँधेरा है. यह जगत जैसा हम चाहते हैं वैसा ही रूप धर लेता है. मन में कोई चाह न हो, तृप्ति हो तभी ज्ञान टिकता है. जहाँ चाह जगी उद्वेग होगा, जबकि वह क्षणिक ही होती है कुछ समय बाद उसका कोई महत्व नहीं रह जाता, उसके बिना भी हम बड़े मजे से रह सकते थे, मात्र अपने अहं को पोषने के लिये हम चाहते हैं कि हर चाह पूरी हो. तब निष्कर्ष यही निकला कि अहं ही दोषी है. मिथ्या अहंकार ही हमें अपने को बहुत कुछ मानने की सलाह देता है, हम यदि कुछ हैं तो उस परम सत्ता के अंश मात्र हैं, उसने हमें एक पात्र बनाया है, अपने पात्र को सही ढंग से निबाहें, बस यहीं तक हमारा बस है, उसके आगे वही जाने...वह हमें असीम स्नेह करता है !   

स्व को जिसने जान लिया है


फरवरी २००३ 
मृत्यु कितनी सृजनात्मक है. जन्म होने की प्रक्रिया सदा एक सी है पर इंसान कितने विभिन्न तरीकों से मरते हैं. हर व्यक्ति की मृत्यु किसी न किसी खास रोग या कारण से होती है. अनगिनत रोग हैं और प्राकृतिक आपदाएं हैं. युद्ध, हिंसा, आतंक के शिकार भी होते हैं कुछ लोग और कुछ अपनी मृत्यु का चुनाव स्वयं करते हैं. जो जन्मा है वह मरेगा ही, यह ध्रुव सत्य है पर जो मरा है वह पुनः जन्मेगा ही, यह सत्य नहीं है. वह मुक्त भी हो सकता है, प्रेत भी हो सकता है . पर हर जीवित की मृत्यु तय है, फिर हमें किस बात का गर्व रहता है, इस माटी में मिल जाने वाली देह का या इस मन का जो कभी संतुष्ट होना जानता ही नहीं, जो सदा कमियों पर नजर रखता है अपनी नहीं दूसरों की...अभिमान यदि सच्चे अर्थों में हो सकता है तो ‘स्व’ का जो प्रेम, शांति, आनंद, सुख, ज्ञान, शक्ति व पवित्रता का पुंज है. मानव मात्र इस ‘स्व’ का अधिकारी है.  


Sunday, April 22, 2012

घट घट में घटती रामायण


फरवरी २००३ 
प्रतिपल हमारे भीतर रामायण चल रही है. राम, हमारी आत्मा का जन्म तब होता है, अर्थात हम स्वयं का अनुभव तब करते हैं जब दशरथ यानि दस इन्द्रियों का मिलन कुशलता (कौशल्या) से होता है. जीवन में मैत्री (सुमित्रा), और श्रद्धा(कैकेयी) होती हैं. श्रद्धा जब अटूट न रहे तो स्वयं से अलगाव हो जाता है. बुद्धि रूपी सीता का हरण तब अहंकार रूपी रावण कर लेता है.  श्वास-प्राणायाम (हनुमान) की सहायता से हम पुनः बुद्धि का आत्मा से मिलन कराते हैं.
इसी तरह महाभारत का युद्ध भी लड़ा जा रहा है. एक ओर लोभ आदि दुर्गुणों का प्रतीक दुर्योधन है  तो दूसरी ओर सात्विकता का प्रतीक अर्जुन, आत्मा रूपी कृष्ण उसके सारथि हैं. सदगुणों को जब  वनवास मिलता है, दुःख उठाना ही पड़ता है पर अंत में विजय सत्य की होती है. हमें प्रतिक्षण प्रेय तथा श्रेय में से चुनाव करना होता है. यह चयन ही हमारे भविष्य की नींव रखता है.

Friday, April 20, 2012

सार सार को गहि रहे


साहित्य में हंस को नीर-क्षीर विवेक ग्राही माना गया है. ऐसा व्यक्ति जो संसार से सत् को तो ग्रहण करे असत् को त्यागता जाये, हंस कहा जाता है, जैसे रामकृष्ण, परमहंस कहलाते हैं. हमने भी अपने जीवन में सार्थक क्षणों को अपनाना है, सार्थक कार्य करने है, सार्थक शब्दों का उच्चारण करना है. इस छोटे से जीवन में इतना समय किसके पास है कि सभी कुछ ग्रहण करता चले, मन को जितना- जितना खाली रखें उतना अच्छा है. अपने लक्ष्य की ओर पहुँचाने वाले साधनों को अपनाना ही अच्छा होगा. यदि किसी का लक्ष्य परम आनंद या शांति को पाना हो तो सेवा, सत्संग व साधना इसके साधन हैं, वाणी का संयम, प्रमाद का त्याग, स्वस्थ तन व मन इसके उपकरण हैं, संत कहते हैं, सेवा से कर्म शुद्धि होती है, ध्यान से मन शुद्धि व योग साधना से तन शुद्धि. मनसा, वाचा, कर्मणा कुछ भी ऐसा न हो जो शास्त्र विरुद्ध हो, जो हिंसा में आता हो, जिससे किसी को पीड़ा हो. ईश्वर के प्रति अटूट निष्ठा रखते हुए, अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए शेष समय का उपयोग अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये लगाना होगा. जब तक ज्ञान में स्थिति नहीं होगी, द्वंद्वों से मुक्ति नहीं मिलेगी. 

Thursday, April 19, 2012

इच्छा तेरे रूप अनेक


 फरवरी २००३ 
अक्सर आवश्यकता एवं इच्छा में हमें भेद नहीं मालूम पड़ता, जो वस्तु हमारी आवश्यकता की पूर्ति करे वह कभी दुःख का कारण नहीं बन सकती. इच्छा हमें मानसिक उद्वेग देती है, एक दौड़ में हम शामिल हो जाते हैं. इच्छा उठते ही मन में संकल्प-विकल्प उठते हैं, उसे पूरी करने की धुन हमें बेचैन कर देती है. निर्दोष लगने वाली इच्छा भी मन को अटकाती है, पथ पर चलना संभव नहीं हो पाता. पानी सा मन बहता रहे यही साधना की पहली शर्त है. जैसे आकाश पर बादल आते हैं और चले जाते हैं. मन, बुद्धि आदि आत्मा के चिदाकाश पर आने-जाने वाले बादलों के समान अनित्य हैं, ज्ञान का सूर्य जब निकलता है तो आकाश की स्वच्छ नीलिमा झलकती है.

Wednesday, April 18, 2012

सबमें वही समाया है


साधना के आरम्भ में एक भक्त अथवा साधक के लिये उसका इष्ट ही एकमात्र आराध्य होता है, उसी में उसे सभी देवी-देवताओं के दर्शन होते हैं. जैसे वृक्ष की जड़ों को सींचने से उसके हर अंग तक जल पहुँच जाता  है वैसे ही एक की पूजा करने से सबकी पूजा हो जाती है. आगे जाकर वह सबमें उस एक को देखने लगता है. वह जान जाता है कि कहीं भी बंधना नहीं है, मुक्ति के पथ पर चलना शुरू किया है तो  जंजीर सोने की भी हो तो उसे कटवा देना चाहिए. सतोगुण तक जाकर उससे भी पार जाना होता है. अस्तित्त्व हमारी हर छोटी बड़ी इच्छा को पूर्ण करना चाहता है, पर हम उसका प्रतिदान नहीं दे पाते हैं. प्रेम हमें संसार की हर जड़-चेतन वस्तु के प्रति सजग बनाता है. परम को प्रेम करें तो वही प्रेम उसकी सृष्टि की ओर प्रवाहित होने लगता है.