Thursday, June 21, 2012

अज्ञान ही एकमात्र बंधन है


वे संस्कार जो हमें साधना के प्रति सजग करते हैं, हमारे भीतर हैं, ज्ञान के प्रति यदि प्यास गहरी हो तो वे संस्कार जगने लगते हैं. जीवन मूल्य यदि श्रेष्ठ हों, श्रद्धा और निष्ठा में कमी न हो तो कृपा अपने आप बरसती है. वाणी पर संयम न हो, अज्ञान को स्वीकार करने की क्षमता न हो तो सत् हमारे जीवन से चला जाता है. हमें स्वयं को खुद की कसौटी पर कसना होगा, एक छोटा सा प्रमाद हमें अपने पथ से मीलों दूर कर देता है. मानव स्वतंत्र है ऐसा मानकर दुःख के काँटों में स्वयं को उलझा लेता है. अपनी स्वतंत्रता का गर्व ही बंधन बन जाता है तो मुक्ति कहाँ ? कर्मों के फल की कामना, इच्छा, और अन्यों से सुख की अपेक्षा, ये सब अपने परिणाम साथ लेकर ही चलते हैं. यदि सजगता नहीं रही तो प्रफ्फुलता खो जाती है.

जीवन सरस बनाये योग


अप्रैल २००३ 
जब हम विवेक का आश्रय लेते हैं तो योग अपने आप सधने लगता है. पहले जीवन में कर्मयोग आता है, क्योंकि हमारे कर्म तब स्वार्थ वश नहीं होते, सहज प्राप्त कर्म ही करते हैं. और सिर्फ कर्म करने के लिये कर्म न कि फल की इच्छा के लिये. निष्काम भाव से किया गया कर्म बांधता नहीं है. तब भक्ति का उदय होता है, क्योंकि हृदय यदि शुद्ध हो तभी ईश्वर की कृपा का अनुभव होता है. भक्ति से हृदय में सहज ज्ञान होने लगता है, कृष्ण ने कहा है कि वह अपने भक्त का बुद्धियोग करा देते हैं. ज्ञान हमें निर्देशित करे तो मन नियंत्रण में रहेगा. हंस की नीर-क्षीर विवेकी दृष्टि हमें तीनों तापों से बचा लेती है. तब असार को तज हम सार को ग्रहण करते हैं, व्यर्थ के चिंतन से, व्यर्थ की चर्चा से, व्यर्थ के आहार से भी सहज ही बुद्धि बचा लेती है. तब जीवन सरस व सरल होगा, कमियों को दूर करते हुए धैर्यवान और क्षमाशील बनने की ओर सहज ही प्रवृत्ति होगी.

Wednesday, June 20, 2012

हर पल हमें सिखाता है


अप्रैल २००३ 
हर पल जीवन में बहुत कुछ घटता रहता है बाहर भी और भीतर भी. बाहर की प्रतिध्वनि भीतर तक सुनाई देती है और जब भीतर की प्रतिध्वनि बाहर तक भी सुनाई देने लगे तो समझना चाहिए कि अब वस्तुएँ अपना स्पष्ट आकार ले रही हैं. जो देह बुद्धि से मुक्त होना चाहता है वह ऐसी बातों का प्रभाव मन पर क्यों लेगा जो उसकी गलतियों की ओर इशारा करती हैं. अहं ही इसका मुख्य कारण है, हमारे अहं को चोट पहुंचती है जब कोई आलोचना करता है और प्रतिक्रिया हुई तो वह देहात्म बुद्धि के स्तर पर ही होगी क्योंकि आत्मा के स्तर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती. अच्छा हो कि हम उस आलोचना को इसलिए स्वीकार करें कि वह सही है और हम उस त्रुटि से मुक्त होना चाहते हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात है कि साधना में कभी कोई व्यवधान न आये चाहे कितनी बाधा आये या मन कितनी प्रतिक्रिया करे. क्योंकि ईश्वर हमें बेहतर बनाना चाहता है, साधक को उसके सामने जाने लायक बनना है, हम उसके बिना अधूरे हैं जब तक यह भाव दृढ़ नहीं हो पाता हम उसकी कृपा का अनुभव भी नहीं कर पाते न ही कृतज्ञता का भाव प्रकट करते हैं कि वह हमें जगा रहा है.

Tuesday, June 19, 2012

सिमटे बिखरा बिखरा सा मन


अप्रैल २००३ 
संतजन कहते हैं कि स्वयं को बिखेरो मत, स्वयं को गंवाओ मत, अपना अपमान करते हो जब स्वयं को मात्र शरीर मानते हो. मृत्यु के बाद भी सूक्ष्म शरीर जस का तस रहता है. ईश्वर ने यह खेल रचा है, और हम इस खेल में ही खो जाते हैं, खेल रचने वाले को भूल ही जाते हैं. हमारी आत्मा मन की कल्पनाओं के ढेर के नीचे सुप्त हैं, पर है वही जिसकी हमें तलाश है. मन जब संसार में बिखरता है तो उसकी ऊर्जा व्यर्थ ही नष्ट होती है, और भीतर जाने का सामर्थ्य घटता है. तैलवत् धार की तरह जब मन एक बिंदु पर केंद्रित रहता है तभी उसमें आत्मा की शक्ति परिलक्षित होती है. आत्मशक्ति का विकास व व्यवहार की शुद्दता हमें ईश्वर की ओर ले जाते हैं. सदगुरु कितने प्यार से हमें समझाते हैं कि नश्वर वस्तुओं के पीछे जा जाकर हम अपने जीवन में दुःख ही तो लाते हैं, हमारी सूझ-बूझ व्यर्थ हो जाती है. अन्तःकरण की पवित्रता और सौम्यता को तो प्रतिपल बहना है, तभी वह भीतर से आप्लावित रहता है.

Sunday, June 17, 2012

मन गोपी सा हो पावन


अप्रैल २००३ 
गो का अर्थ है इन्द्रियाँ तो गोपी वही है जिसका अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण है, मन भी तो छठी इंद्री है, तभी हम परमात्मा के साथ आनंद नृत्य में शामिल होने के योग्य होते हैं. यदि कोई व्याधि सताए तो समझना चाहिए कि यम, नियम का पालन नहीं हुआ, कहीं न कहीं मनमुखता हुई है. सत्संग हमें मन को स्थिर रखने के कितने उपाय बताता है, संशयों और भ्रांतियों को दूर करता है. सत्य से जुडना सिखाता है. सत्य से ही हमारी शोभा है, वही प्रेम है और प्रेम हमें मुक्त करता है. अंतर में रूहानी संगीत व नृत्य का अनुभव कराता है. प्रातः काल जैसे हम स्नान करते हैं, वैसे ही सत्संग का जल हमारे मन के स्नान के लिये है. संतों की वाणी वह उबटन है जो हमारे मन का मैल रगड़–रगड़ कर स्वच्छ करता है. और वह फूल जैसा महकने लगता है. और तब वह उस ईश्वर को अर्पित होने के काबिल बन ही जाता है. मनरूपी पुष्प जब उनके पास पहुंचता है तो प्रभु उसे स्वीकार कर लेते हैं.

Friday, June 15, 2012

ध्यान जागरण है


ध्यान में साधक को जो भी अनुभव होता है उसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है, यदि कर भी दें तो बात पूरी तरह स्पष्ट नहीं होगी. ऐसे मन के भाव व्यक्त हों भी कैसे, जो मन छोटा न रहकर बड़ा हो गया हो, सारा ब्रह्मांड उसी की सत्ता प्रतीत होता हो और इस नाते संसार के सारे प्राणियों के प्रति प्रेम छलकता हो, जहाँ जड़ में भी उसी के दर्शन होते हों. जो आँख बंद करने पर भी और आँख खोलने पर भी एक सा प्रकट होता हो. जो बिना कानों के सुन सकता हो, ऐसे मन की बात को शब्द कहाँ तक पकड़ पाएंगे. वह तो सिर्फ भीतर महसूस किया जा सकता है. ऐसा क्षण जब कुछ भी पाना नहीं होता कुछ छोड़ना भी नहीं, जो सहज रूप में प्राप्त है उसे पूरे होश से स्वीकारना. यहाँ जो कुछ भी है सब उसी का है, जो वह है, वही तुम हो, दोनों एक हैं, पूर्ण मुक्ति का अहसास तभी होता है. जब मन निर्वासनिक हो जाता है. और कोई चाहे भी क्या? कौन किसे चाहे?, क्या चाहे?, जब सब कुछ एक ही है. संत ठीक कहते हैं ज्ञानी हजार शरीरों से भोगता है.वह हरेक के भीतर एकमात्र उसी चैतन्य को देखता है, वह जहाँ भी जाता है, पूरा जाता है जो भी करता है पूरा करता है. उसके अंतर की ऊर्जा एक बिंदु पर केंद्रित होती है, वह मन को आत्मा में विलीन कर देता है.


जब वह अपना सा लगता है


अप्रैल २००३ 
यह सारा अस्तित्त्व हमारा अपना है और जहाँ अपनत्व होता है वहीं प्रेम होता है. सुख-सुविधा और सम्पत्ति के लिये तो जन्मों-जन्मों प्रयत्न किये पर कहीं नहीं पहुँचे, अध्यात्म की दिशा में किया छोटा सा प्रयत्न हमें ऊँचाई पर ले जाता है. जहाँ श्रद्धा होती है, मन व बुद्धि उसी ओर जाते हैं. एक बार यदि मन पर चढ़ जाये तो भक्ति का रंग इतना पक्का होता है कि शेष सारे रंग उड़ जाते हैं और तब शाश्वत ज्ञान, शाश्वत आनंद व शाश्वत शांति हमारे मन में उदित होते हैं. विवेक जागृत होता है, कर्मयोग सधने लगता है. साधना के पथ पर मंत्र, गुरु व ईष्ट तीन दिखते हैं, पर वास्तव में वे एक ही हैं. उनमें से किसी एक से भी यदि प्रेम हो जाये तो साधना फूल सी हल्की व सरल हो जाती है. जब अज्ञान का आवरण हट जाता है तो उन बातों पर हँसी आती है जिनके लिये पहले बेचैन रहते थे, भ्रमित थे, मुक्ति की पहली श्वास हम तभी लेते हैं जब वस्तुएँ अपने वास्तविक रूप में प्रकट होने लगती हैं, हृदय निर्मल हो जाता है, वहाँ सिवाय शुद्ध प्रेम के कुछ भी नहीं रहता. अमनी भाव सधने लगता है.