कोऽहम् ? कुतोऽह्म् ? किम् इदम् च विश्वम् ? ऐसे प्रश्नों के
उत्तर जानने हों तो हमें गुरु, शास्त्र या परमात्मा की शरण में जाना होगा..तभी
ज्ञान होता है अपने सही स्वरूप का, अपने सहज मुक्त स्वभाव से हमारा परिचय होता है,
अपने मूल को हम जानते हैं. पता चलता है, हम कहीं से आये नहीं है, नित्य हैं, जगत
ही हममें आता जाता है. यह जगत त्रिगुणात्मक है, जिस तरह सूर्य का प्रतिबिम्ब जल से
भरे घट में दिखाई देता है, वैसे ही देह रूपी घट में मन, बुद्धि रूपी जल में उस
चैतन्य का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, जैसे सूर्य, घट, जल या प्रतिबिम्ब से पृथक
है वैसे ही चैतन्य, देह, मन, बुद्धि से
भिन्न है. हम वही चैतन्य हैं, न जाने कितने जन्मों में कितने देह रूपी घट हमने धारण किये हैं, और
कितना मन रूपी जल उसमें भरा है, कितनी बार घट फूटा, पर सूर्य का प्रतिबिम्ब कभी
नहीं बदला. यह ज्ञान होते ही हम अभय को प्राप्त होते हैं क्योंकि मृत्यु का भय चला
जाता है.
Monday, August 19, 2013
Friday, August 16, 2013
इक राह मिले तुझ तक
जनवरी २००५
सुखमयी स्थिति हो और हम स्वयं को उसमें न फंसायें, दुखमयी
स्थिति हो और हम उसमें स्वयं को न उलझाएँ,
यही साधना है. दोनों ही स्थितियों में हम साक्षी भाव में रहें तो मन की समता बनी
रहेगी अन्यथा मन की उर्जा व्यर्थ ही नष्ट होगी क्योकि न सुख टिकने वाला है न दुःख
ही. प्रतिक्षण इस संसार में हजारों जन्म लेते है औए हजारों मरते हैं, कीट-पतंगों
से लेकर मानव तक में चैतन्य है, मानव इस बात को जान सकता है और सदा के लिए
सुख-दुःख के पार हो सकता है. परमात्मा का यह खेल रचा हुआ है जो ज्ञान के साथ इसे
खेलते हैं वे मुक्त कहलाते हैं अन्यथा बंधन में पड़ा मनुष्य अपने को दुखी बनाता है.
भीतर के आनन्द के स्रोत से वह वंचित ही रह जाता है. मन की धारा जब भीतर की ओर बहती
है तब वह राह मिलती है जो उस तक ले जाती
है.
Thursday, August 15, 2013
कर्त्तव्य निभाना है
जनवरी २००५
कर्म हमें बंधन में डालते हैं, पर कर्म हम करते ही क्यों
हैं ? साधक तो इस बात के लिए सजग रहता है कि उसके नये कर्म न बनें, वह तो ध्यान के
द्वारा पुराने कर्मों को काट रहा है. मोह, स्वार्थ, स्वभाव तथा कर्त्तव्य चार
कारणों से हम कर्म करते हैं. प्रथम तीन हमें बांधते हैं, पर चौथा सहज भाव से किया
गया कर्म हमें बांधता नहीं, मोह अथवा स्वार्थ में पड़कर हम अकर्म कर डालते हैं. स्वभाव
वश कर्म करने से हानिकारक कर्म भी हो जाते हैं. कर्त्तव्य कर्म करने नहीं होते सहज
ही होते हैं, उनका होना ही उनकी शक्ति है, जब हमें कर्त्तव्य कर्मों का ज्ञान होगा
तब सप्रयत्न कुछ नहीं करना होगा, हमारा होना ही पर्याप्त होगा जैसे इस दुनिया के
सभी कार्य सहज रूप से अपने आप ही हो रहे हैं.
Tuesday, August 13, 2013
जागे जागे रहना है
दिसम्बर २०१३
हम रात्रि को ही स्वप्न नहीं देखते, दिन में भी एक
विचार धारा जो भीतर निरंतर चलती रहती है, हमारी स्वप्नावस्था का ही एक रूप है,
हमारे अनजाने में ही जो विचार विचरण करते है वही तो रात्रि में दृश्यों के रूप में
दिखने लगते हैं. यदि हमें अपने भीतर स्थित पवित्र चैतन्य का बोध सदा बना रहे तो हम
भीतर अखंड मौन का अनुभव कर सकते हैं. हम उससे बचे तभी तक रह सकते हैं जब तक सोये
हैं. हमारे भीतर जो चेतना है, वह सहज है, वह है ही, उसे होना ही है, न उससे कुछ बढ़कर
है न उससे कुछ कम है, सारे भेद ऊपरी हैं, भीतर एक ही तत्व है, वही परम सत्य है.
Monday, August 12, 2013
सुख सपना दुःख बुलबुला
दिसम्बर २००४
हमारे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, स्वयं को दुःख से मुक्त
रखना. मन में क्रोध, अशांति, तनाव, द्वंद्व, उद्ग्व्निता तथा चिंता यदि न रहे तब
जो शेष बचेगा वह परमात्मा है. हम अभी तक उससे अछूते बचे हैं, तो इसका एकमात्र कारण
है हमारे मन की हिंसात्मक प्रवृत्ति. हम स्वीकारना नहीं चाहते, शरण में नहीं जाते
तभी विरोध का भाव पनपता है. पूर्वाग्रह से ग्रस्त हमारा मन बहुत शीघ्र दुःख का
भागी बन जाता है. भय भी तभी होता है, जब तक भय मन में रहेगा, हम प्रेम का अनुभव
कैसे कर सकते हैं. ईश्वर प्रेम है, उसकी उपस्थिति तो हर क्षण है एक पर्दा हमें
उससे दूर किये है और वह पर्दा है नकारात्मक सोच से उत्पन्न अहंकार. जो वास्तव में
है नहीं पर व्यर्थ कल्पनाओं से इसे ठोस रूप हमने ही दिया है. मन में ही इसका नाश
करने की योग्यता है. फिर भी यदि प्रारब्ध वश कोई दुःख हमारे जीवन में हो तो वह
जाने के लिए ही आया है, ऐसा जानकर उसे साक्षी भाव से देखना होगा. हम दुःख में
सीखते हैं और सुख में उस सीखे हुए के अनुसार जीते हैं, पर हमारा लक्ष्य तो इन
दोनों के परे आत्मभाव में स्थित होकर आनन्द को प्राप्त होना है.
व्यर्थ न जाये इक पल भी
दिसम्बर २००४
मस्त रहेंगे यदि स्वस्थ रहेंगे, स्वस्थ रहेंगे यदि चुस्त
रहेंगे, चुस्त रहेंगे यदि व्यस्त रहेंगे....तो सर्वप्रथम हमें व्यस्त रहना है, जो
भी कार्य हमें मिला है उसे पूरा मन लगाकर करना ही व्यस्तता है. एक क्षण भी यदि हम
खाली न बैठें तो रोग हमारे पास फटक भी नहीं सकता. लेकिन वह व्यस्तता आनंदपूर्ण
होनी चाहिए. यदि कार्य हम विवशता वश करते हैं तो वह रोग को बुलाना ही है. मन यदि
आनन्द से पूर्ण है तो सारे काम सहज ही होते हैं. करुणा, मुदिता, उपेक्षा और मैत्री
ये चारों यदि मन में हैं तो आनन्द कहीं जा ही नहीं सकता. वैसे भी वह कहीं जाता नहीं
है बस किसी न किसी विकार से ढक जाता है.
Saturday, August 10, 2013
एक पुकार जगे जब भीतर
दिसम्बर २००४
हमारा जीवन ऊपर से चाहे जितना छोटा अथवा सामान्य दिखाई
देता हो वह भीतर से है अत्यंत विशाल, अनंत और असाधारण. वह उस परम शक्ति का ही विस्तार
है और इसके भीतर अनंत सम्भावनाएं छिपी हैं. प्रकृति के सारे रहस्य हमारे ही मन में
छिपे हैं, जब हम अन्तर्मुखी होते हैं तो एक विशाल दुनिया का दरवाजा खुल जाता है. वह
दुनिया जो बाहर की दुनिया से अलग है पर उसके विरोध में नहीं. भीतर जो सच है वह किसी
का विरोधी हो ही नहीं सकता वह परम प्रेम से उपजा है, वह शांति की सन्तान है और
शांति का ही जनक है. वह सत्य हमें मुक्त करता है. शुभ-अशुभ सारे संस्कारों से परे
ले जाता है. वह बाहरी जीवन को भी एक दिशा प्रदान करता है, वह सत्य रसपूर्ण है,
आनन्द की वर्षा करता है. सृजन के क्षणों को जन्म देता है, वह तृप्ति भी प्रदान
करता है और प्यास भी बनाये रखता है. वह विरह की पीड़ा भी है और मिलन का उल्लास भी,
वह जीवन को अर्थ प्रदान करता है. जब हम सत्य के निकट होते है, होते जाते हैं, अथवा
होना चाहते हैं तो सत्य भी हमारे निकट आना चाहता है, वह स्वयं को उसी अनुपात में
प्रकट कर देता है जिस अनुपात में हमारी चाहना होती है. जब हम असत्य के पुजारी बने
रहते हैं तो हमारी पुकार अनसुनी भी हो सकती है, पर सत्य के पुजारी की निःशब्द
पुकार भी व्यर्थ नहीं जाती, हम चाहे मौन रहें अथवा मुखर होकर पुकारें, सत्य तक
हमारी आवाज तत्क्षण पहुंचती है और हम उतना
ही उसकी निकटता का अनुभव करते हैं.
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