जीवन में हमें जो कुछ भी मिलता
है वह हमारे विकास के लिए आवश्यक है, ऐसा जो जान लेता है अर्थात हृदय से मान लेता
है और बुद्धि से स्वीकार कर लेता है, उसका जीवन सहज हो जाता है. हर सुख का क्षण यदि
हमें अस्तित्त्व के प्रति कृतज्ञता से भर दे और हर दुःख का क्षण जीवन के प्रति
जिज्ञासा से भर दे तभी हम सहजता की ओर बढ़ रहे हैं. सहजता का अर्थ है उस तरह होना
जैसे कोई फूल उगा हो या कोई झरना बहता हो, जिसे अपने को श्रेष्ठ होने के लिए कुछ
सिद्ध नहीं करना पड़ता. मानव सदा स्वयं को 'कुछ' होने की दौड़ में लगाये रखता है, वह
अन्य की तुलना में विकसित होना चाहता है. एक जन्म के बाद दूसरा जन्म और जन्मों की
एक लम्बी श्रृंखला चलती चली जाती है, हम विकास की उस ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाते जिसके
बाद इस चक्र में दुबारा नहीं आना पड़ता. आज वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो मानव
की बुद्धि चरम सीमा तक पहुँच चुकी है, किंतु अस्तित्त्वगत दृष्टि से मानव की चेतना
उपनिषदों के ऋषि की चेतना तक भी नहीं बढ़ पायी है. आज ध्यान को भी हमने संसार में
उन्नति के लिए साधन बना लिया है, किंतु जिस क्षण तक ध्यान में होना एक सहज अनुभव न
हो जाये, जीवन के मर्म का ज्ञान नहीं हो पाता.
Tuesday, August 20, 2019
Sunday, August 18, 2019
भाव जगेंं जब अनुपम भीतर
हमने स्वतन्त्रता दिवस मनाया
और रक्षा बंधन भी, हर भारतीय के मन में दोनों के लिए आदर और गौरव का भाव है. देश
की रक्षा करने वाले वीरों की कलाई में बहनें जब राखी बांधती हैं तो उनके मनों में
आजाद हवा में साँस लेने का सुकून भर जाता है. सृष्टि में प्रतिपल कोई न कोई किसी
की रक्षा कर रहा है. वृक्ष के तने पर जब हम लाल धागा बांधते हैं तो हम उसके द्वारा
स्वयं को रक्षित हुआ मानते हैं. एक तरह से सुरक्षित होना ही स्वतंत्र होना है, इस
बार दोनों उत्सव एक ही दिन मनाए गये, इसके पीछे सृष्टि का कोई न कोई अदृश्य हाथ
अवश्य है. बहनें अथवा कुल का पुरोहित जब परिवार के बच्चों और युवाओं के हाथ में
डोरी बांधता है तो उसके पीछे कितनी ही अनाम भावनाएं छुपी होती हैं. जीवन भावनाओं से गुंथा हो तभी उसकी
शोभा होती है, वरना अंतर से रस विलीन हो जाता है. हृदय यदि श्रद्धा और प्रेम के
भावों से भीगा न हो तो उसमें मरुथल की तरह कैक्टस ही उग सकते हैं. भावना के फ़ूल ही
मानव को मानव बनाते हैं. देश के लिए कुर्बान होने का भाव किसी वीर के हृदय में जब
जगता है तब वह सारी कठिनाइयों को सहने के लिए तैयार हो जाता है. हमने अपने पूर्वजों
का ऋणी होना चाहिए जिन्होंने सुंदर उत्सवों की एक श्रंखला हमें सौंपी है, जिसकी
मूल भावना को अक्षुण रखते हुए हमें उन्हें मनाना है.
Sunday, August 11, 2019
स्वयं का ही जो शासन माने
अपने सुख-दुःख के लिए जब हम
स्वयं को जिम्मेदार समझने लगते हैं, तब अध्यात्म में प्रवेश होता है. जब तक हमारा
सुख-दुःख व्यक्ति, वस्तु और परिस्थिति पर निर्भर है, तब तक हम संसार में रचे-बसे
हैं. संसारी होने का अर्थ है पराधीन होना, अपनी ख़ुशी के लिए दूसरों की पराधीनता को
स्वीकार करना ही अधार्मिकता है. 'दूसरे' में व्यक्ति, वस्तु और परिस्थति तीनों ही
आ जाते हैं. तुलसीदास ने कहा है, पराधीन सपनेहु सुख नाहीं...इसलिए स्वतंत्र
प्रकृति का व्यक्ति जगत में अपनी राह खुद बनाता है, अपने भाग्य का निर्माता स्वयं
बनता है. ऐसा व्यक्ति कर्मयोगी बन सकता है, ज्ञानी बन सकता है, भक्त बन सकता है, तीनों
बन सकता है. निष्काम कर्मयोग के द्वारा परमात्मा को सब प्राणियों में देखा जा सकता
है, ज्ञान के द्वारा परमात्मा को स्वयं में देखा जा सकता है और भक्ति के द्वारा कण-कण
में देखा जा सकता है. सत्संग के द्वारा ही हम सभी अध्यात्म में प्रवेश के अधिकारी
बनते हैं.
Friday, August 9, 2019
अलख निरंजन भव भय भंजन
प्रकृति और पुरुष दोनों उसी तरह भिन्न हैं जैसे वाहन और उसका
चालक. गति वाहन में होती है, चालक में नहीं, इसी तरह सारी क्रिया प्रकृति में है,
पुरुष में नहीं. वाहन यदि टूट जाये तो दूसरा लिया जा सकता है, इसी तरह पंचभूतों से
बनी देह जो प्रकृति का ही अंश है, यदि नष्ट हो जाये तो पुरुष को कोई अंतर नहीं
पड़ता, उसे दूसरी देह मिल जाती है. यदि किसी का वाहन क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो वह
व्यक्ति दुखी होकर उसका शोक मनाये ही ऐसा जरूरी नहीं, सुखी या दुखी होना उसकी
स्वाधीनता है, इसी तरह यदि देह रोगी हो जाये या वृद्ध हो जाये, अथवा नष्ट हो जाये
तो सुख या दुखी होना पुरुष यानि आत्मा की स्वतन्त्रता है. कर्मों का फल सुख या
दुःख के रूप में मिलता है पर सुखी या दुखी होना केवल हमारे बोध के ऊपर निर्भर करता
है. हर मानव के मन की गहराई में एक स्थान ऐसा है जो निरंतर एकरस है, जो मुक्त है,
यदि कोई उसे जुड़ जाये तो कभी अपनी इच्छा के विपरीत सुख-दुःख का अनुभव उसे नहीं
होगा, वह सदा साक्षी ही बना रहेगा.
Thursday, August 8, 2019
अति का भला न बरसना
"अति का
भला न बोलना, अति की भली न चूप, अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप" अति
किसी भी वस्तु की हो हानिकारक होती है. आज देश में वर्षा की अति हुई लगती है,
दक्षिण के सभी राज्य बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहे हैं. उससे पूर्व बिहार और असम भी
इस विपदा का शिकार हुए. गुजरात व महाराष्ट्र के कितने ही जिले पानी में डूब गये,
जब शहरों में इतनी बुरी हालत है तो गांवों की तो कल्पना ही की जा सकती है. जब घरों
में पानी भर जाता है, लोगों की बरसों की जमापूंजी, सामान, घर-बिस्तर सब कुछ नष्ट
हो जाते हैं. इस प्राकृतिक विपदा का सामना यूँ तो हर वर्ष ही करना पड़ता है, किंतु
इस साल यह महामारी की तरह सब जगह फ़ैल गयी है. बरसात न हो तो सूखे की सी स्थिति हो
जाती है, अब भूमि में जल का स्तर निश्चित रूप से बढ़ जायेगा. बाढ़ के साथ आई ताजी
मिटटी खेतों को उपजाऊ कर देगी. उम्मीद है सरकार और देशवासियों के सहयोग से इस
विपत्ति का सामना मानव की जुझारू प्रवृत्ति किसी न किसी तरह कर ही लेगी और बरसात
का मौसम थमते ही थमते गाड़ी पटरी पर आ जाएगी. किंतु उस समय का उपयोग यदि जिला
प्रशासन व्यवस्था पक्के नाले बनाने में करे, प्लास्टिक का उपयोग कम से कम हो,
जिससे पानी का निकास न रुके. जल को संचित करने के लिए बड़े जलाशयों का निर्माण हो
तब अगले वर्ष बाढ़ आने की नौबत शायद नहीं आये, यदि अधिक बरसात हुई भी तो उसका ज्यादा
असर नहीं होगा.
सर्वे भवन्तु सुखिनः
कश्मीर की वादियों में आज
सन्नाटा है, लेकिन यह सन्नाटा तूफान से पहले का सन्नाटा नहीं है. यह शांति तो उस
उत्सव की राह देख रही है जो आतंकवाद, गरीबी, अलगाव और अशिक्षा को दूर करके अमन और
खुशहाली के माहौल में वहाँ मनाया जाने वाला है. पिछले चार दशकों से जो खून बहा है,
उसकी कीमत तो कोई नहीं चुका सकता, किंतु जिस नफरत की आग को कुछ स्वार्थी तत्वों ने
भड़काया है, उसके बुझने का प्रबंध धारा तीन सौ सत्तर को निष्प्रभावी बनाने के साथ किया
जा चुका है. भारत की वीर सेना और देश को सर्वोपरि मानने वाली निर्भीक राजनीतिक
इच्छा शक्ति ने जो कदम उठाया है, वह इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में
लिखा जायेगा. हर देशवासी के मन में यही आकांक्षा है कि एक बार पुनः काश्मीर में
शिकारों पर गीत फिल्माए जाएँ, केसर की क्यारियां महकें. धरती का जन्नत कश्मीर
संतों और सूफियों का एक सा स्वागत करे. हर घर में तिरंगा फहरे और हर कश्मीरी फख्र
से कह सके, वह भी एक सच्चा भारतीय है.
Friday, August 2, 2019
प्रेम और शांति
'युद्ध और शांति' इन शब्दों से
हम सभी परिचित हैं, कोई राष्ट्र अथवा उसकी सेना के लिए काल को दो खंडों में
परिभाषित किया जाता है, एक युद्ध काल तथा दूसरा शांति काल, दोनों एक साथ नहीं
होते. एक के बाद एक आते हैं. किंतु हम यहाँ बात कर रहे हैं प्रेम और शांति की जो
साथ-साथ होते हैं. प्रेम होता है तो वातावरण शांत हो जाता है अथवा जब शांति होती
है तो प्रेम भीतर से फूटने लगता है. रात्रि की नीरवता में ओस की बूंदों के रूप में
प्रेम ही बरसता है, तथा जब बादल बरस कर जल के रूप में प्रेम बरसा रहे हों तो बाद
में वातावरण कितना शांत व शुभ्र प्रतीत होता है. धरा की गहराई में पूर्ण नीरवता
में बीज प्रेम में ही मिटता है और नये अंकुर का जन्म होता है. परिवार के सदस्यों
के मध्य यदि प्रेम सहज रूप से विद्यमान रहे तो घर में शांति रहती है. यदि प्रेम की
उस धारा में कोई रुकावट आ जाये तो घर की शांति भंग हो जाती है. प्रेम और शांति
हमारा मूल स्वभाव है, हमारा निर्माण इनसे ही हुआ है. हम मानवों ने तन तो ऊपर से
ओढा हुआ है. मन व बुद्धि जहाँ से उपजे हैं, वह स्रोत प्रेम ही है और वहाँ गहन
शांति है.
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