मानव मस्तिष्क में अद्भुत
क्षमता है. आज वैज्ञानिक अंतरिक्ष के रहस्यों को जानने के लिए तत्पर हैं, संचार के
साधनों में अत्यधिक वृद्धि हो चुकी है. भारत का पुरातन इतिहास उठाकर देखें तो ऐसे कई
आश्चर्यजनक विवरण मिलते हैं उस काल में ऋषियों ने बिना अंतरिक्ष में गये धरती के गोल
होने तथा सूर्य की परिक्रमा करने की बात ज्ञात कर ली थी. सौर मंडल के कितने ही
रहस्य उन्हें पता थे. धरती तथा अन्य ग्रहों की सूर्य से दूरी का जो अनुमान
उन्होंने लगाया था वह आधुनिक विज्ञान से मेल खाता है. इसी प्रकार जड़ी-बूटियों का
ज्ञान उन्हें प्रयोगशाला में जाकर नहीं मन की शक्ति से ही हो जाता था. जब संसार का
रचियता स्वयं मानव के इस मन में बैठा है तो भला यह सम्भव भी क्यों न होता. आज
छोटी-छोटी बातों के कारण जो युवा आत्महत्या की बात सोचने लगते हैं, उन्हें अपने मन
की इस अद्भुत क्षमता का कोई ज्ञान ही नहीं है. भारत में जन्म लेकर अध्यात्म का
ज्ञान न होना आज के युवाओं के जीवन में सबसे बड़ी कमी है.
Wednesday, July 31, 2019
Monday, July 29, 2019
भीतर बाहर एक हुआ जो
एक जीवन
बाहर है और एक जीवन भीतर है. साधना का लक्ष्य है दोनों में समरसता लाना. हम घर में
रहते हैं और बाहर भी जाते हैं. साधना का लक्ष्य है दोनों जगह हमारे मन का भाव रसमय
बना रहे. यदि भीतर अशांति है तो लाख न चाहने पर भी हमारे व्यवहार में वह झलक ही
जाएगी. यदि भीतर शांति है तो बाहर के शोरगुल में भी हमारा व्यवहार सौम्य बना रह
सकता है. साधक के जीवन में एक दिन ऐसा भी आता है जब भीतर और बाहर का सारा भेद खो
जाता है, तब उसके व्यवहार में सहजता प्रकट होती है. उसी दिन वह अपनी दृष्टि में
प्रामाणिक होता है, और जगत में उसके लिए कोई पराया नहीं रह जाता. संत व शास्त्र
बताते हैं इसके लिए स्वयं को जानना पहला कदम है. ध्यानपूर्वक जब हम अपने मन को
देखना आरंभ करते हैं तो वह सारी चतुराई छोड़ने को तैयार हो जाता है. पहले पहल विकार
प्रबल होते हुए लगते हैं पर धैर्यपूर्वक उनका दर्शन करने से वे अपना असर खोने लगते
हैं. मन की गहराई में छिपा रस प्रकट होने लगता है और सहज ही बाहर जीवन बदलने लगता
है.
Sunday, July 28, 2019
गुरू की महिमा कौन बखाने
शब्द
अधूरे हैं, अल्प सामर्थ्य है शब्दों में. भाव गहरे हैं, अनंत ऊर्जा है भावों में, किंतु गुरू
के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी हो तो भाव भी कम पड़ जाते हैं. वहाँ तो मौन ही शेष
रहता है. जब उसके हृदय से साधक का हृदय जुड़ जाता है तो मौन में ही संवाद घटता
है. गुरू के शब्द और कर्म प्रेम से ही उपजे हैं. वह नित जागृत है, करुणा, प्रेम और
जीवन के प्रति उत्साह के भाव उसके हृदय में लबालब भरे हैं. उसका ज्ञान एक पवित्र
जल धारा की तरह साधकों के मनों को तरोताजा कर देता है. उसके हृदय का वृक्ष शांति,
सुख और आनंद के फलों से लदा है, जो वह बेशर्त प्रदान करता है. उसकी आँखों में
प्रेम की मस्ती है, आत्मा में बेशकीमती खजाना है, जो वह लुटा रहा है. वह साधकों के
अंतर में साधना का बीज बोता है, जो भी व्यर्थ है उसे उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित
करता है, जो भी अच्छा है, उसे बाड़ लगाकर सहेजने के लिए कहता है. उसके भीतर से
जो स्वर्गिक संगीत निकलता है, उसे सुनकर साधक जीवन के सुन्दरतम रूप को देखते हैं.
उसकी आत्मा के प्रकाश में भीग कर उनमें भी भीतर जाने की ललक जगती है, पावों में
पंख लग जाते हैं, मन जीवन के प्रति तीव्र चाह से भर उठता है.
निज स्वरूप है सदा असंग
स्थूल देह हमारा घर है. प्राणमय कोष ऊर्जा है. मनोमय कोष संचार का साधन है, विज्ञान
मय कोष कर्ताभाव को उत्पन्न करता है.
आनन्दमय कोष में स्थित रहने पर सहज ही सुख का अनुभव होता है, किंतु यह भी अज्ञान जनित सुख है. देह भाव से मुक्त हुए
तो, जरा-रोग का भय नहीं रहता. प्राणमय कोष से मुक्त हुए तो भूख-प्यास का भय नहीं
रहता. विज्ञानमय कोष से मुक्त हुआ साधक कर्त्ता भाव से मुक्त हो जाता है. हम इनके
माध्यम से प्रकट हो रहे हैं, इन्हें प्रकाशित कर रहे हैं, न कि हम ये हैं. मन,
बुद्धि आदि को 'स्वयं' मानना ही माया है. जैसे पानी समुद्र या लहरों का साक्षी
नहीं है, समुद्र व लहरें उसकी उपाधियाँ हैं, वह अपने आप में निसंग है, वैसे ही आत्मा अपने आप में पूर्ण है. जैसे कोई
पक्षी दर्पण के सामने खड़े होकर प्रतिबिम्ब से प्रभावित हो जाता है, वैसे ही हम मन,
बुद्धि आदि से प्रभावित हो जाते हैं. जितना-जितना हम विश्राम में रहते हैं,
उतना-उतना अपने स्वरूप के निकट रहते हैं.
Friday, July 26, 2019
सत के पथ पर चलना होगा
मानव जीवन सत्य से मिलने का एक अवसर है. शास्त्रों में सत्य की परिभाषा दी गयी है,
जो सदा से है, सदा रहेगा, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता पर जो सारे परिवर्तनों का
आधार है. यदि हम अपने जीवन पर दृष्टि डालें तो शैशवावस्था नहीं रही, किशोरावस्था
भी चली गयी, युवावस्था और प्रौढ़ावस्था भी टिकने वाली नहीं हैं. एक दिन यह तन भी
नहीं रहेगा, अर्थात देह की अवस्थाएं सत्य नहीं हैं. जो इन सभी अवस्थाओं को देखने
वाला था, वह सदा रहेगा. इसी तरह उदासी आई और चली गयी, ख़ुशी के पल आये और चले गये.
हम सबका अनुभव है कि सुख-दुःख ज्यादा देर टिकते नहीं हैं, इनका आधार मन भी सदा अपने
रंग-ढंग बदलता रहता है. यदि कोई इस मन की मानकर चलेगा तो सत्य से दूर ही रहेगा.
शास्त्र और गुरूजन जो मार्ग दिखाते हैं, उस साधना के मार्ग पर चलकर ही हम मन के
पार जाकर उसके आधार की झलक पाते हैं. यह सत्य से हमारा प्रथम मिलन होता है. जब इस
ज्ञान का जीवन में प्रयोग आरम्भ हो जाता है, तब इसमें हमारी स्थिति दृढ़ होने लगती
है और जीवन से असत्य का लोप होने लगता है.
Saturday, July 20, 2019
बार-बार खुद को पाना है
जीवन एक अनवरत बहती धारा की तरह एक चक्र में प्रवाहित हो रहा है. सागर में मिलने
की लालसा लिए नदी दौड़ती जाती है पर वायु उसे आकाश को लौटा देता है, बादलों के रूप
में बरसती है तो फिर नदी बनकर एक यात्रा पर निकल जाती है. सागर में खुद को खोकर
बादलों के द्वारा पुनः खुद को पाना क्या यही नदी का लक्ष्य नहीं है. मन रूपी धारा
भी आत्मा के सागर में लौटना चाहती है,
सुख-दुःख के दो किनारों के मध्य से बहती हुई स्वयं तक लौटने की उसकी यात्रा ही तो
जीवन है. कोई स्वयं तक पहुँच भी जाता है तो किसी न किसी कामना की वायु उसे पुनः एक
नयी यात्रा पर ले जाती है. इस तरह न जाने कितने ही जन्मों में मानव ने संतों के
चरणों में बैठकर आत्मअनुभव किया होगा, किंतु इस धरती का आकर्षण उसे हर बार मुक्ति
के द्वार से यहीं लौटा लाया होगा. आत्मा में स्वयं को खोकर जगत में खुद को पाने की
यात्रा क्या यही तो जीवन का रहस्य नहीं है ?
Tuesday, July 16, 2019
सदा वसंत रहे जब मन में
एक जीवन है हम सबका जीवन, यानि सामान्य जीवन, जिसमें कभी ख़ुशी है कभी गम हैं. इस
जीवन में जिन खुशियों को फूल समझकर हमने ही चुना था वे ही अपने पीछे गम के कांटे
छुपाये हैं यह बात देर से पता चलती है. इस जीवन में छले जाने के अवसर हर कदम पर
हैं, क्योंकि यहाँ असलियत को छुपाया जाता है, जो नहीं है उसे ही दिखाया जाता है.
एक और जीवन है ज्ञानीजन का जीवन, जिसमें सदा वसंत ही है, जिसमें खुशियों के फूलों
को चुनने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि वे स्वयं ही फूल बन जाते हैं, ऐसे फूल
जिनमें कोई कांटे नहीं होते. उस जीवन में कोई छल नहीं होता क्योंकि भीतर और बाहर
वे एक से हैं. वे वास्तविकता को जान कर सहज रहना सीख जाते हैं, कोई दिखावा, दम्भ
या पाखंड, बनावट उन्हें छू भी नहीं पाती. जीवन जैसा उन्हें मिलता है उसे वैसा ही
स्वीकार करने की क्षमता वे अपने अंदर जगा लेते हैं. वे वर्तमान में रहते हैं और
अतीत के भूत से पीछा छुड़ा लेते हैं. भविष्य के दिवास्वप्न भी उन्हें नहीं लुभाते
क्योंकि जीवन की क्षण भंगुरता का उन्हें हर समय बोध रहता है, जिस कल के लिए हम
संग्रह करते हैं, और वर्तमान में कष्ट उठाते हैं, उस कल को वे कल पर ही छोड़ देते
हैं. वह कल भी उनके लिए इस वर्तमान की तरह सुंदर ही होगा ऐसा उन्हें यकीन रहता है.
ऐसे ही जीवन से हमारा परिचय कराने के लिए परमात्मा ने गुरू और शास्त्र का निर्माण
किया हैं.
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