Saturday, September 21, 2013

मोह मिटाए रहें मगन

मार्च २००५ 
विपशना ध्यान बहुत सरल है. श्वासों को आते-जाते देखना, फिर धीरे-धीरे देह में होने वाले ऊर्जा प्रवाह को देखना. तरंगो को उत्पन्न होते फिर नष्ट होते देखना. कोई विचार उठा नहीं कि  भीतर उसके सापेक्ष कोई संवेदना जगी. कोई दुखद बात सुनी कि भीतर एक विषैला प्रवाह दुःख का दौड़ने लगता है, जैसे ही पता चला वह खबर असत्य थी, परिवर्तन होने लगता है लेकिन उस विष का प्रभाव तो देह को झेलना ही पड़ा. हम यदि मोह छोड़कर जगत में रहें तो दुःख को टिकने की जगह ही न मिले. इन विकारों का जन्म हमारे ही भीतर होता है क्योंकि घटनाएँ तो हर क्षण संसार में हो रही हैं, हमें वही प्रभावित करती हैं जिनसे हम मोह से बंधे हैं.  यदि मन सुख-दुःख के प्रति निरपेक्ष रहे, प्रतिक्रिया न करे तो भीतर ऊर्जा व्यर्थ नहीं होगी. जो क्रोध हमें भीतर जलाता है वही हम बाहर अन्यों पर कर सकते हैं. हमारी चेतना सुप्त ही रहती है जब हम अहंकार वश जीवन में होने वाली घटनाओं का सूत्रधार बनना चाहते हैं. सभी कुछ घटित हो रहा है, हम साक्षी हैं.  

Friday, September 20, 2013

मिला हुआ वह हर पल सबसे

मार्च २००५ 
किस तरह स्वयं को जगत के लिए उपयोगी बना सके, साधक को इसका भी ध्यान रखना चाहिए. एकांत साधना आरम्भ में तो ठीक है, जब नये-नये अनुभव होते हैं तो लगता है, एकमात्र उसे ही ईश्वर की कृपा का प्रसाद मिला है, पर नजरें उठाकर देखें तो पता चलता है, सृष्टि के आदि से अनेकों सन्त-महात्मा साधक हो गये, अभी भी हजारों-लाखों हैं, ईश्वर को पाना ही स्वाभाविक है, क्योकि वह कभी खोया ही नहीं था बल्कि उसे भूल जाना ही असम्भव है. साधना का लक्ष्य है कृपा का अनुभव और जब ऐसा लगने लगे तो स्वयं को लुटा देना चाहिए, जितनी-जितनी सेवा हो सके करनी चाहिए. यह जगत उससे अलग नहीं, जगत की अच्छाई-बुराई सब उसी से है. तीनों गुणों से बंधी प्रकृति के कारण प्राणी अपना-अपना कार्य कर रहे हैं, जो इस बंधन को काट सके वही साधक है. साक्षी भाव से तब वह इस व्यापर को देखता है, उससे लिप्त नहीं होता. 

Thursday, September 19, 2013

'मैं' से' 'मैं' तक

फरवरी २००५ 
प्रभु ! तू याद आता क्यों नहीं है
इस दिल में समाता क्यों नहीं है

हमारी सोच ‘मैं’ से शुरू होती है और ‘मैं’ पर खत्म भी होगी. हम जो भी कर्म कर रहे होते हैं चाहे वे अपने लिए हों या दूसरों के लिए, ‘मैं’ की धुरी के इर्द-गिर्द ही होते हैं. अस्तित्त्व से जुड़े बिना हमारे कार्यों, वाणी तथा विचारों में गहराई नहीं आती, हम सतही स्तर पर ही जीवन जिए चले जाते हैं, पर जब हम अपने भीतर की सत्यता का अनुभव करते हैं तो हमारा ‘मैं’ जो पहले संकीर्ण था, अब सब कुछ उसमें समा जाता है, जीवन जैसा आता है उसे वैसा स्वीकारने की क्षमता पैदा होती है. हमारे ‘स्व’ का विस्तार होता है, सभी के भीतर उसी एक अस्तित्त्व का दर्शन हमें होता है. 

Wednesday, September 18, 2013

हुकुम रजाई चालिए

फरवरी २००५ 
जब जीवन का लक्ष्य तय हो जाता है तो रास्ता मिलने लगता है, हमारे अंतर की सच्ची पुकार कभी भी अनसुनी नहीं रहती, परम पिता परमात्मा हमारे लिए वह सारे साधन जुटा देता है जो हमारे विकास के लिए आवश्यक हैं. हमारा जीवन प्रकृति के सूक्ष्म नियमों द्वारा संचालित होता है. पूर्व में किये गये कर्मों के अनुसार हमारे भावी कर्म नियत होते हैं, प्रमादवश मानव स्वयं को कर्ता मानता है, लेकिन वास्तव में प्रकृति के गुणों के अनुसार ही उसके कर्म होते हैं. साधक साधना के द्वारा इन गुणों के पार जाना चाहता है. चेतना में जगा हुआ जीव ही सचेत होकर कर्म करता है, जब वह गुणों के पार चला जाता है.

Tuesday, September 17, 2013

गहरे पानी पाए मोती

फरवरी २००५ 
मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि मानो आत्मा रूपी झील पर उठने वाली तरंगे हैं, जो आती हैं और मिट जाती हैं. मन में हर पल नये-नये विचार उठते रहते हैं और साथ ही समाप्त होते रहते हैं. यदि हम किसी विचार को पकड़ कर बैठ जाते हैं तो रुके हुए पानी जैसी काई उस पर जमने लगती है, यदि वह विचार सद् है तो कुछ समय के लिए अन्य अशुभ विचारों को ढक लेता है पर जब तक आत्मा तक हमारी पहुंच नहीं होगी, ऊपर-ऊपर का बदलाव विशेष बदलाव नहीं देता. क्षण-प्रतिक्षण हमारी बुद्धि बदलती रहती है, सुख-सुविधा की ओर खींचती है. प्रेय के मार्ग पर ले जाती है, श्रेय को तजकर हम दुःख ही पाते हैं. आत्मा की झील में उतरे बिना काम नहीं चलेगा. आत्म ज्ञान के बिना हम सुरक्षित नहीं है. 

Saturday, September 14, 2013

मैं से भरा उससे खाली

फरवरी २००५ 
जब तक हम देहात्म बुद्धि से जगत में रहते हैं, मन पर एक बोझ पड़ा ही रहता है, यह बोझ ‘मैं’ का है, ‘मैं’ जो अपने को कल्पनाओं के अनुसार एक पहचान दे देता है. बाहर जो दीखता है वह जगत बंधन का कारण नहीं है, बल्कि हमारी कल्पनाओं द्वारा गढ़ा गया संसार ही बंधन का कारण है. जब मन सारी, उपाधियों, कल्पनाओं, वासनाओं से खाली हो जाता है, तभी देहातीत का अनुभव होता है, तब हम स्वालम्बी हो जाते हैं, अपनी ख़ुशी के लिए संसार के आश्रित नहीं रहते, जगत तो अपनी प्रकृति के अनुसार पल-पल बदल रहा है, पर हम ‘वह’ हैं जो कभी नहीं बदलता.

Friday, September 13, 2013

सुख का सागर भीतर बहता


हम सभी के भीतर सद्वासना, असद्वासना तथा मिश्रित वासना है. सद्वासना सभी का कल्याण करती है, असद्वासना सदा दुःख को जन्म देती है, मिश्रित वासना कभी सुख कभी दुःख का कारण होती है. इस संसार में वही स्वस्थ हैं, यानि स्व में स्थित हैं जिन्हें किसी भी प्रकार की वासना नहीं सताती है, जिनके सारे आरम्भ नष्ट हो गये हैं, सहज प्राप्त कर्मों को जो करते हैं, और ऐसे कर्म उन्हें बांधते नहीं हैं. इच्छा न होने से मन में संकल्प-विकल्प भी नहीं उठते, तभी वे आत्मा में स्थित रहते हैं, आत्मा का सदा एक सा सुख भीतर से मिलता रहता है, वह सुख जो सीधे ईश्वर से आता है, उसका कोई और कारण नहीं है, जगत का सुख किसी कारण से ही होगा और जितना सुख होगा उतना ही दुःख भी उसके साथ जुड़ा होगा. आत्मा का सुख शुद्द है, अनंत है, प्रेम से परिपूर्ण है, उसमें जोई छिपाव नहीं है, वह इस जगत के दांवपेंच से परे है, वह  अछूता है, वह सात्विक है.