अधिकतर लोग यह मानते हैं कि बाहर से जीवन में कोई कमी न दिखाई देते हुए भी उनके दिल में इक खुदबुद सी लगी रहती है। कोई व्यक्ति वास्तव में चाहता क्या है, उसे इसकी खबर भी नहीं होती।संभवत: हर किसी की तलाश एक ऐसी शांति या सुकून की है, जो सदा-सदा के लिए भीतर का ख़ालीपन भर दे।वस्तुओं से बाज़ार भरा पड़ा है, किंतु वहाँ ऐसा कुछ नहीं मिल सकता जो इस अभाव को भर दे। इस तरह जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, यह बेचैनी दिनबदिन बढ़ती जाती है । एक दिन यही किसी न किसी रोग के रूप में प्रकट होती है।बेचैनी ज्यों ज्यों बढ़ती है, मन का सुकून घटता जाता है कोई इसे परिवार, मित्रों या चिकित्सक से बयान करता है, कोई इसके बारे में कुछ नहीं बताता। स्वयं ही ही मुक्त होने का उपाय खोजता है, किंतु वह यह भूल जाता है कि जिस मन ने इसे खड़ा किया है, वही मन इससे मुक्ति का उपाय कैसे बता सकता है।जो इसे दूर करे, वह दवाई कहीं बाहर नहीं मिलती। इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है, गुरु की शरण में जाना चाहिए, सत्संग करना चाहिए। गुरु और शास्त्र बताते हैं कि मन की तलाश अपने भीतर जाकर ही मिट सकती है। स्वयं से दूरी ही मानव को बेचैन करती है। जब तक कोई अपने होने को वास्तव में अनुभव नहीं कर लेता, बाहर के सुख और सुविधाएँ उसे वह शांति प्रदान नहीं कर सकते, जो वह चाहता है।
Monday, May 20, 2024
Saturday, May 11, 2024
लोकतन्त्र का पर्व मनाएँ
भारत में चुनावों का मौसम चल रहा है। यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व है।चारों ओर एक उत्सव का सा माहौल नज़र आता है। हर सड़क, गली, नुक्कड़ और चौपाल पर चहल-पहल है।देश ही नहीं विदेशों में भी भारत के चुनाव का जादू चल गया लगता है। कनाडा निज्जर और अमेरिका पन्नू पर अटक गया है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को जहाँ प्रश्रय मिलता है, ऐसे भारत को विश्व सलाहें दे रहा है। जिस देश में विवाह के अवसर पर ‘गालियों’ को लोग सिर माथे लगाते हैं। होली पर लट्ठमारने की सुविधा दी जाती है; भला वहाँ चुनावों में एक-दूसरे की बखिया उधाड़ने में लोग पीछे क्यों रह जायें।आज सभी पार्टियों के नेतागण जमकर मन की भड़ास निकाल रहे हैं।विदेशी भूमि पर भारत की अखंडता को मिटाने का षड्यंत्र रचने वालों को महिमामंडित किया जा रहा है। ऐसे लोगों द्वारा जो यूक्रेन और इज़राइल को लाखों डालर देकर हज़ारों निर्दोषों को मरवा चुके है, भारत पर विदेशी भूमि पर लोगों को मरवाने का आरोप लगाया जा रहा है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है ! आज विदेशों में पढ़ने वाले कितने ही छात्र हिंसा का शिकार हो रहे हैं।पड़ोसी देश की भाषा बोलने वाले कुछ लोग भारत में बैठे हैं, जो उनके बम का हवाला देकर भयभीत कर रहे हैं। वह अपने क़ब्ज़े वाले कश्मीर को आटा तक मुहैया नहीं करवा पा रहा और भारत के कश्मीर में उसे खून की नदियाँ बहती दिखायी पड़ती हैं; पता नहीं कौन सा चश्मा उसने चढ़ाया हुआ है। इस चुनाव में कई तेजस्वी और निर्भीक महिलाओं ने भी समाज को दिशा दिखाने का बीड़ा उठाया है।यू ट्यूबर्स की भी आज जैसे बाढ़ आ गई है, जो भविष्यवाणियाँ कर रहे हैं। सबसे बड़े भविष्यवक्ता तो मतदाता हैं, जिनके हाथ में भारत का भविष्य है। आधा रास्ता तय हो गया है, आधा सफ़र शेष है। जो इसी तरह टीवी डिबेट्स देखकर हँसते-हँसाते निकल जाएगा। जय भारत ! जय श्रीराम !
Wednesday, May 8, 2024
एक तलाश सदा जारी है
Thursday, May 2, 2024
ध्यान, मुक्ति में भेद नहीं है
संत कहते हैं, साधक को हर सुबह अपने दिन की शुरुआत ऐसे करनी चाहिए जैसे कि वह पहली बार जगत को देख रहा है। ध्यान का अर्थ ही है, हर पल को गहराई से महसूस करना, हर पल ओस की तरह ताज़ा है, अभी है अभी नहीं रहेगा। अतीत मृत हो चुका है। जब हम अतीत को भुला देते हैं तो भविष्य की आशंका भी नहीं रहती।केवल शुद्ध वर्तमान रह जाता है। परमात्मा की उपलब्धि वर्तमान में ही हो सकती है। अतीत और भविष्य हमें स्मृति या कल्पना से बांधे रखते हैं। जबकि हर आत्मा की पुकार स्वतंत्रता है।शिशु भी मुक्त होना चाहता है और वृद्ध भी, किसी को भी आदेश या शासन में रहना नहीं भाता। अनुशासन का अर्थ है, स्वयं पर स्वयं का लगाया गया प्रतिबंध, जिसके भीतर हम मुक्त हैं। जब अतीत का बोझ नहीं है और आने वाले कल की चिंता नहीं है तभी मन अपने शुद्ध व मुक्त स्वरूप का अनुभव कर सकता है। यही ध्यान है।
Sunday, April 21, 2024
लक्ष्य उच्च होगा जब अपना
मानव के सम्मुख लक्ष्य यदि स्पष्ट हो तो जीवन यात्रा सुगम हो जाती है। मन की समता बनी रहे तो भीतर का आनंद सहज ही प्रकट होता है, इसलिए योग के साधक के लिए मन की समता प्राप्त करना सबसे बड़ा लक्ष्य हो सकता है। परमात्मा तो सुख का सागर है ही, इसलिए भक्त के लिए परमात्मा के साथ अभिन्नता अनुभव करना उसका लक्ष्य है. निष्काम कर्मों के द्वारा कर्मयोगी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है, इसलिए कर्मयोगी अपने कर्मों से समाज को उन्नत व सुखी देखकर सुख का अनुभव करता है। तीनों का अंतिम लक्ष्य तो एक ही है, वह है आनंद ! देखा जाये तो सांसारिक व्यक्ति भी हर प्रयत्न सुख के लिए ही करते हैं, किन्तु दुःख से मुक्त नहीं हो पाते क्योंकि उन्होंने अपने सम्मुख कोई बड़ा लक्ष्य नहीं रखा.
Wednesday, March 13, 2024
ध्यान में डूबा हो जब अंतर
एक बार एक व्यक्ति किसी संत के पास गया और दुख से मुक्ति का मार्ग पूछा। संत ने कहा, ध्यान, उसने कहा कुछ और कहें, संत ने दो बार और कहा, ध्यान ! ध्यान ! जब हम स्कूल में पढ़ते थे, अध्यापक गण हर घंटे में कहते थे, ध्यान दो, ध्यान से पढ़ो।घर पर माँ बच्चे को कोई समान लाने को कहे तो पहले कहेगी, ध्यान से पकड़ो। सड़क पर यदि कोई ड्राइवर गाड़ी ठीक से न चलाये, तो कहेंगे, उसका ध्यान भटक गया। इसका अर्थ हुआ ध्यान में ही सब प्रश्नों का हल छिपा है।ध्यान हमारी बुद्धि की सजगता की निशानी है। जब बुद्धि सजग हो तो भूल नहीं होती। इसी तरह जब मन ध्यानस्थ होता है तो सहज स्वाभाविक प्रसन्नता तथा उजास चेहरे पर स्वयमेव छाये रहते हैं, उनके लिए प्रयास नहीं करना पड़ता. मन से सभी के लिए सद्-भावनाएँ उपजती हैं. यह दुनिया तब पहेली नहीं लगती न ही कोई भय रहता है. ध्यान से उत्पन्न शांति सामर्थ्य जगाती है और सारे कार्य थोड़े से ही प्रयास से होने लगते हैं. कर्त्तव्य पालन यदि समुचित हो तो अंतर्मन में एक अनिवर्चनीय अनुभूति होती है, ऐसा सुख जो निर्झर की तरह अंतर्मन की धरती से अपने आप फूटता है, सभी कुछ भिगोता जाता है, जीवन एक सहज सी क्रिया बन जाता है कहीं कोई संशय नहीं रह जाता.
Friday, March 8, 2024
शुभता को मन करे वरण
संतजन कहते हैं, जो अपने लिये सत्यं, शिवं और सुन्दरं के अलावा कुछ नहीं चाहता, प्रकृति भी उसके लिये अपने नियम बदलने को तैयार हो जाती है. जो अपने ‘स्व’ का विस्तार करता जाता है, जैसे-जैसे अपने निहित स्वार्थ को त्यागता जाता है, वैसे-वैसे उसका सामर्थ्य बढ़ता जाता है. अस्तित्त्व पर निर्भर रहें तो कोई फ़िक्र वैसे भी नहीं रह जाती क्योंकि वह हर क्षण हमारे कुशल-क्षेम का भार वहन करता है. जैसे एक नन्हा बालक अपनी सुरक्षा के लिये माँ पर निर्भर करता है, हमारे सभी कार्य यदि हम उस पर निर्भर रहते हुए करेंगे तो उनके परिणाम से बंधेंगे नहीं. हम जो भी करें उसका हेतु सत्य प्राप्ति हो तो सामान्य कार्य भी भक्ति ही बन जाते हैं. एक मात्र ईश्वर ही हमारे प्रेम का केन्द्र हो, जो कहना है उसे ही कहें. अन्यों से प्रेम हो भी तो उसी के प्रति प्रेम का प्रतिबिम्ब हो. परमात्मा की कृपा जब हम पर बरसती है तो अपने ही अंतर से बयार बहती है. तब अंतर में तितलियाँ उड़ान भरती हैं. अंतर की खुशी बेसाख्ता बाहर छलकती है. ऐसा प्रेम अपनी सुगन्धि अपने आप बिखेरता है. दुनिया का सौंदर्य जब उसके सौंदर्य के आगे फीका पड़ने लगे, उस “सत्यं शिवं सुन्दरं” की आकांक्षा इतनी बलवती हो जाये, उसके स्वागत के लिए तैयारी अच्छी हो तो उसे आना ही पडेगा. अंतर की भूमि इतनी पावन हो कि वह उस पर अपने कदम रखे बिना रह ही न पाए. रामरस के बिना हृदय की तृष्णा नहीं मिटती. परम प्रेम हमारा स्वाभाविक गुण है, उससे च्युत होकर हम संसार में आसक्त होते हैं. कृष्ण का सौंदर्य, शिव की सौम्यता, और राम का रस जिसे मिला हो वही धनवान है. जिस प्रकार धरती में सभी फल, फूल व वनस्पतियों का रस, गंध व रूप छिपा है वैसे ही उस परमात्मा में सभी सदगुण, प्रेम, बल, ओज, आनंद व ज्ञान छिपा है, संसार में जो कुछ भी शुभ है वह उस में है तो यदि हम स्वयं को उससे जोड़ते हैं, प्रेम का संबंध बनाते हैं तो वह हमें इस शुभ से मालामाल कर देता है, दुःख हमसे स्वयं ही दूर भागता है, मन स्थिर होता है. धीरे धीरे हृदय समाधिस्थ होता है. एक बार उसकी ओर यात्रा शुरू कर दी हो तो पीछे लौटना नहीं होता...दिव्य आनंद हमारे साथ होता है और तब यह जीवन एक उत्सव बन जाता है.