मिथ्या अहंकार के कारण हम स्वयं को एक लघु इकाई मान बैठते हैं, पर जब हृदय प्रेम से परिचित होता है तो अहंकार गल जाता है. सभी अपने लगते हैं. सभी के भीतर वही एक चैतन्य दीख पड़ता है. हम स्वयं को विशाल अनुभव करते हैं. यह भाव अनोखा है. कोई सुंदर दृश्य देखकर एक क्षण के लिये श्वास भी थम जाती है, कभी किसी के आँसू देखकर जो सूक्ष्म भाव मन में उठते हैं, उस कान्हा की कोई कथा याद आने पर कभी मुस्कान तो कभी आँखों से जल बहता है, ये सभी प्रेम के ही रूप हैं. यह संसार उसकी लीला है, यह सोचकर जो कौतूहल होता है, इस विशाल ब्रह्मांड को अरबों, नक्षत्रों, और नाना जीवों को धरा पर चलते-फिरते देखकर कितना अचरज होता है, फिर हमारा स्वयं का मन..एक क्षण में कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है. आत्मा की सुंदरता, जो ध्यान में दीख पड़ती है. हमारे भीतर का संगीतमय सुंदर संसार...यह सब कितना विचित्र है. और कितने भाग्यशाली हैं हम कि यह सब देख पा रहे हैं.
Tuesday, April 17, 2012
Sunday, April 15, 2012
आनंद हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है
फरवरी २००३
आत्मा का ज्ञान हमारे भीतर के कुसंस्कारों को उसी तरह जला कर समाप्त कर देता है जैसे कोई चिंगारी सूखी घास को. न जाने कब से हम कुछ खोज रहे हैं, अब हृदय में ज्ञान की प्यास जगी है, ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति फलित हुई है. ज्ञान के दीपक के प्रकाश में बैठने का अवसर मिला है. मन को भी तो विश्राम चाहिए, मन की दौड़ जहाँ खत्म होती है वहीं से आध्यात्मिक लोक की शुरुआत होती है. जो हमारा वास्तविक घर है क्योंकि हम न देह हैं न मन, ये तो हमें प्रकृति द्वारा प्राप्त उपकरण हैं. हमारा वास्तविक रूप बुद्धि व अहंकार से परे एक आनंदमय सत्ता है, जो उस चिन्मय परमात्मा का अंश है. परमात्मा इस सृष्टि का कारण है, हमारा हितैषी है, सुह्रद है. जब तक हम देहात्म भाव से मुक्त नहीं हो पाते तो इस आनंद से वंचित रहते हैं जो हमारा अधिकार है. आत्मस्वरूप में टिकते ही अंतर में प्रेम का अनवरत प्रवाह होता है, तृप्ति का अनुभव होता है,विचारों के प्रति सजगता बढ़ती है सरलता और सहजता हमारा स्वभाव बन जाता है.
Thursday, April 12, 2012
रहना असली घर में है
फरवरी २००३
संसार एक क्रीडास्थल है, जहाँ खेलते समय हमें ध्यान रखना है कि कोई ऐसा स्थान भी है जहाँ हम विश्राम लेते हैं, पुष्टि व तुष्टि पाते हैं. वह हमारा असली घर है. उस खेल में सफलता है मन की प्रसन्नता, तृप्ति और संतोष. भीतर की कंपकपी, दर्द, पीड़ा तब चले जाते हैं जब हमारे मन में छिपा प्रेम का स्रोत हमें मिल जाता है. जीवन में जो भक्ति घटित होती है वही वास्तविक शक्ति है. भजन गाते समय जब अंग-अंग भजन मय हो जाये तब भीतर आरती घटित होती है. हमारी आत्मा का चरित्र प्रकट होने लगता है. जीवन में सत्य का सँग साथ हो, स्वध्याय हो, सेवा हो और साधना हो तो ही खेल पूर्ण होता है. हमारे सम्पर्क में आने वाले भी हमारे लिये प्रसन्नता का स्रोत बन जाते हैं क्योंकि उनके साथ हमें अपना प्रेम व आनंद बाँटने का अवसर मिलता है.
Wednesday, April 11, 2012
प्रेम गली अति सांकरी
फरवरी २००३
प्रेम हमें मानव से महामानव बना सकने की सामर्थ्य रखता है, प्रेम जो देना जानता है मात्र लेना नहीं. ईश्वर से अनन्य प्रेम हो तो हृदय में कृपणता नहीं रहती, रोग, शोक, मोह तो ऐसे छूट जाते हैं जैसे वस्त्रों को झाड़ देने पर धूल छूट जाती है. प्रेम पूर्वक यदि उसे बुलाएँ तो वह प्रकट भी होता है और नित्य नवीन रस का अनुभव कराता है. उस प्रेम के आगे संसार की अमूल्य से अमूल्य वस्तु भी कमतर है. उसका स्मरण ऐसी ऊँचाइयों पर ले जाता है जहाँ कुछ शेष नहीं रह जाता. जहाँ केवल वही रह जाता है. अपना आपा तो रहता ही नहीं, जो मिथ्या है, उसे तो नष्ट होना ही है, जो है उसी की सत्ता रह जाती है. उसी के नाते तो हमें इस सृष्टि से प्रेम है. उसे हमारा प्रेम भरा दिल ही चाहिए और कुछ नहीं, उस पल में उसके और हमारे मध्य और कुछ नहीं रहता. न संसार, न कोई इच्छा...बस दो ही सम्मुख होते हैं. वह प्रिय है, सम्पूर्ण है, अनंत है कि उसमें सब समाया है, फिर उसके बिना यहाँ कुछ और है ही नहीं, वह एक क्षण के लिये भी हमसे दूर नहीं है.
Tuesday, April 10, 2012
संशय के पार
जनवरी २००३
स्वयं पर संशय, समाज पर संशय और परमात्मा पर संशय, ये तीनों हमें प्रयत्नपूर्वक छोड़ने हैं. इनमें से एक भी हमारे प्रगति में बाधक है. इसके लिये मन की वृत्ति बिखरी हुई न हो एक ओर टिकी हो. ध्यान सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम होता जाय, तभी शक्ति व सामर्थ्य उभरता है और अंततः सारे संशयों का नाश होता है. ईश्वर सच्चिदानंद स्वरूप है, भौतिक जगत में उसका सत् स्वरूप प्रकट होता है, जीवों में उसका चैतन्य स्वरूप प्रकट होता है और भक्तों में उसका आनंद स्वरूप प्रकट होता है. दुःख का निमित्त बाहर है, दुःख मिलने पर मन में दुखाकार वृत्ति होती है उस वृत्ति से यदि हम एकाकार हों तभी दुःख गहरा होता है, यदि साक्षीभाव से देखना आ जाये तो हम उसके भागी नहीं होंगे. साधना के पथ पर जब एक बार कदम रख दें तो मन में उठने वाले प्रश्नों का जवाब किसी न किसी माध्यम से मिल ही जाता है. उस परम सत्ता पर पूर्ण विश्वास हो तो वह हमारी हर पल खबर लेता रहता है.
Monday, April 9, 2012
सब तुझमें हैं तू ही सबमें
जनवरी २००३
सदगुरु हमें बार-बार चेताते हैं, हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है, उसे हमें कैसे पाना है. वह इतने सरल शब्दों में अपने अंतर के सम्पूर्ण प्रेम को उड़ेंलते हुए, हमारा हित चाहते हुए कहते हैं कि हमें जीवन को कैसे जीना चाहिए ताकि मन का परिष्कार हो, बुद्धि का विकास हो, आत्मा का प्राकट्य हो. उस परम लक्ष्य की स्तुति हम कैसे करें, उसे कैसे सराहें और सत्य के अधिकारी कैसे बनें. यह सभी वह हमें पुनः पुनः समझाते हैं. उनके भीतर ज्ञान का एक असीम खजाना है, हम यदि उसका एकांश भी अपना लें तो जीवन पथ पर शीघ्र आगे बढ़ सकते हैं. सर्वव्यापी परमेश्वर में सभी को और सब में उसे देखना है. वही एक है जो अनेक होकर विस्तृत हो गया है. तो सभी समान हुए, कोई छोटा बड़ा नहीं. हमें सभी का सम्मान करना है, वह अखिल ब्रह्मांड स्वामी जैसे सब कुछ करते हुए भी अकर्ता है, हम भी साक्षी भाव से मन व इन्द्रियों को अपने अपने गुणों में वर्तते हुए देखें, उनमें लिप्त न हों. व्यर्थ के कामों से बचे, व्यर्थ के प्रलाप से बचें औए व्यर्थ के चिंतन से भी बचें. जिससे हमारी ऊर्जा ध्यान तथा स्वयं को जानने में लग सके. अपने भीतर उतरने के लिये बहुत ऊर्जा की आवश्यकता है. यदि हम स्वयं को इच्छाओं के जाल से मुक्त कर लें तो वह हमारा सुह्रद हमारी जरूरतों को जैसे अब तक पूरा करता आया है भविष्य में भी करेगा.
Saturday, April 7, 2012
निर्बल के बल राम
जनवरी २००३
हमारे भीतर आत्मा का सूरज चमक ही रहा है, उसका प्रकाश बाहर आये यही साधना है. आत्मनिंदा साधना के लिये ठीक नहीं, आत्म पूजा ही हमारी रीत होनी चाहिए. अंतर शुद्धि और बाह्य शुद्धि इसके लिये पहला कदम है. संतोष, सरलता तथा प्रेम को धारण करते हुए सदा आनंदित रहना दूसरा.. क्रोध तभी आता है जब हम ज्ञान के बल से विहीन होते हैं, अविद्या और अज्ञान ही हमें जन्मों से दुःख व पीड़ा दे रहे हैं. यदि कभी क्रोध आ जाये तो “निर्बल के बल राम” को याद रखना होगा. पूर्ण समर्पण हो अस्तित्त्व के प्रति अथवा सदगुरु की शरणागति. मन को खाली करना है ताकि वहाँ प्रकाश भर सके. ऐसा प्रकाश जो प्रेम मय है, आनंद मय है शांति मय है...
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