Wednesday, October 22, 2014

जाग गया जब कोई भीतर

मार्च २००७ 
उपवास का अर्थ है निकट बैठना, उसके निकट जो भीतर है, प्रकाश, पावनता, सत्य और दिव्यता का जो स्रोत है. यानि हमारी आत्मा ! उसके पार ही तो परमात्मा है. मानव होने का जो सर्वोत्तम लाभ है वह यही कि वह स्वयं को जाने, जिसे जानने के बाद यह सारा जगत होते हुए भी नहीं रहता. साधक सभी कुछ करता है पर भीतर से बिलकुल अछूता रहते हुए. सब नाटक सा लगता है, कुछ भी असर नहीं करता. वह इन छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठ जाता है. जीना तब सहज होता है, कोई अपेक्षा नहीं, कुछ पाना नहीं, कुछ जानना भी नहीं. कहीं जाना भी नहीं, कहीं से आना भी नहीं. खेल करना है बस. जगना, सोना, खाना, पीना सब कुछ खेल ही हो जाता है. परमात्मा जो कभी दूर-दूर लगता था अपने सबसे करीब हो जाता है. वही अब खुद की याद दिलाता है. जो जन्मों से सोया हुआ था वह जाग जाता है. शास्त्र घटित होते हुए लगते हैं, उनकी बातें अक्षरशः सही लगती हैं. ऐसी मस्ती और तृप्ति में कोई नाचता है तो कोई हँसता है, कोई मुस्कुराता भर है !

Tuesday, October 21, 2014

निज घर में ही वह रहता है

मार्च २००७ 
सत्य के मार्ग पर चलने से पहले हमें सत्य के प्रति प्रेम जगाना है, उसकी प्यास जगानी है ! उसकी चाह जिसके भीतर जग जाती है वह तो इस अनोखी यात्रा पर निकल ही पड़ता है, और एक बार जब हम उस अज्ञात पर पूर्ण विश्वास करके उसे सबकुछ सौंप कर आगे बढ़ते हैं तो वह हमारा हाथ ऐसे थाम लेता है जैसे वह हमारी ही प्रतीक्षा कर रहा था. वह हमें अपने भीतर की ऊर्जा को जगाने का बल देता है राह बताता है जब अपने पथ से दूर होने लगे तो पुनः लौटा लाता है. वह हजार आँखों वाला, हजार बाहुओं वाला और सब कुछ जानने वाला है. हम उसकी तरफ चलते-चलते अपने घर लौट आते हैं तब ही पूर्ण विश्रांति का अनुभव करते हैं. 

Monday, October 20, 2014

भक्ति अति निराली घटना

मार्च २००७ 
परम सत्य की प्राप्ति का कोई भी मार्ग हो तो उसका अंत भक्ति में ही होता है, अर्थात ज्ञान का फल भी भक्ति है और कर्मयोग का फल भी भक्ति ही है. भक्ति स्वयं ही साधन है और स्वयं ही साध्य भी. भक्ति का अर्थ है सत्य से प्रेम...परम से प्रेम ! विष्णु की भक्ति करें या राम की, शंकर की अथवा कृष्ण की, सभी एक को ही पहुँचती है. यदि कोई अनपढ़ हो, शास्त्र न पढ़ सकता हो या समझ सकता हो, स्तुति न गा सकता हो, वह एक बात तो कर ही सकता है. वह ईश्वर से प्रेम कर सकता है. उसके किसी भी नाम को भज सकता है. उसको स्मरण कर सकता है. उसका प्रेम ही उसको तार देगा.  

Friday, October 17, 2014

खिला खिला हो मन का उपवन


हमारे मन में न जाने कितने-कितने जन्मों की कामनाओं के संस्कार पड़े हुए हैं और उसी तरह न जाने कितने सद्गुण, खजाने स्नेह भाव भी पड़े हैं. यह बीज समुचित वातावरण पाते ही अंकुरित हो जाते हैं. हम जो भी पढ़ते-सुनते हैं या जिन व्यक्तियों के संपर्क में आते हैं, जिस प्रकार का भोजन ग्रहण करते हैं, उस स्थान, व्यक्ति या भोजन की प्रकृति हमें अवश्य प्रभावित करती है. संग का मानसिक उन्नति पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है. हमें जो चाहिए उसी के अनुकूल खाद व पानी दें तो मन का उपवन व्यर्थ के खर-पतवार तथा जंगली काँटों से मुक्त रहेगा. ईश्वर प्रकट हो सकेगा. अच्छाई और बुराई के बीच का महाभारत हर एक को अपने भीतर लड़ना है. यदि ईश्वर की निकटता का अनुभव करना, इस सृष्टि के रहस्य पर से पर्दा उठाना यदि जीवन का लक्ष्य नहीं तो मानव जीवन की सार्थकता ही नहीं रह जाती. इससे छोटे लक्ष्य तो हमें विपरीत दिशा में ले जाते हैं.   

Thursday, October 16, 2014

सुख दुःख दोनों मन की रचना

मार्च २०१४ 
कौन यहाँ आंसू पोंछेगा, हर दामन भीगा लगता है” इस जगत से हम उम्मीद रखें कि हमारे दुःख को मिटाएगा तो यह वैसे ही होगा जैसे बालू से तेल निकालना, क्योंकि दुःख जगत ने हमें दिया ही नहीं है यह हमारी ही अज्ञानता से उत्पन्न हुआ है. इसी तरह सुख भी जो बाहर से मिलता हुआ प्रतीत होता है वास्तव में हमने ही उसे उत्पन्न किया है. जब हम इस बात को  स्वीकारते हैं तब जगत से सुख पाने की दौड़ समाप्त हो जाती है, बल्कि तब तो दुःख भी नहीं रहता. दुःख तभी तक है जब तक हम अहंकार से ग्रसित हैं. अहंकार का भोजन है दुःख. तभी तक है जब तक जो अपना नहीं है हम उसे अपना मानते हैं, यही मोह है, अज्ञान ही मोह का कारण है.

Tuesday, October 14, 2014

समाधान मिलता है भीतर

मार्च २००७ 
जो हमारा आज का विचार है, वही भविष्य की क्रिया है. विश्व क्रांति से अधिक हमें वैचारिक क्रांति की आवश्यकता है. वैचारिक परिवर्तन हमें अंतर्मुख होना सिखाता है, जिससे हम भीतर से मार्गदर्शन पाने लगते हैं. ध्यान से भीतर जो शक्ति उत्पन्न होती है वह स्वतः ही शुभता में ले जाती है. लोकसंग्रह के लिए तब कोई प्रयास नहीं करना पड़ता. ऊपरी सुन्दरता के दायरे से निकल कर जो विचार की सुन्दरता में प्रवेश करता है वह मानो अपने भाग्य का निर्माता बन जाता है. वह स्वमान में रहने लगता है और दूसरों का सम्मान करना सीखता है. स्वमान का अर्थ है अपने भीतर छिपे आत्मा के अमूल्य गुणों पर भरोसा. पवित्रता, प्रेम, सरलता, करुणा तथा सत्यता हमारे भीतर ही हैं, इसका प्रत्यक्ष अनुभव होने पर ही यह भरोसा उत्पन्न होता है.

Monday, October 13, 2014

जिन डूबा तिन पाइयां

मार्च २०१४ 
हमारे चारों ओर धूप है, प्रकाश है, हवा है, आकाश है...हम डूब सकते हैं इन नेमतों के सागर में. सत्य की महक ने हमें निमन्त्रण दिया है. परमात्मा ने इस जगत को आनन्द के लिए ही बनाया है, हम आनन्द की तलाश में निकलते जरूर हैं पर रास्ते में ही भटक जाते हैं. एक शिशु अपनी मस्ती में नाचता है, गाता है, खेलता है वह आनन्द की ही चाह है. आनन्द बिखेरो तो और आनन्द मिलता है जैसे प्रकाश फैलाओ तो बढ़ता है. वही बच्चा जब धीरे धीरे बड़ा होने लगता है सहजता खोने लगता है, और तब अपने भीतर का द्वार भी भूलने लगता है. कभी शरम, डर या क्रोध और कभी शिष्टाचार की दीवार उसे भीतर जाने से रोकती है और वह ख़ुशी के लिए बाहरी वस्तुओं पर निर्भर होने लगता है. वस्तुओं का जो ढेर उसके आस-पास बढ़ता जाता है उसके भीतर भी एकत्र होने लगता है. साधक उस ढेर को समर्पित करके खाली हो जाता है और परमात्मा का रस बरस जाता है.