Monday, November 3, 2014

सहज मिले सो मीठा होए

अप्रैल २००७ 
अनात्मा से सुख लेने की चेष्टा यदि होती है, कुछ करने की इच्छा यदि अभी भी भीतर है, कुछ करके मान पाने इच्छा ! तो अभी पूर्ण शरणागति नहीं हुई है. आत्मा बलवती होती है जब हम उससे जुड़ते हैं. जब हम अकर्ता भाव में आ जाते हैं तो जो कुछ भी होता है वह सहज भाव से होता है. प्रत्यक्ष ज्ञान होने पर स्वयं को आत्मा रूप के अनुभव में सहजता ही सबसे बड़ा लक्ष्ण है. हम जितना सहज होकर जीते हैं सभी के साथ आत्मभाव में रहते हैं. जड़-चेतन दोनों के प्रति सहज प्रेम का अनुभव करते हैं. जो हम नहीं है वह कहना या मानना ही अहंकार है. यदि हम अभी भी स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि मानते हैं, औरों के दोष हम तभी देख पाते हैं. दूसरों के दोष देखने से हम कर्म बांधते हैं. खुद के दोष प्रज्ञा दिखाती है, और इन्हें देखने से हम कर्मों से छूटते  जाते हैं ! 

Friday, October 31, 2014

नष्टो मोहा स्मृति लब्ध्वा...

अप्रैल २००७ 
यह जीवन क्या है ? सन्त कहते हैं इसका राज जानना है तो खाली होना है. तथाकथित ज्ञान से खाली होना है. बुद्धि के छोर पर जीने वाला हृदय से दूर ही रह जाता है. हृदय के द्वार पर जाने वाला कभी प्रेम से दूर नहीं रहता. प्रेम तभी आता है जब ज्ञान शून्य हो जाते हैं. प्रेम में दो और दो चार नहीं होते. ज्ञान की चरम स्थिति है ज्ञान से मुक्ति ! यह जीवन हमें इसलिए मिला है ताकि हम आत्मा के गुणों को जगत में प्रकाशित कर सकें. जीवन सतत साधना है. हम जीवित हैं क्योंकि आत्मा चैतन्य है, परमात्मा का अंश है. उसका स्वभाव ही जीवित रहना है. वह चेतन है, मरना उसका स्वभाव ही नहीं. अग्नि जैसे अग्नि है, गर्म है. आत्मा वैसे जीवित है. सुना हुआ ज्ञान मन में पूर्ण रूप से समा जाये यही उसकी सार्थकता है. सत्संग में ही इतना उच्च ज्ञान सुनने को मिलता है. बुद्धि के बल पर अर्जित किया गया ज्ञान संसार में सफलता दिला सकता है पर तृप्ति तो वही ज्ञान दे सकता है जो भीतर से उपजा है. वही आत्मा के द्वार पर ले जाने वाला है. यदि हम शाश्वत हैं, नित्य हैं, चेतन है तो हमें  दुःख क्यों होता है, जब हम अपने इस स्वभाव को भुला देते हैं तभी न ! 

भीतर झरना प्रेम का

अप्रैल २००७ 
प्रकृति और पुरुष ये दो तत्व हैं. आत्मा यानि पुरुष और देह, मन, बुद्धि, चित, अहंकार ये सब प्रकृति है. क्रोध, लोभ, मोह, मद, मान आदि सूक्ष्मतर प्रकृति है. माया हमें प्रकृति में ही घुमाती रहती है, आत्मा से मिलने की फुर्सत ही नहीं देती. जीवन में यदि विश्राम आ जाये तो माया को पार करने का उपाय आ जाता है. विश्राम आता है निष्काम होने में. सहज, स्वाभाविक आत्मनिवेदन के बाद ही निष्कामता आती है. अपने गुण तथा अवगुण दोनों को समर्पित करके स्वय खाली हो जाना ही आत्मनिवेदन है. जितना-जितना हम भीतर से खाली होते जाते हैं उतने-उतने अहंकार से मुक्त होते जाते हैं. माया तभी तक वार करती है जब तक अहम है, हम जब तक हम हैं. जब कुछ भी नहीं बचा तो केवल आत्मा ही रह जाती है जो स्वयं शून्य है. वह अनंत है, सत्य है, प्रेम है, शांति है. उसी आत्मा को जो सर्वगुण सम्पन्न है, कृष्ण का नाम दे दिया गया. जिसका रूप अनुपम है, मधुर है वह कृष्ण आत्मा रूप में हरेक के हृदय में विराजमान है. वही इस सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है, वही वेदान्तियों का ब्रह्म है तथा उसी की शक्ति यह प्रकृति है. 

Wednesday, October 29, 2014

बलिहारी गुरू आपने

अप्रैल २००७ 
सद्गुरु में ज्ञान की सुगंध होती है जो हमें अपनी ओर खींचती है. उसमें प्रेम की आध्यात्मिक सुरभि होती है जो हमें आकर्षित करती है. एक पवित्र गंध ईश्वर की याद का साधन होती है. जो रब की याद दिलाये उसका विश्वास कराए, जिसे देखकर सिर अपने आप झुक जाये. वही तो सद्गुरु होता है. सद्गुरु हमें अनंत की ओर ले जाता है, वह सारी सीमाएं तोड़कर असीम को जानने का, उसे पाने का निमन्त्रण देता है ! तन पवित्र हो, स्वच्छ हो, स्वस्थ हो, मन निर्द्वन्द्व  हो, निर्भार हो तभी आत्मा अपने पूर्ण रूप में भीतर प्रकट होती है. आत्मा का स्वभाव है आनंद, प्रसन्नता और प्रेम ! वह शांति की सुगंध समोए है जो रह रहकर रिसती है, पर जब न तो तन के स्वास्थ्य का ध्यान हो न मन सजदे में झुका हो तो आत्मा भीतर कैद ही रह जाती है और हम जीवन भर दुर्गन्ध का शिकार होते रहते हैं. ईर्ष्या से जलता हुआ, क्रोध और अहंकार से ग्रसित मन सिवाय दुर्गन्ध के क्या दे सकता है, भीतर यदि प्रेम होगा तो वह प्रकटे बिना रह ही सकता.. कितना सरल है और कितना सहज है उस प्रेम को पाना जो हमारा निज का स्वभाव है. 

Tuesday, October 28, 2014

बुरा जो देखन मैं चला

अप्रैल २००७
संत कहते हैं यह जग कितना सुंदर है ! हमें यदि यह सुंदर नहीं लगता तो हमारी नजर में ही दोष है. हम अन्यों में दोष देखना जब तक बंद नहीं करते, जगत हमें असुन्दर ही लगेगा. ज्ञानी सभी को शुद्ध आत्मा ही देखते हैं, तो कमियां अपने आप छिटक जाती हैं. हम जब कमियां देखते हैं तो हमारे मन में भी उस कमी का भाव दृढ हो जाता है. हम न चाहते हुए भी उनके साथ तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं. यह जगत जैसा है, वैसा है हमें चाहिए कि हो सके तो किसी की सहायता कर दें, न हो सके तो अपने हृदय को खाली रखें, उनमें संसार की कमियां तो न ही भरें. इस नाशवान स्वप्नवत् संसार के पीछे छिपे तत्व को पहचानें और उसी पर अपनी नजर रखें. 

Monday, October 27, 2014

बल, बुद्धि, विद्या देहूं


हम हनुमान जी से बल, बुद्धि व विद्या का वर मांगते हैं किन्तु यदि बुद्धि में धैर्य न हो, बल के साथ विवेक न हो और विद्या में नम्रता न हो तो यही वरदान शाप भी बन सकते हैं. मन तो शिशु के समान है और बुद्धि उसकी बड़ी बहन, पर दोनों का आधार तो आत्मा है. आत्मा यदि स्वस्थ हो, सबल हो, सजग हो तो अधैर्य, अविवेक और उद्दंडता के साथ तादात्म्य नहीं करेगी. वह अपनी गरिमा में रहेगी. 

Sunday, October 26, 2014

मन पर न छा जाये बदली


संत कहते हैं, साधक को आत्मालोचन करना है, शास्त्रों के सिद्धांत को उसे व्यवहार में लाना है. अहिंसा को मनसा, वाचा, कर्मणा में अपनाना है. उसे संग्रह की भी एक सीमा बाँधनी है. उसे अपनी शक्तियों को पहचानना ही नहीं उन्हें व्यर्थ जाने से भी रोकना है. जब मन पल भर के लिए भी प्रमादी होता है तो उस शक्ति से वंचित हो जाता है और जब हम इस शक्ति पर कोई ध्यान नहीं देते तो देखते हैं, भीतर एक रिक्तता भर गयी है. चेतना का सूर्य जगमगाता रहे इसके लिए प्रमाद के बादलों को बढ़ने से रोकना होगा. तंद्रा के धूँए से बचना होगा. हमारा जीवन थोड़ा सा ही शेष बचा है. हर व्यक्ति जन्मते ही मृत्यु का परवाना साथ लेकर आता है. कुछ वर्षों का उसका जीवन यदि किसी अच्छे कार्य में लगता है तो ईश्वर के प्रति उसकी धन्यता प्रकट होती है. संतजन कितनी सुंदर राह पर चलने को प्रेरित करते हैं. हम भटक न जाएँ इसलिए वे भीतर से कचोटते भी रहते हैं. कई बार हम मंजिल के करीब आ-आकर फिर भटक जाते हैं.