जीवन कितने ही रूपों में हमारे सम्मुख आता है. कभी शांत तो कभी रौद्र, कभी सरल तो कभी कठिन. हम उसे किस रूप में ग्रहण करते हैं यह हम पर निर्भर है. जीवन में यदि सब कुछ ठीक चल रहा हो तो हम अपनी ऊर्जा को व्यर्थ ही इधर-उधर के कामों में लगा देते हैं. यदि कोई विपदा आती है तो हम सजग हो जाते हैं और अपना सारा समय और ऊर्जा उस दुःख से बाहर निकलने में लगाते हैं. उस समय जीवन में एक लक्ष्य होता है जीवन धारा एक ओर ही बहती है. आज पूरे विश्व के आगे एक समस्या है, सरकारें सजगतापूर्वक अपने-अपने देशवासियों के लिए नए-नए प्रोजेक्ट आरंभ कर रही हैं. लोग स्वास्थ्य के प्रति सजग हो रहे हैं. धन की दौड़ में जो अपने गांव छोड़कर चले गए थे वे घर लौट रहे हैं. परिवार का जो महत्व खोता जा रहा था, अब वापस स्थापित हो रहा है. दुःख की घड़ी में सब एक हो जाते हैं, शायद इसीलिए प्रकृति कभी-कभी क्रुद्ध होती है. मानव अपने पर्यावरण से जुड़े, लोग आपस में जुड़ें, सभी को अपने कर्त्तव्य पालन का बोध हो, इसका भान कराने के लिए ही महामारी जैसी विपदाएं समय-समय पर युगों से आती हैं. जो समर्थ हैं उन्हें सेवा का अवसर मिले और जो संकट ग्रस्त हैं उन्हें अपनी आंतरिक शक्तियों का भान हो. समाज आपस में जुड़े और अकर्मण्यता का जो दानव मानवता को ग्रस रहा था उसका नाश हो. जीवन में एक गहरा परिवर्तन हो, माता-पिता और बच्चों में संवाद हो, पीढ़ियों का अंतर घटे, भोजन में शुद्धता का ध्यान रखा जाये. स्वच्छता का मानदण्ड बढ़े, ये सारे छोटे-छोटे पर महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं जो आज किसी न किसी रूप में प्राप्त हो रहे हैं.
Saturday, May 23, 2020
Friday, May 22, 2020
बीज ध्यान का बोया जिसने
ध्यान एक बीज के रूप में हमारे भीतर प्रकृति द्वारा प्रदान किया जाता है. जन्म के साथ ही शिशु को यह उपहार मिलता है, इसमें वह संभावनाएं छुपी होती हैं जिन्हें वह भविष्य में प्राप्त कर सकता है. इस बीज को जब मन की भूमि में बोया जाता है, इसे श्रद्धा का जल मिलता है और विश्वास की धूप तो यह अंकुरित होने लगता है. धीरे-धीरे यह पौधे से वृक्ष बनता है एक दिन इस पर प्रेम और भक्ति के पुष्प लगते हैं, जिनकी सुवास से मन का कोना-कोना भर जाता है. ध्यान का यह बीज अनेकों के जीवन में बिना अंकुरित हुए ही रह जाता है, तब जीवन रूखा-सूखा ही रहता है. हो सकता है ऐसे लोग बुद्धि के द्वारा श्रेष्ठ पदों को प्राप्त कर लें पर उनके अंतर में बसंत नहीं आता, बाहर से उसे लाने के उपाय करने पड़ते हैं. जीवन में कृत-कृत्यता का अनुभव नहीं होता, वह सन्तोष नहीं आता जिसे पाकर सब धन फीके लगते हैं. गुरुजन ध्यान की इतनी महिमा इसीलिए करते हैं, इसके नियमित अभ्यास से हमारे भीतर के द्वार खुलने लगते हैं, एक गहन शांति और स्थिरता का अनुभव मन को होता है. इस अनिश्चतता भरे वातावरण में यदि मन सदा डांवाडोल होता रहे तो मानव को चैन कैसे मिल सकता है. इसलिए क्यों न आज से ही हम ध्यान को हम अपने जीवन का एक हिस्सा बनाएं.
Thursday, May 21, 2020
जीने की जो कला सीख ले
जीवन एक अवसर है, प्रकृति की तरफ से मिला एक उपहार है, वही प्रकृति कभी-कभी अपना रौद्र रूप दिखाती है और लगता है जीवन समाप्त हो रहा है. कोविड का कहर क्या कम था जो अम्फन नामक भीषण समुद्री तूफान उड़ीसा व पश्चिम बंगाल में तबाही मचाने आ गया. तेज वर्षा और तेज हवाओं के कारण जान-माल का कितना नुकसान हुआ इसका पता तो बाद में चलेगा. अभी जो तस्वीरें देखने को मिल रही हैं उससे ज्ञात होता है तूफान का काफी असर हुआ है. उड़ीसा में लगभग हर साल ही तूफान आते हैं, वहाँ लोगों का मनोबल इनकी वजह से घटता नहीं है. तूफ़ान के बाद गुलाबी आकाश की तस्वीरें इसकी गवाही देती हैं. जीवन का क्रम फिर पहले की तरह चलने लगता है. वास्तव में मानव इस विशाल आयोजन में एक छोटा सा पुर्जा ही तो है, उसे अपने अस्तित्त्व के लिए हजारों वर्षों से कितना संघर्ष करना पड़ा है. यह बात और है कि इस संघर्ष में वह अपने आप से ही दूर होता चला गया है, वह जीना तो चाहता है पर जीने की कला भूल गया है. साहित्य, कला, संगीत, दर्शन जैसे विषयों को आज का युवा पढ़ना नहीं चाहता, वह तो अधिक से अधिक धन कमाने के लिए वाणिज्य और विज्ञान ही पढ़ना चाहता है. इसका प्रभाव यह हुआ है कि उसकी बुद्धि प्रखर हो गयी है पर भावना विकसित नहीं हुई है. भावनात्मक रूप से जो प्रबल है वही किसी भी संकट में अपना धैर्य बनाये रख सकता है.
Wednesday, May 20, 2020
सदा जानने को उत्सुक जो
मानव सुख का आकांक्षी है, किंतु ऐसा सुख वह नहीं चाहता जो बिना किसी श्रम के उसे उपलब्ध हो जाये. वह अपने सुख का निर्माण भी स्वयं ही करना चाहता है. छोटा बच्चा पालने में आराम से पड़ा है, पर वह स्थिर नहीं बैठता, जितना हो सके हाथ-पैर हिलाता है, यदि ऊपर कोई खिलौना लटका हुआ है, उसे पकड़ना चाहता है. कुछ पाने की उसकी दौड़ पालने से ही आरंभ हो जाती है. करवट बदलना आते ही वह बैठना शुरू कर देता है और चलना सीखते ही जल्दी भागने भी लगता है. मानव के भीतर जो चेतना है वह अग्नि की भांति ऊपर ही ऊपर जाना चाहती है. कुछ वैज्ञानिक अंतरिक्ष का रहस्य खोजने में लगे हैं और कई सागर की अतल गहराइयों का. हमारे ऋषि भी एक वैज्ञानिक की भांति वर्षों तक प्रयोग करते थे, उन्होंने भी कई खोजें की, साथ ही वे उस चेतना को भी जानना चाहते थे जो सदा ही उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती थी. यही खोज भारत को अन्य राष्ट्रों से अलग करती है. जो हमें चैन से बैठने नहीं देता आखिर भीतर वह क्या है? कौन विचारता है ? कौन चाहता है ? कौन कर्म के लिए प्रेरित करता है ? इन प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए ही सम्भवतः अध्यात्म शास्त्र की रचना हुई होगी.
Friday, May 15, 2020
स्वयं को जिसने जान लिया है
अध्यात्म का अर्थ है आत्मा का अध्ययन, आत्मा यानि अपने भीतर की शुद्ध चेतना का अध्ययन. हम देह को जानते हैं, उसकी देख-रेख करते हैं, व्यायाम करके उसे स्वस्थ रखने का प्रयास करते हैं, सन्तुलित भोजन ग्रहण करके दीर्घ आयु पाना चाहते हैं. मन से सोच-विचार करते हैं, संकल्प उठाते हैं, उन्हें पूरा करने का प्रयत्न करते हैं, मन जब थक जाता है, उसका रंजन करने के लिए पुस्तकें पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं और घूमने जाते हैं. बुद्धि के द्वारा धन और यश कमाते हैं, बुद्धि हमें सदा लाभ की तरफ ले जाती है, सदा यही समझाती है कि जितना हो सके संग्रह करें जितना हो सके संबंध बनाएँ ताकि हम सुरक्षित हो सकें. अपनी सुरक्षा के लिए हम जीवन भर प्रयत्नशील रहते हैं क्योंकि हम स्वयं को मरणशील देह ही मानते हैं, जिसे बनाये रखने के लिए धन चाहिए. इस मन-कायिक अस्तित्त्व को ही हम अपना स्वरूप जानते हैं. ‘मै कहकर हम इसे ही प्रस्तुत करते हैं, समाज इसका एक नाम देता है, हम उस नाम को ही अपना परिचय मानकर सन्तुष्ट हो जाते हैं. यदि कभी किसी शास्त्र या सन्त के वचन हमें सुनने को मिलते हैं तो ज्ञात होता है, जो हम स्वयं को मानते हैं वह हैं ही नहीं, हम तो इस देह-मन के पीछे स्थित वह चेतना हैं, जिसे न दीर्घायु के लिए प्रयत्न करना है क्यों कि वह अजर है और न ही रंजन करने के लिए उसे कुछ चाहिए क्योंकि वह स्वयं आनंद स्वरूप है. अध्यात्म इसी चेतना से जुड़ने का नाम है.
Thursday, May 14, 2020
चकित हुआ जो मन देखेगा
शिव सूत्र में शिव कहते हैं विस्मय योग की भूमिका है. योग में स्थित होने का अर्थ है समता में टिक जाना, जीवन में गहन सन्तुष्टि का अनुभव करना अथवा कृतकृत्य हो जाना. विस्मय से योग की इस यात्रा का आरंभ होता है. जब आकाश में स्थित अरबों तारों को देखकर मन चकित रह जाता है, सागर की गहराई में स्थित अनोखे प्राणी संसार को देखकर आश्चर्य होता है तो कुछ पलों के लिए मन ठहर जाता है. एक बच्चे के लिए सारा जगत ही विस्मय का कारण है इसीलिए वह आनंद से भरा होता है. सुबह का उगता हुआ सूरज, फूलों पर मंडराती तितलियाँ, जुगनुओं का टिमटिमाना उसके लिए विस्मयकारी हैं, पर जैसे -जैसे वह बड़ा होने लगता है किताबों में उनके बारे में पढ़कर उसे वे सब बातें सामान्य ही प्रतीत होती हैं. विज्ञान ने सब प्रश्नों के उत्तर खोज लिए हैं, किन्तु अभी भी प्रकृति के अनेक रहस्यों से वह पर्दा नहीं उठा पाया है. एक छोटा सा वायरस ही उसकी प्रतिष्ठा को धूल-धूसरित करने के लिए काफी है.
Wednesday, May 13, 2020
जो गुरुवाणी पर करे मनन
भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं संशय आत्मा विनश्यति, अर्थात जिस व्यक्ति में संशय करना उसका स्वभाव ही बन गया है वह कभी सुख को उपलब्ध नहीं हो सकता. संसार विश्वास पर चलता है, उसके बिना जीवन में एक ठहराव आ जाता है. संशय बुद्धि करती है और श्रद्धा भावना का क्षेत्र है. अपने-अपने स्थान पर जीवन में दोनों की आवश्यकता है. यदि भीतर श्रद्धा और संशय ऊपर-ऊपर है तो व्यक्ति किसी दिन ज्ञान को उपलब्ध हो सकता है. श्रद्धा के बिना केवल संशय करना अपने जीवन को आगे बढ़ने से रोकना ही है. श्रद्धावान को ही ज्ञान मिलता है, ऐसा ज्ञान जिसके आने से भीतर शांति का अनुभव होता है. ठहरी हुई झील में भी कुछ तरंगें होती हैं पर ज्ञान की उपलब्धि से ऐसी चिर शांति भीतर उत्पन्न हो जाती है जो कभी नष्ट नहीं होती.
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