Sunday, December 29, 2013

कण कण ऊर्जा हो सार्थक

जून २००५ 
इच्छाओं को पूरा करने के प्रयास में हम अपनी सहज आवश्यकता को भी भुला बैठते हैं. इस जगत में अपने चारों ओर लोगों को वस्तुओं का गुलाम बनकर दुखी होते हुए देखते हैं तथा कुछ सजग व्यक्तियों को अकिंचन होकर भी प्रसन्न देखते हैं. वास्तविकता को भूले हुए लोग अपनी आवश्यकता से अधिक सामान इकट्ठा करते रहते हैं, फिर उसकी साज-सम्भार में अपनी ऊर्जा को व्यर्थ गंवाते हैं. हमारी ऊर्जा का उपयोग स्वयं को तथा स्वयं के इर्दगिर्द का वातावरण संवारने में होता रहे तभी उसकी सार्थकता है. 

Saturday, December 28, 2013

सकल पदार्थ हैं जग माहीं

जून २००५ 
परमात्मा प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होने वाली इच्छा है, पर संसार प्राप्ति की इच्छा कभी पूर्ण नहीं हो सकती. आवश्यकता तथा इच्छा में भी अंतर है, इच्छाओं का कोई अंत नहीं पर आवश्कताएं सीमित हैं. आवश्यकता की पूर्ति होती है, उसकी निवृत्ति विचार द्वारा नहीं हो सकती पर इच्छा की निवृत्ति हो सकती है. ईश्वर प्राप्ति की इच्छा वास्तव में हमारी आवश्यकता है, हर जीव आनंद चाहता है, क्योंकि वह ईश्वर का अंश है, उसमें अपने अंशी से मिलने की जो स्वाभाविक चाह है, वह उसकी नितांत आवश्यकता है. जैसे भूख, प्यास आदि आवश्यकताओं की पूर्ति भोजन, जल आदि से हम करते हैं, वैसे ही ईश्वर प्राप्ति के बाद ही हमारी आनन्द की आवश्यकता की पूर्ति होती है. 

Friday, December 27, 2013

सत्यं परम धीमही

जून २००५ 
हमारा भीतर जब तक बिगड़ा है, बाहर भी बिगड़ा रहेगा. झुंझलाहट, अहंकार, कठोर वाणी, अवमानना तथा प्रमाद ये सारे अवगुण बाहर दिखाई देते हैं पर इनका स्रोत भीतर है, भीतर का रस सूख गया है, सत्संग का पानी डालने से भक्ति की बेल हरी-भरी होगी फिर रसीले फल लगेंगे ही. संसार का चिन्तन अधिक होगा तो उसी के अनुपात में तीन ताप भी अधिक जलाएंगे. प्रभु का चिन्तन होगा तो माधुर्य, संतोष, ऐश्वर्य तथा आत्मिक सौन्दर्य रूपी फूल खिलेंगे. कितना सीधा-सीधा हिसाब है. अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष तथा अभिनिवेश आदि क्लेश हमें सताते हैं. आत्मज्ञान न होना, अहंकार, मृत्यु से भय तथा मोह इन्हीं के कारण हैं. बुद्धि जब तक सात्विक नहीं होगी, दृढ निश्चय वाली नहीं होगी तब तक इनके शिकार हम होते ही रहेंगे. ईश्वर से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारी बुद्धि को प्रकाशित करे.

Thursday, December 26, 2013

जामे दो न समाए

मई २००५ 
‘प्रेम गली अति सांकरी जामे दो न समाए’ जीवन में यदि द्वंद्व है तो दुःख रहेगा ही. द्वैत के शिकार होते ही मन द्वेष करता है, थोड़ी सी भी निषेधात्मकता अथवा आग्रह उसे समता की स्थिति से डिगा देता है. यह तलवार की धार पर चलने जैसा है. भीतर जब एक धारा बहेगी, समरसता की धारा तब शांति तथा आनन्द फूल की खुशबू की तरह अस्तित्व को समो लेंगे. आकाश से बहती जलधार जब धरा को सराबोर करती है तो उसका कण-कण भीग जाता है, इसी तरह भीतर जब समता का अमृत स्रोत खुल जाता है तो प्रेम व आनन्द की धारा बहती है. मन का ठहराव ही आत्मा की जागृति है. आत्मा में स्थित होकर जीने का ढंग यदि सध जाये तो कुछ अप्राप्य नहीं है. 

Wednesday, December 25, 2013

हर राह उसी तक लाती है

मई २००५ 
“पहाड़ के नीचे की घास बनकर रहो, आंगन में उगा चमेली का वृक्ष बन कर रहो, मुसीबत आने पर पत्थर की चट्टान बन कर रहो और दीन-दुखियों के लिए शक्कर और गुड़ बन कर रहो”

एक महान कन्नड़ सन्त की सूक्तियां हैं ये. पहाड़ के नीचे की घास का अर्थ है अहंकार रहित होकर जीना, अहंकार युक्त मन ही प्रभु से दूर ले जाता है. चमेली का बिरवा अपने घर के साथ-साथ बाहर भी सुगंध फैलाता है. मन हमें उससे दूर ले जाता है जब हम अपने सुख में किसी अन्य को शामिल नहीं करते. मन यदि स्वार्थी है तो ही भीरु भी है, निडर, संवेदनशील मन जो दया से भरा हो किसी भी परिस्थिति में समता बनाये रह सकता है. जितना सम्भव हो सके स्वयं को सबके लिए उपलब्ध करा सकें तो जीवन अपने आप ही मधुर हो जायेगा, जो स्वयं के लिए गुड़ है वही तो अन्यों के लिए भी हो सकता है. परमात्मा की राह पर चलने वाले साधक को तो इतना सजग रहना ही होगा.

Tuesday, December 24, 2013

राम रतन धन पायो

मई २००५ 
सोना तप कर ही कुंदन होता है, हम भी इस जगत में तपने आये हैं, हम सब का जीवन कुंदन सा चमके अर्थात सब का मंगल हो यही भावना होनी चाहिए. जगत पदार्थ से बना है, हम अपदार्थ हैं, पदार्थ की अवस्थाएं बदलती रहती हैं, पर अपदार्थ सदा एक सा रहता है, हम वही अबदल अविकारी तत्व हैं, हमारा नाश नहीं होता हममें परिवर्तन नहीं होता, पर हम स्वयं को मन, बुद्धि, अहंकार आदि पदार्थों के साथ एक करके देखते हैं, तपकर उन्हें अलग करना है और स्वयं को अपने शुद्ध रूप में पहचान लेना है. ऐसा होते ही भीतर कैसी शांति जगती है, कण-कण प्रेम से भर जाता है. पूर्णता का अनुभव होता है, भीतर कोई अभाव नहीं रहता. यह पूर्णता मौन को जन्म देती है. मन भी चुप हो जाता है, मन का मौन ही आत्मा का जन्म है. उसे एक बार पा लेने के बाद कभी विस्मरण नहीं होता, वह ऐसा रत्न है जो एक बार मिल जाये तो साथ नहीं छोड़ता. वास्तव में तो वह सदा ही मिला हुआ है, पर उसकी चमक खो गयी है, साधना की अग्नि में तप कर उसे पुनः प्रकाशित करना है. 

तीनों के जो पार हुआ

मई २००५ 
स्थूल शरीर पांच तत्वों से बना है, सूक्ष्म शरीर अठारह तत्वों से बना है, पांच कर्मेन्द्रियाँ, पांच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पांच प्राण, मन, बुद्धि व अहंकार. कारण शरीर हमारी समस्त वासनाओं, कामनाओं तथा आकांक्षाओं से निर्मित है. मृत्यु के बाद स्थूल शरीर का नाश हो जाता है पर सूक्ष्म शरीर बना रहता है. यह तीनों शरीर तीन अवस्थाओं का बोध कराते हैं, जागृत अवस्था में स्थूल शरीर, स्वप्न अवस्था में सूक्ष्म शरीर तथा गहरी नींद की अवस्था में कारण शरीर सक्रिय रहता है. चौथी अवस्था में जाने के लिए इन तीनों के पार जाना होता है. हमारे शरीर के पांच कोष भी इन्हीं तीनों शरीरों में बद्ध हैं. जब तक एक भी इच्छा शेष है, तब तक हमें पुनः-पुनः जन्म लेना पड़ेगा. जब ज्ञान के द्वारा सभी वासनाओं का क्षय हो जायेगा, या भक्ति के द्वारा वे सभी दिव्य हो जाएँगी तभी हमें मुक्ति का अनुभव होगा. साधना के पथ पर चलते हुए जब भीतर विश्वास जगता है तब यह कार्य उतना ही सहज हो जाता है जितना पलक झपकाना. ईश्वर हमारे निकटस्थ है. वह सहज प्राप्य है.