Saturday, May 31, 2014

चिरकाल से नाता जिससे

अप्रैल २००६ 
परमात्मा सर्व समर्थ है फिर भी जब हम उसे प्रेम करते हैं वह हमारा सखा बनता है. हमें करना ही क्या है ? मात्र उससे प्रेम ही तो ! और निर्भार हो जाना है, हमारे उर में जो शांति बन छा जाता है, प्रेम का दरिया बनकर बहने लगता है ! हमारे भीतर का अंधकार दूर कर देता है. मन में सूक्ष्म वासनाएं छिपी हुई हैं, हम जब उसके सम्मुख होते हैं तो कुछ देर के लिए लगता है जैसे अंतःकरण पूर्ण निर्मल हो गया है पर पुनः पुनः संसार का आकर्षण हमें अपनी ओर खींच लेता है, तभी तो बार-बार प्रार्थना की आवश्यकता है, बार-बार शुभ संकल्पों की जरूरत है. बार-बार सन्त दर्शन की आवश्यकता है. जीवन में तभी प्रेम का उदय होगा. जैसे एक-एक बूंद को सहेजकर तालाब बनता है वैसे ही एक–एक क्षण हमें उसकी स्मृति भीतर भरनी है, ताकि वह सदा हमारे द्वारा पूजित होता रहे, सदा हमारी आराधना का केंद्र रहे. उसका नाम हमारे रोम-रोम में समाँ जाये. उसका प्रेम हमारे माध्यम से प्रकट होने लगे. 

पार जाना है भव सागर के

अप्रैल २००६ 
गुण, प्रकृति, काल, कर्म, जगत से परे हमें अपने जीवन को पवित्र बनाना है. भोर में उठकर पहला विचार मांगलिक हो, रात्रि में सोने से पूर्व स्थित हो सहज हो सोएँ. इस जगत में जहाँ हर क्षण सब कुछ बदल रहा है, जहाँ हमें कितने प्रभावों का सामना करना पड़ता है. कभी-कभी शोक के क्षण जो बना माँगे ही हमें मिलते रहते हैं क्या वे पूर्व कृत्यों का फल नहीं हैं ? हमारी प्रकृति कैसी है, सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक, इस पर भी कर्म निर्भर करते हैं, जिस गुण की प्रधानता हो वैसा ही स्वभाव हम धर लेते हैं, जिस वातावरण में हम रहते हैं पूर्व संस्कारों के अनुसार वही भाव दशा हमारे मन की हो जाती है. लेकिन हमें इन सारे प्रभावों से पार जाना है, अपने स्वभाव में लौटना है. प्रेम करना हमारा स्वभाव है, आनन्द हमारा स्वभाव है ! जब हमें किसी वस्तु का अभाव खटके तो भी हम स्वभाव से हट गये हैं. स्वभाव में तो पूर्णता है, वहाँ कोई कमी है ही नहीं. तो हमें प्रतिपल इस बात का ध्यान रखना होगा, कि अंतःकरण कैसा है, हम स्वभाव में हैं या नहीं, सुख तब कहीं खोजना नहीं पड़ेगा, परमात्मा स्वयं उसे लेकर आएगा.

Friday, May 30, 2014

शुभता का ही वरण करे जो

मार्च २००६ 
शुभ कर्म को आरम्भ करना ही सबसे कठिन है, एक बार जब साधक शुभ पथ पर चलना आरम्भ कर देता है तब सारी सृष्टि उसकी सहायक हो जाती है. किन्तु हम आरम्भ को ही टालते रहते हैं. सत्संग सुनते समय कितने ही शुभ विचार भीतर उपजते हैं पर वे कार्यान्वित नहीं हो पाते, प्रभु मन को जानते हैं और समय आने पर अनुकूल परिस्थिति भी ला देते हैं यदि हम उसे अनदेखा न कर दें. यूँ भी साधक के पास परमात्मा से चाहने के लिए एक ही वस्तु है, उसे प्रेम करना तथा उसका प्रेम पाना. जब तक कोई उस पावन प्रेम से वंचित है तभी तक जगत की दौड़ है, वह प्रेम भीतर उपजा तो सारे में छा जाता है, फिर जीवन में सहज ही शुभ घटता है. सही रूप से सेवा का भाव जगता है. मन सारे अभावों से मुक्त हो जाता है और सारे प्रभावों से भी..अपने स्वभाव में टिक जाता है.


Thursday, May 29, 2014

जो टिका ज्ञान में वही चलेगा

मार्च २००६ 
जब हम बाहर काम करने के लिए निकलते हैं तो इस बात का अनुभव होता है कि किसी भी संस्था में सभी व्यक्ति काम के लिए नहीं होते, कुछ तो केवल शोभा के लिए होते हैं, काम करने वाले तो कम ही होते हैं, लेकिन वे दो-चार लोग ही पर्याप्त होते हैं. एक भी यदि चलना शुरू कर दे बिना इस बात की चिंता किये की कोई पीछे आ रहा है या नहीं, तो उतना ही पर्याप्त होगा. लक्ष्य यदि उच्च हो तो साधनों की कमी नहीं रहती प्रकृति भी सहायक हो जाती है. हम कई बार लोकमत के डर से आगे नहीं बढ़ते, कई अच्छे विचार मन में ही रह जाते हैं, शंकाग्रस्त हो जाते हैं. हम अपने भीतर का प्रेम व्यक्त नहीं करते इस डर से कि कहीं गलत न समझ लिए जाएँ. यह सब तभी तक होता है जब तक हमें अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं हुआ. ज्ञानी को कोई डर नहीं होता, उसकी निडरता में चेतनता है, वह सभी का सम्मान करते हुए अपना कार्य करता जाता है. वह सहज होकर भीतर-बाहर एक सा व्यवहार करता है. ज्ञानी को कहीं जाना नहीं है, उसे कुछ करना नहीं है, कुछ पाना नहीं, वह कृत-कृत्य हो चुका है. ऐसा व्यक्ति ही सही मायनों में लोकसंग्रह कर सकता है. क्यों कि उसे न मान की इच्छा है न अपमान का भय है. ऐसे ही ज्ञान में सन्त हमें ले जाना चाहते हैं, सत्संग, साधना और सेवा की त्रिपुटी के माध्यम से.


Wednesday, May 28, 2014

तेरे हाथों सौंप दिया सब

मार्च २००६ 
जितना-जितना हम उस परम सत्ता के करीब होते जाते हैं, उससे घनिष्ठ नाता जोड़ते जाते हैं, जो सत्ता कण-कण में व्याप्त है. हम देह की सीमाओं से पार होते जाते हैं. कृत्य का अभिमान नहीं रहता. ज्यादा करने की चाह भी समाप्त हो जाती है. हमारे कर्म तब अपने आप होते प्रतीत होते हैं, वह परमात्मा जैसे हमें अपने हाथों में नचा रहा हो. हम निर्भार होकर जीने लगते हैं. पदार्थों के प्रति भाव भी बदल जाता है, पदार्थ हमारे उपयोग में आयें बस वहीं तक उनका महत्व है, वे हमारे अहंकार को बढ़ाएं तो उनका त्यागना ही उचित है. भीतर एक सहजता का जन्म होता है. यह कितना अद्भुत अनुभव है. एक अनोखी शांति और स्थिरता भीतर बनी रहती है. हम उस स्रोत से जुड़ जाते हैं जहाँ से आए हैं.

Monday, May 26, 2014

तेरी शरण में आये हैं हम

मार्च 2006
प्रार्थना में बहुत शक्ति है, पग-पग पर प्रार्थना हमें सहारा देती है. उसका स्मरण भीतर चलता रहे तो यह अपने आप में ध्यान का ही एक रूप है. हम उसे ही अपने अंतर की कथा-व्यथा सुना सकते हैं, वह दीखता नहीं पर उसकी हजार आँखें हैं, जैसे दरवाजे पर चिक लगी हो तो बाहर के लोग भीतर नहीं देख सकते पर भीतर से बाहर देखा जा सकता है, वैसे ही वह हमारे भीतर से सब कुछ देख रहा है पर हम ही उसे नहीं देख पाते. प्रार्थना में हमारा अहं गल जाता है. शरण में आने का सुख सारे सुखों से बड़ा है, उसमें कोई मिलावट नहीं, कोई दुःख भी नहीं. शुद्ध ज्ञान में स्थित होकर ही हम शरण में आते है, शरण का अर्थ है सत्य के प्रति समर्पित होना, जो सही है उसे ही चाहना, जो कल्याणकारी है उसकी ही कामना करना. तब कोई बोझ नहीं रहता, कोई डर भी नहीं सताता, भक्त को पूर्ण विश्वास होता है जिसकी शरण में वह आया है, वह सर्व-समर्थ है, उसे तब अपने सुख-दुःख की परवाह नहीं रह जाती, वह तो उसकी रजा में ही अपनी रजा मानता है.

Sunday, May 25, 2014

एकै साधे सब सधे

मार्च २००६ 
लक्ष्य निर्धारित हो तो कोई भी कार्य असम्भव नहीं है. उस की प्राप्ति में जो कुछ भी हमें करना पड़े, जो भी सहना पड़े वह सदा कल्याणकारी ही होगा, किन्तु लक्ष्य ऐसा हो जो हमें आगे बढ़ाए, उन्नति के पथ पर, विकास के पथ पर, जो सभी के लिए हितकर हो. प्रभु प्राप्ति का लक्ष्य तो सर्वोपरि है, शेष सारे छोटे-मोटे लक्ष्य इसी में समा जाते हैं. ‘स्वयं’ को जानने का लक्ष्य भी इसी दिशा में ले जाता है. आनंद की खोज भी इसी दिशा में उठाया कदम है. सेवा, साधना, सत्संग व स्वाध्याय इस यात्रा में गति भरते हैं.