Tuesday, June 12, 2012

सहज स्वभाव सहज ही मिलता


अप्रैल २००३ 

सहज स्वभाव हमारे जीवन की मांग है, धर्म इस मांग की पूर्ति करता है. सहज स्वभाव हमारे तीनों तापों को हर लेता है मन के संकल्पों-विकल्पों को हर लेता है, इच्छाओं को शुद्ध करता है, विचारों को ऊपर के केन्द्रों में स्थित करता है. भीतर सौम्य मन का जन्म होता है और ऐसे मन से जो वचन निकलता है उसमें पूरा बल होता है. स्वस्थ, सुखी व सम्मानित जीवन जीने का बल सहज स्वभाव ही देता है. हमें अपने नित्य स्वरूप से परिचित कराता है. यदि हम चेतन हैं तो जड़ के गुलाम क्यों हों, अनित्य की प्रवाह क्यों करें, नश्वर को क्यों चाहें, उस एक को पाकर हम अमूल्य बन जाते हैं, उसमें जो स्वतंत्रता है वही पाने योग्य है. जड़ वस्तुओं के गुलाम बन कर हम अपना मूल्य घटाते हैं. सारी प्रतिकूलताएं तभी तक हैं जब तक हम उससे दूर हैं. एक बार उसका पता मिलने पर हम आनंद के उस सागर में डूबते उतराते हैं, जहाँ प्रेम-भक्ति के सुख-सामर्थ्य के मोती-माणिक पड़े हैं, जो सहज ही हमारे हो जाते हैं. ईश्वर भी हमसे मिलने को उतना ही आतुर है जितना हम उससे मिलने को, हमारे एक कदम के जवाब में वह हजार कदम बढ़ाकर हमें थाम लेता है और एक बार थाम लिया तो फिर छोड़ता नहीं, सहज स्वभाव बन जाता है.

Monday, June 11, 2012

एक वही तो डोल रहा है


अप्रैल २००३ 
जहाँ-जहाँ मन जाये उसकी गहराई में उसी एक की सत्ता को देखने का अभ्यास करें, संत ऐसा कहते हैं. हृदय में द्वेष बुद्धि न रहे तो सारी समस्याओं का समाधान अपने–आप मिलता है, हम जो भी कर्म करते हैं उस का बीज हमारे मन में रह जाता है और समय आने पर कर्म के अनुसार फल हमें भोगना पड़ता है. यदि सभी के साथ हमारी भावना में समता होगी, उनके हित की कामना होगी, तो हमारा व्यवहार शुद्द होगा, और अंतर एक शुभ्र, निर्मल आकाश की तरह उस ज्योति स्वरूप आत्मा के प्रकाश की झलक दिखायेगा. यह सम्पूर्ण जगत उसी की लीला है, खेल है, जिसके हम पात्र हैं, हम खेल में इतना उलझ जाते हैं कि घर जाने की सुध ही नहीं रहती, ध्यान वह विश्रांति है जिसे पाने के लिये हम घर जाते हैं, जहाँ प्रेम का पाथेय लिये प्रभु हमारी प्रतीक्षा रत हैं, जैसे माँ बच्चे को स्वच्छ करती है वैसी ही वह मन, बुद्धि पर छाई धूल को साफ करते हैं, अब खेलते समय भी उसकी याद बनी रहती है, जब एक बार पूर्ण मिल जाये तो अपूर्ण कोई क्यों चाहेगा, गंगा सामने हो तो पोखर को क्यों ताकेगा, फिर खेल भी उसकी पूजा बन जाता है और उसका सान्निध्य हमें हर पल प्राप्त होने लगता है. 

Thursday, June 7, 2012

आग्रह भी बांधता है


अप्रैल २००३ 
कोई भी आग्रह, चाहे वह भक्ति साधना के लिये ही हो, हमें बांधता है, इच्छा मुक्त होने के साथ-साथ हमें आग्रह मुक्त भी होना है. सुबह समय पर उठने का क्रम कभी टूटना नहीं चाहिए लेकिन कभी ऐसा हो भी गया तो अपने सहज रूप को छोड़ना नहीं है क्योंकि ‘स्वयं’ तो इन सबसे परे है, वह सदा जागृत है, मुक्त है. छोटी से छोटी बात भी साधक को अटका न सके और बड़ी से बड़ी बात भी उसे बांध न सके. मन पानी की तरह बहता रहे, तभी निर्मल बना रहेगा नहीं तो काई जमते देर नहीं लगती. साधक को तो इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि उसके किसी कार्य से किसी को दुःख न हो, उसके हृदय की शीतलता ही दूसरों को मिले. उसे जगत में कुछ पाना शेष नहीं है. वह ईश्वर प्रेम के रूप में सर्वोपरि पहले ही पा चुका है तब साधना की इच्छा भी क्यों अटकाए.


Wednesday, June 6, 2012

लगन लगायी जिसने उससे


अप्रैल २००३ 
हमारे जीवन में प्रेम नित नवीन होता रहे, निरंतर उसमें वृद्धि हो, उसकी बन्दगी भी हम बढाते रहें, समर्पण को द्विगुणित करते चलें तो जीवन में अन्य कोई रह ही नहीं सकता सिवाय उस एक राम के जो रोम-रोम में बसता है. उस कृष्ण के जो हर क्षण हमें अपनी ओर आकर्षित करता है, उस जगन्माता के जो हमारा पोषण करती है, उस शिव के जो सदा हमारा कल्याण करता है, उस गणपति के जो हमारे जीवन से विघ्न-बाधाओं को हटाता है, और जब हमारा हृदय उस परमब्रह्म का घर हो जाता है तो हृदय से सारे चोर निकलते लगते हैं, मुक्ति का आनंद ही हमें भक्ति करने को प्रेरित करता  है. हम कृतज्ञता प्रकट करते हैं और अपनी आत्मा की झलक पाकर विस्मित भी हो जाते हैं, परम की सुंदरता अपरिमेय है, हमारा अंतर्मन भगवद्शक्ति का आश्रय लेकर सहज प्राप्त कर्त्तव्य निभाता है, कर्मों के बंधन नहीं बाँधते, पुराने संस्कार नष्ट हुए लगते है. शांति का एक आवरण हमारे चारों ओर छाने लगता है, जिसको भेद कर संसार का कोई दुःख हमें छू नहीं सकता उस परम प्रिय का प्रेम एक कवच बन कर हमारे साथ रहता है.  


Tuesday, June 5, 2012

मानव ही मिल सकता उससे


अप्रैल २००३ 
हमारा जीवन उसकी कृपा से ही हमारी मुक्ति का साधन बनता है. पहला कदम तो हमने यही उठा लिया जब मानव जन्म मिला, दूसरा उसकी कृपा को अनुभव करना है. कृपा मिली तो तीसरा कदम है उसको जाने की इच्छा का होना, उस एक इच्छा ने अन्य सभी छोटी कामनाओं को अपने में समेट लिया क्यों कि उस एक को पाने से सब कुछ अपने आप मिल जाता है. उस एक को पाने के लिये जब हम एक कदम बढाते हैं तो वह हजार कदमों से हमारी ओर बढ़ता है. वह कैसे हरेक के हृदय में रहकर उसे निर्देशित करता है यह तो वही जाने पर वह करता जरूर है, उसे पुकारो तो वह तत्क्षण हाजिर होता है और अपने को जनाता भी है. उससे आध्यात्मिक सम्बन्ध बनाना है, देह बुद्धि से स्वयं को मुक्त करके आत्म बुद्धि की ओर ले जाना है.


Monday, June 4, 2012

सत्य महाप्रकाश है


अप्रैल २००३ 
सत्य हमारे जीवन में प्रकाश बनकर आता है और हम जो अंधकार में भटकते-भटकते अपने कारण लहुलुहान हो रहे थे, वस्तुओं को स्पष्ट देखने लगते हैं. वर्षों-वर्षों से जो जंगल हमने अपने मन में उगा रखा था, मन जो खंडहर सा बन गया था जहाँ सूर्य की रौशनी भी नहीं पहुँच पाती थी एकाएक चमकने लगता है और हमें उस जंगल को साफ कर उपवन उगाने का बल मिलता है. जहाँ सूनापन  था वहाँ उस परम को आसीन करने का सम्बल मिलता है जीवन तब मधुर संगीत बन जाता है. तब शास्त्रों के रहस्य ऐसे खुलने लगते हैं जैसे हथेली पर रखा हुआ फल हो. ऐसा सत्य का प्रकाश सदगुरु के पदार्पण से शीघ्र मिलता है, वरना जन्मों तक हम उसकी तलाश में भटकते रहते हैं.

Friday, June 1, 2012

परम लक्ष्य को पाना है


अप्रैल २००३ 
समय मन के सापेक्ष है, जब हम स्वयं को छोटे मन के साथ एक मानते हैं तब समय काटे नहीं कटता और जब विशाल मन अर्थात आत्मा में स्थित हों तो समय उड़ने लगता है तब हमें भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान ही नहीं रहता. हमारे जीवन में युक्ति, भक्ति, शक्ति और मुक्ति क्रमशः आती है. पहले युक्ति से जीवन को उन्नत बनाना, फिर भक्ति का उदय, भक्ति से ही शक्ति मिलती है, जिससे मन धीरे-धीरे संसार का अवलम्बन छोड़ता जाता है, मुक्ति तो परम लक्ष्य है वही विशाल मन है. जीवन में ध्यान, समाधि, मौन हो तो मनः प्रसाद मिलता है, सौम्यता जीवन में झलकती है. आत्मविद्या जब तक नहीं मिली तब तक हम विद्यार्थी हैं.