“लोकोआनंदः समाधिसुखं” जगत का सारा सुख समाधि
के सुख का ही अंश है, जहाँ कहीं भी हमें सुख मिलता है, वह उसी समाधि के सुख की झलक
मात्र है, हमारा मन पल भर को भी जहाँ ठहर जाता है, अनंत का सुख बरसने लगता है,
समाधि सुख कहीं बाहर से लाना नहीं है, वह तो भीतर ही है, बस उसे जगने का अवसर देना
है. समाधि में बैठा व्यक्ति वातावरण को भी सुख से भर रहा होता है. वह जो स्वयं
तृप्त है वही दूसरों की प्यास बुझा सकता है. सद्गुरु की कृपा यदि किसी के जीवन में
घटित हो जाये तो एक क्रांति उसके जीवन में होनी निश्चित है. वह तब सीमाओं से परे
चले जाता है, वर्तमान को प्राप्त होता है, क्षुद्रता को त्याग देने से अनंत की
शक्तियाँ उसकी सहयोगी बन जाती हैं, वह परम में विहार करने लगता है.
Saturday, August 10, 2013
Thursday, August 8, 2013
विस्मय से भर जाये मन यह
दिसम्बर २००४
विचित्र है यह जगत, अद्भुत है इसका सौन्दर्य, ऊपर नीला
विस्तीर्ण गगन, नीचे यह पावन माँ जैसी धरा, उस पर सूर्य रश्मियों से बिखरे हजारों
रंग, अनोखी ध्वनियाँ, और इन सबसे बढ़कर साधक के भीतर होने वाली अनुभूतियाँ...जिसकी
झलक जिसे मिलती है वह कृतज्ञता से भर जाता है. सारे कर्मों, सारे ज्ञान का जहाँ
अंत हो जाता है वहाँ उस प्रेम का उदय होता है, जहाँ उपास्य स्वयं अनंत है, वह जो
चराचर में व्याप्त है, उसे भाव से पाया जा सकता है. सारे कर्म जब उसी के लिए होने
लगें, हमारा होना ही जब उसके होने का साक्षी बन जाये, जब वही है यह ज्ञान भीतर
जागृत हो जाये. जब यह सम्पूर्ण जगत उसकी लीला प्रतीत होने लगे तो ही यह प्रेम भीतर
उपजता है. गुरु की शरण में गये बिना यह चमत्कार नहीं घटता, गुरु के पास भी वही
हमें भेजता है और उसके पास गुरु. यह उन दोनों के मध्य कैसी प्रीत है यह तो वही
जानें, वे दोनों तो एक हो चुके हैं, हमें दो नजर आते हैं. वे दोनों ही हमसे असीम
प्रेम करते हैं. उनके प्रेम को महसूस करना जिन्हें आता है, वे तृप्त हो जाते हैं, आनंद
में रहते हैं, बाहर कुछ भी हो, अछूते रहते हैं. उन्हें जगत से फिर क्या चाहिए ?
जगत उन्हें आश्चर्य चकित तो कर सकता है पर लुभा नहीं सकता. वे विस्मित होते हैं,
भ्रमित नहीं. कोई उनके भीतर से पल-पल सचेत करता रहता है. वे जगत के आश्रय बन जाते
हैं, उसका आश्रय लेते नहीं !
Wednesday, August 7, 2013
छिपी है भीतर रस की आकर
दिसम्बर २००४
कृष्ण ने इस धरा पर जो लीला की थी, वह अपने भीतर के रस को
अभिव्यक्त करने के लिए ही तो की थी. हमें भी अपने भीतर के रस को आस-पास बिखराना
है, ध्यान से यह सहज ही होता है. हम प्रेम के रस से ही बने हैं, प्रेम में ही
हमारा विलय होगा. जो हमारे अपने हैं, हितैषी हैं उन्हें तो हमारा प्रेम मिलता ही
है, यह सारा जगत हमारे अंतर की ऊष्मा से वंचित न रहे. हम दाता बनें. जिस परमात्मा
ने हमें सिरजा है वह भी हमसे मात्र प्रेम ही चाहता है. संतजन कहते हैं वह हमें
निरंतर प्रेम भरी नजर से निहार रहा है, जैसे माँ के लिए उसकी सन्तान हो वैसे ही. हर
कोई यहाँ अपनी-अपनी क्षमता से यही तो कर रहा है, कवि, संगीतज्ञ, चित्रकार,
मूर्तिकार अपने भीतर के माधुर्य को उंडेलना चाहते हैं, मानो भीतर कोई सोता बह रहा
है जो अनंत से जुड़ा है.
Tuesday, August 6, 2013
कोरा कागज रहे यह मन
दिसम्बर २००४
एक अनोखी दुनिया हमारे भीतर छुपी है,
आत्म भाव में जीने का संकल्प ही हमें एक अनोखी शांति से भर जाता है. कोई यदि
प्रतिकूल बात कहता है तो झट याद आता है, ओह, यह तो अहंकार को चुभी है, हमें तो
नहीं और मन एक कोरी स्लेट सा रह जाता है. यदि कोई यह अनुभव कर ले कि वह शुद्ध बोध
मात्र है तो जगत उसे छू भी नहीं सकता, जैसे पड़ोसी के घर में कुछ हुआ हो. बुद्धि
आत्मा की पड़ोसिन ही तो है उससे ज्यादा कुछ नहीं. संसार में ज्ञान की अनेकों शाखाएँ
हैं पर हर कोई उनका ज्ञान नहीं पा सकता और वे सभी अपूर्ण हैं, आत्मज्ञान हर कोई पा सकता है, यह पूर्ण है फिर भी यह बढ़ता
ही रहता है. यह हमें तृप्त करता है.
Monday, August 5, 2013
तृष्णा मिटे से कृष्णा मिले रे
दिसम्बर २००४
संयम और त्याग साधना के आवश्यक अंग हैं. संयम का
मुल्यांकन हमें सारे दुखों से मुक्त करता है, इच्छाशक्ति अपरिमेय है, एक को पूरा
करें तो दूसरी तैयार मिलती है. इनकी पूर्ति में ही समय, धन, परिश्रम चला जाता है.
वह आनन्द जो हमें इच्छा पूर्ति से मिलता है क्षणिक होता है, जबकि हम आनन्द के आगार
हैं. आनन्द की प्राप्ति के लिए हम संसार सजाते हैं पर अधूरे रह जाते हैं, हर इच्छा
पूर्ण होने के बाद हमें और अतृप्त कर जाती है, क्यों कि उसका संस्कार बन जाता है
जो बार-बार उस अनुभव की ओर खींचता है, हम दासता का जीवन जीते हैं. जब तक खुद को
नहीं जाना तभी तक यह तलाश है, स्वयं के भीतर शांति का अनुभव होते ही सारी दौड़
समाप्त हो जाती है, फिर जो सहज रूप से प्राप्त हुआ अथवा नैसर्गिक इच्छाएं ही रह
जाती हैं, और उनकी पूर्ति अपने आप ही होने लगती है. जब हम स्वयं इच्छाओं को उठाते
नहीं और उठ जाएँ तो उन्हें समर्पित करते जाते हैं, तो जो जरूरी है उसकी व्यवस्था
प्रकृति अपने आप कर देती है. हम कितने ही धनी हों पर भीतर की तृप्ति का अहसास जब
तक नहीं होता तब तक कृपण ही कहलायेंगे. पूर्ण मुक्ति का अनुभव तभी होगा जब मन में
किसी तरह का आग्रह न रहे, यह अवस्था सत्संग व साधना से ही आ सकती है.
Sunday, August 4, 2013
उसी एक का सकल पसारा
दिसम्बर २००४
कितना कुछ हर क्षण हमारे आस-पास घटता रहता है, पल-पल कर
समय आगे बढ़ता है, दिन बीतते हैं, वर्ष सदियाँ और युग बीतते हैं, हम वहीं के वहीं
खड़े हैं, यह सब जो बदल रहा है उसे देखते हैं. हमारा तन बदला, मन बदला, भाव भी
बदलते हैं, पर जहाँ कोई परिवर्तन नहीं, जो सदा से एक सा है, वह जो साक्षी है, वह
चैतन्य जो हमारे भीतर भी है वही जो कण-कण में समाया है, उसकी उपस्थिति का भान यदि
होने लगे तो समाधान मिलने लगता है, हमारा होना ही पर्याप्त होता है, तब न कहीं
जाना है न आना है, न खोना है, यह जड़ता नहीं है, सहजता है, सहज होकर सारे कार्य
अपने-आप होने लगते हैं, तब कर्तापन का अहंकार शेष नहीं रहता. हम प्रकृति के सहयोगी
बन जाते हैं, विरोध में ऊर्जा क्षय है, द्वंद्व है. हमें द्वन्द्वातीत होना है,
जहाँ कोई भेद नहीं रहता, संसार और स्वयं में भी कोई भेद नहीं रहता क्योंकि सब एक
से ही उत्पन्न हुआ है. अपने ही हाथ से अपना विरोध कैसा ?
Thursday, August 1, 2013
नजर बदली तो नजारे बदले
दिसम्बर २००४
वस्तुओं को देखने का हमारा नजरिया यदि संकुचित होगा तो हमें
दोष ही दोष दिखाई देंगे, हमें अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाना होगा, लोगों की
मानसिकता को समझना होगा, यदि समाज में विषमता है, भ्रष्टाचार है तो उसके लिए हम भी
जिम्मेदार हैं. हमें स्वयं को सुधारने का प्रयत्न करना है. यदि एक अंगुली हम समाज
की ओर उठाते हैं तो चार अपनी ओर भी उठती हैं. समाज में रहकर हम उसके गुण-दोषों से
बच नहीं सकते साथ ही हमें इस बात का भी निरंतर ध्यान रखना होगा कि सृष्टिकर्ता की
नजर से कुछ बचा नहीं है, प्रकृति के कानून से कोई बच नहीं सकता. कुछ वस्तुएं हमें
कितनी भी भयावह दिखाई देती हों पर उनकी भी उपयोगिता है, इसका अर्थ यह नहीं कि हम
हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाएँ, बल्कि यह कि हम बिना प्रभावित हुए अपनी क्षमता के
अनुसार कार्य हाथ में लें. हम यदि अपने इर्द-गिर्द परिवर्तन लाना चाहते हैं तो
हमें अपने भीतर परिवर्तन लाना होगा, हम सभी को स्वीकार कर चलें तो मन से विरोध का
भाव चला जाता है. ईश्वर की जो अनुभूति हमें अपने भीतर होती है, वह कण-कण में होने
लगेगी. हर मन की गहराई में वही परमात्मा है. हमें हर एक के भीतर छिपी उस शक्ति तक
पहुंचना है. आत्मा में स्थित रहकर हम जगत को एक खेल की भांति ही देखते हैं, यहाँ
सब कुछ प्रतिपल बदल रहा है. यहाँ कुछ लोग जगे हैं, कुछ सोये हैं, कुछ बेहोश हैं.
जगे हुए लोगों का साथ हमें भी सजग रखता है. सद्गुरु के अनुसार मन हम नहीं हैं, मन
कल्पनाओं का एक समूह है जो हमें भ्रमित करता है, हमारा उद्गम अनंत है और अनंत ही
हमारा स्वरूप है. यदि हमारे भीतर कोई वासना शेष न रहे तो हम उस ब्रह्म के निकट आ
जाते हैं, वही हमारा लक्ष्य है.
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