Sunday, December 22, 2013

खुल जाये हर गाँठ

मई २००५ 
हमारे मन के चार खंड हैं. संज्ञा मानस का पहला खंड है, अर्थात कोई वस्तु सम्मुख आने पर उसकी प्रतीति होना, दूसरा खंड पहचान करने का काम करता है, तीसरा खंड है संवेदना जगाने का, चौथा खंड है प्रतिक्रिया करने का, तभी राग-द्वेष का जन्म होता है. ऊपर-ऊपर से लगता है किसी बाहरी कारण से राग-द्वेष जगता है पर सच्चाई यह है कि इन्हें हम स्वयं जगाते हैं. भोक्ता भाव जब तक भीतर है गांठें बंधती ही रहेंगी, साक्षी होकर उन्हें देखते ही वे खुलनी शुरू हो जाती हैं. हर संवेदना क्षण भंगुर है, नष्ट हो ही जाने वाली है फिर क्यों उसके प्रति राग जगाना या द्वेष जगाना. ऐसा करना सीखने पर कर्म संस्कार नहीं बनते, और यही तो साधक का लक्ष्य है. 

Saturday, December 21, 2013

तेरा नाम सांचा

मई २००५ 
किसी ने कितना सही कहा है, “सुबह का बचपन हँसते देखा, दोपहर की मस्त जवानी, शाम बुढ़ापा ढलते देखा, रात को खत्म कहानी” अज्ञानता में भी वैराग्य छा जाता है, लेकिन यह क्षणिक होता है जैसे श्मशान वैराग्य, जब भीतर सत्य की झलक मिल जाती है तो बाहर से राग अपने आप ही छूट जाता है. वास्तव में तो सत्य सदा ही भीतर है, अज्ञान का आवरण ही उसे ढके रहता है. लेकिन संसार से वैराग्य होने का अर्थ उसका अनादर नहीं है न ही उदासीनता, बल्कि उसका सत्यता को जानकर उसके अनुरूप व्यवहार करना है. प्रेमपूर्ण व्यवहार तो करना है पर फंसना भी नहीं है. यदि हम नित्य को छोड़कर अनित्य पर भरोसा करते हैं तो हमें धोखा खाना ही पड़ेगा. नित्य पर किया विश्वास हमें नित्य सुख की ओर ले जाता है. राग हो ईश्वर से और सेवा हो जगत की तो मन खाली रहता है क्योंकि जग से कुछ लेने की कामना तो है नहीं और ईश्वर को कितना भी भर लो वह तो आकाश की तरह है. 

Friday, December 20, 2013

चेतन अमल सहज सुख राशि

मई २००५ 
मन, बुद्धि, चित्त आदि साधन हमें आत्मा की शक्ति को उजागर करने के लिए प्राप्त हुए हैं तथा उस शक्ति को प्रेम व आनन्द के रूप में बांटने के लिए मिले हैं. जब हम इनका उपयोग अहंकार की सेवा में करते हैं, या अपने सुख के लिए करते हैं तब दुःख को आमन्त्रण देते हैं, जब इनका उपयोग ज्ञानपूर्वक करते हैं तब सहज ही सुख पाते हैं. हमें सुख यदि खोजना पड़े तो वह हमारे योग्य नहीं है, लखपति यदि कुछ रुपयों के लिए भटकता फिरे तो उसे क्या कहा जायेगा, वैसे ही हम अनंत सुख राशि ईश्वर का अंश होने के कारण स्वयं ही वह सुख छुपाये हैं जो हमें जगत को बांटना है न कि उससे मांगना है. जगत आनंद शून्य है, ओस की बूंदों की तरह सुख का आभास मात्र दे सकता है. ज्ञान ही हमें मुक्त करता है.  

Thursday, December 19, 2013

शरण में आये हैं हम तुम्हारी

मई २००५ 
कृष्ण कहते हैं, दम्भ, दर्प, कुटिलता, कठोरता आदि आसुरी सम्पत्ति के अंतर्गत आते हैं. जो ज्ञान अभी भीतर ही पाया है, आचरण में नहीं उतरा है, उसका प्रदर्शन करना दम्भ ही कहा जायेगा. अन्यों के सामने स्वयं को समझदार जान उनके दोष देखने की प्रवृत्ति ही दर्प है. दूसरों को दुखी देखकर भी अप्रभावित बने रहना ही कठोरता है, और कठोरता तब आती है जब हृदय सरल नहीं होता. साधना के द्वारा हम इन दुर्गुणों से खुद को मुक्त रख सकते हैं. कृष्ण यह भी कहते हैं, दैवी सम्पत्ति भी हमारे भीतर है, प्रेम, शांति, सहजता, सरलता के गुण भी भीतर हैं, उनमें स्थित होकर स्वयं को पूर्ण समझें तो विकार अपने आप विलीन हो जायेंगे. उनका जोर तभी तक है जब तक शरण नहीं ली, एक बार शरण में आ जाएँ तो मन प्रेम का अनुभव करने लगता है, प्रेम का गुण सूर्य की तरह है जिसके उदय होने पर विकार रूपी तारे अस्त हो जाते हैं. 

Wednesday, December 18, 2013

तूने ही भेजे हैं जो सुख-दुःख सारे हैं

मई २००५ 
जब हम किसी स्थिति में स्वयं को असहाय महसूस करते हैं और ईश्वर को पुकारते हैं, तब वह आता है, किसी न किसी रूप में हमें सहायता मिलती ही है. ऐसा नहीं है कि हम ही उसके आकांक्षी हैं, वह भी हमें उतना ही चाहता है. इसका प्रमाण है कि हम सदा आनन्द चाहते हैं, और वह आनन्द स्वरूप है, वह जानता है, उसे भूलना ही हमारे लिए दुःख का कारण है. वह जब देखता है कि हम व्यर्थ ही संसार में उलझ रहे हैं और गलत जगह पर खोई हुई वस्तु को खोज रहे हैं तो हमारे जीवन में कोई न कोई विपत्ति भेज देता है ताकि हमारा ध्यान उसकी ओर हो सके. वह सुह्रद जो है.

Tuesday, December 17, 2013

सजगता ही साधनी है

मई २००५ 
मन का जो जानने वाला हिस्सा है, वह सजग रहे तो ही हम वर्तमान में रह सकते हैं, वरना मन की सहज आदत है कभी भूत में जाना कभी भविष्य की कल्पना करना. कोई अन्य यदि हमें अपना दुःख कहे तो हम उसके प्रति सहज ही संवेदना प्रकट करते हैं वैसे ही मन में जब कोई दुःखद बात याद आती है तो यंत्र की तरह मन उसके प्रति दुखद संवेदना जगाता है, और दुःख का संस्कार भीतर पक्का हो जाता है. सजग रहकर हम बस साक्षी होते हैं की अब मन ने दुखद को याद किया अब सुखद को याद किया, दोनों ही स्वप्न मात्र हैं, हमारे सुख-दुःख का कारण वह घटना नहीं बल्कि हमारे मन की प्रतिक्रिया है, क्रोध के समय जो अपशब्द हम बोलते हैं, वे सामने वाले को दुखी करें या नहीं यह उसकी सजगता पर निर्भर है पर हमने अपने भीतर  दुःख का बीज बो दिया यह तो तय है, और बाद में इसे याद करके मन इसे भी संस्कार के रूप में सुरक्षित रख लेता है. कोई दूसरा हमें व्याकुल करे तो हम स्वयं को बचा भी सकते हैं पर संस्कार रूप में संजो कर रखे अपने ही मन से कोई कैसे बच सकता है, साक्षी भाव ही एक मात्र उपाय है, और तब भीतर एक आह्लाद का जन्म होता है, जैसा बच्चे की हरकतों को देखकर होता है.

Monday, December 16, 2013

जुड़ा रहे मन उस अपने से

मई २००५ 
जिसका कार्य और रूचि एक हो, जिसका हृदय और मस्तिष्क एक हो उसमें सख्य भाव होता है. राम और लक्ष्मण में भी ऐसा सख्य भाव है. लक्ष्मण सदा से ही राम के संग हैं. जगे हुए ब्रह्म में जब सृष्टि की इच्छा होती है तो यह शेष उन्हें अपने शीश पर धारण करता है. दोनों में अद्वैत है. इसी तरह का सख्य भाव भक्त और भगवान में होता है, गुरु और शिष्य में होता है. मानसिक रूप से वे साथ रहते हैं, भौतिक दूरी उनके लिए कोई दूरी नहीं होती. जो ईश्वरीय तत्व को जानता है, वह हर क्षण जुड़ा रहता है, दोनों के बीच प्रेम की धारा अविरल बहती रहती है. समाधि का अनुभव दोनों को होता है. आधि, व्याधि, उपाधि से मुक्त होकर भक्त, भगवान के प्रेम का पात्र बन जाता है. अपनी ऊँचाई पर स्थित होते हुए भी वह उसके मन से जुड़ जाते हैं, वे सर्व समर्थ हैं.