Saturday, July 5, 2014

जब मन खाली हो जाता है

सितम्बर २००६ 
मन ग्रन्थि स्वरूप है, जो विकार हमारे भीतर पड़े हुए हैं, हम उन्हीं विकारों को बाहर से भी अपनी ओर आकर्षित करते हैं. जब मन की ग्रन्थि हमारे भीतर की उपजाऊ भूमि पाकर फूटती है तो उसमें से विचार रूपी कोंपले निकलती हैं. जो विचार हमें ज्यादा आते हैं, समझना चाहिए वही ग्रन्थि काटनी है. ध्यान में हमें यही तो करना है. आते हुए विचारों की साक्षी भाव से देखना, बिना राग-द्वेष जगाये देखना उस ग्रन्थि से मुक्त करता है. हम जितना-जितना भीतर से खाली होते जाते हैं वह चैतन्य उतना-उतना उसमें भरता जायेगा. इच्छा जब घटते-घटते शून्य हो जाएगी तब रास्ता सरल हो जायेगा. इस जगत में इच्छा करने योग्य एक वही तो है ! पर वह भी तब मिलता है जब उसकी भी इच्छा न रहे..

Friday, July 4, 2014

होना हमको हम जैसा ही

सितम्बर २००६ 
हम अपने शुद्ध स्वरूप में टिके रहें अर्थात सहज, सरल, प्रेम पूर्ण स्वभाव में, शांति और आनन्द में तो सहज ही हमसे भले कार्य होते हैं. यदि हम कुछ करने जाते हैं तो बात बिगड़ जाती है. हमें कुछ बनना नहीं है, होना है, जो हम हैं वही होना है. कुछ विशेष नहीं होना है. हमारे लिए कुछ करने जैसा है ही नहीं, न कुछ जानने जैसा है, न पाने जैसा है. जिसको जानकर, पाकर संतजन कृत कृत्य हो गये वह आत्मा तो हमें पहले से ही प्राप्त है. उसका अनुभव तो हमें हर पल होता है, हमें उसी में रहना है. यही अध्यात्म है. 

Thursday, July 3, 2014

एक त्रिवेणी हो जीवन में

सितम्बर २००६ 
ज्ञान से हम ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाते हैं. योग से कृत-कृतव्य हो जाते हैं और भक्ति से प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाते हैं. तीन ही तो शक्तियां हैं हमारे पास, जानने की शक्ति, करने की शक्ति तथा मानने की शक्ति. यदि जीवन में ज्ञान, भक्ति तथा योग नहीं है तो हम कोल्हू के बैल की तरह एक ही घेरे में चक्कर लगाते हैं जिसकी आँखों पर पट्टी बंधी है. कहीं भी नहीं पहुंचते, जीवन भर एक ही सीमा में बंधे रह जाते हैं. सद्गुरू के द्वार पर पहुंचने भर की देर है, वह ज्ञान से हमारे भीतर के चक्षु खोल देते हैं, भक्ति से हृदय को सरस बना देते हैं तथा सेवा की प्रेरणा देकर करने की क्षमता का उपयोग करना सिखाते हैं. 

Tuesday, July 1, 2014

पानी बिच मीन प्यासी

अगस्त २००६ 
ध्यान में जो नीरवता भीतर प्रकट होती है, वह अतीव मधुर है. वह शब्दों से परे है. यह जगत भी तभी सुंदर लगता है जब अंतर शांत हो. हमारी चेतना इतनी भव्यता छिपाए है कि उसे शब्दों में कहा ही नहीं जा सकता. यह प्रकृति कितने रूप धर कर हमें लुभाती है. सौन्दर्य जो बाहर है, वह उत्पन्न हुआ है, जो भीतर है वह तो सहज है, स्वनिर्मित है. जब तक कोई इस सौन्दर्य को जान नहीं लेता है तब तक प्रेम को पहचान नहीं पाता. प्रेम का अनुभव किये बिना ही उसे इस जगत से जाना पड़ता है, वह प्यासा ही रह जाता है, जगत से सुख पाने की इच्छा उसे दूसरों का गुलाम बना देती है.

धरती से आकाश तक

अगस्त २००६ 
किसी कवि ने ठीक कहा है –

अधिकांश आकाश छूट जाता है
थोड़ी सी भूमि गुनगुनाता हूँ


हम उस आत्मा को जो आकाश की भांति व्यापक है , कैद करना चाहते हैं पर वह पकड़ में नहीं आती. मन, बुद्धि से परे वह आत्मा सदा हमसे दूर ही रहती है, फिर हम हार कर मन, बुद्धि का आश्रय छोड़ देते हैं तो भीतर से कोई गीत गाने लगता है. संगीत फूटने लगता है. उस दुनिया में कुछ भी थोड़ा सा नहीं सब कुछ अनंत है. अनंत चिदाकाश, अनंत आनंद, अनंत शांति, अनंत प्रेम तथा अनंत ज्ञान भी ! जीवन का, कण-कण में बसी चेतना का ज्ञान ! तब छोटापन खत्म हो जाता है, सारी सीमाएं छूट जाती हैं. हम उसे विराट के अंश हैं और उसका सब हमारा है यह भाव दृढ हो जाता है. आत्मा का यह ज्ञान अद्भुत है, पर जब यह सहज रूप से हमारे कर्मों, वाणी तथा व्यवहार से प्रकट होने लगे तभी टिका हुआ जाना जायेगा.  

Sunday, June 29, 2014

एक ऊर्जा भीतर पलती

दिसम्बर २००६ 
संतजन कहते हैं, मनोरंजन पर आत्म रंजन का, भोग पर योग का, राग पर विराग का तथा अज्ञान पर ज्ञान का अंकुश रहना चाहिए. अंकुश ढीला पड़ भी जाये तो बस उतनी देर जितनी देर एक लहर पानी में उठे और गिरे. आत्मा के स्तर पर सभी प्राणी एक दूसरे से जुड़े ही हैं, यह बात जब एक बार अनुभव के स्तर पर जान ली जाती है तो सदा के लिए शांति की एक कुंजी हमारे हाथ लग जाती है. इस ज्ञान के बाद आत्म रंजन, योग और विराग स्वत ही मिल जाते हैं. हम जब किसी न किसी उद्देश्य पूर्ण कार्य में लगे रहते हैं तो भीतर एक ऊर्जा स्वयं ही निर्मित होती है, और जब जीवन में कोई ध्येय न हो तो वह ऊर्जा मंद पड़ जाती है. यही ऊर्जा योग है. 

Saturday, June 28, 2014

सत्य वही जो मुक्त करे

दिसम्बर २००६ 
ज्ञान हमें मुक्त कर देता है, भीतर से मुक्तता अनुभव में आते ही सारा जगत एक अनोखे प्रकाश से भर गया प्रतीत होता है. आत्मज्ञान पाकर ही मानव वास्तव में स्वयं को पहचानता है. उसके पूर्व तो वह अपनी क्षमता से कहीं निम्न स्तर पर जीता है. एक दासता का जीवन, मन की दासता, इन्द्रियों की दासता, धन, यश, मोह, क्रोध, और अहंकार की दासता, इनके अलावा मन की और कई सुप्त प्रवृत्तियों की दासता वह सहता है. किन्तु जब सत्य का बोध होता है मात्र उसकी झलक भर मिलती है तो जैसे कोई पर्दा उठ जाता है. वह स्वयं को कितना हल्का महसूस करता है. अनंत आकाश में निर्विरोध उसका गमन होता है.