Friday, August 31, 2012

भीतर जगता प्रेम अछूता


जुलाई २००३ 
जैसे नरभक्षी पौधे अपनी पकड़ में आये प्राणियों को अपनी डालियों में जकड़ कर उनको विवश कर देते हैं, वैसे ही राग और द्वेष के दो वृक्ष हमारे भीतर उगे हैं, उनकी जड़ों, टहनियों ने हमको जकड़ रखा है, हम उन्हीं में उलझे हुए हैं, और छूटने का प्रयास भी नहीं करते. सुख-दुखके फल हमें इन्हीं वृक्षों से मिलते हैं. सदगुरु आकर हमने जगाते हैं, उनकी आभा देखकर हमें भी वैसा बनने की प्रेरणा मिलती है. साधक का राग खो जाता है यदि वह अपना राग ईश्वर में लगा दे, उसे द्वेष नहीं रहता क्योंकि उसके सिवाय कुछ नजर ही नहीं आता, वह तटस्थ हो जाता है. सच्चा प्रेम तभी अंतर में जगता है. जो सभी को अपना सा जानता है, वह सभी के कल्याण की ही बात सोचेगा. उसका हृदय विशाल हो जाता है, छोटी-छोटी बातों से निर्लिप्त होकर वह जगत में रहता है. वह जो भी करता है पूरे होशोहवास में करता है, ज्ञान पाने का सदा अभिलाषी रहता है. वह पूर्णकाम होकर जगत में राजा की नाईं विचरता है पर उसमें अहंकार नहीं होता. सदगुरु व परमात्मा का वरद हस्त सदा उसके सर पर होता है.  

Thursday, August 30, 2012

आत्मा केन्द्र है


जुलाई २००३ 
सदगुरु हमें अपने सच्चे स्वरूप का परिचय देते हैं और वहाँ तक जाने का रास्ता भी बताते हैं. और एक बार जब उस पथ के यात्री हम बन जाते हैं तो लगता है वास्तविक जीवन अब शुरू हुआ है. तब यह जगत एक खेल प्रतीत होता है. यहाँ सब कुछ बदल रहा है यह स्पष्ट होने लगता है. हमारा अंतः करण ही तब एक मात्र स्थिर प्रतीत होता है, सदा एक सा, हम केन्द्र में स्थित हो जाते हैं. तब संसार के झूले के झकोरे हमें नहीं झुलाते. हम द्रष्टा भाव में आ जाते हैं. यह जगत दृश्यमान है हम उससे पृथक हैं. जैसे जल में नाव जल से पृथक है. कीचड़ में कमल की तरह हम निर्लिप्त हो जाते हैं. सारे कार्य पूर्ववत होते हैं, पर जैसे प्रकृति अपना खेल देख रही होती है. तीनों गुणों के आधीन होकर हम जगत का व्यवहार तो करते हैं पर स्वयं को इससे पृथक देखते हैं, शरीर, इंद्रिय, मन और बुद्धि अपना-अपना कार्य करते हैं, ऐसा स्पष्ट आभास होने लगता है.  

Wednesday, August 29, 2012

कर्म किये जा फल की चिंता मत कर ऐ इंसान


हम जैसा कर्म करते हैं प्रकृति उसका तदनुसार फल देती है. उसके नियम अटल हैं. निष्काम कर्म  भी करें तो भी फल तो मिलने ही वाला है. कामना होने से हमारा सारा ध्यान कर्म की ओर न रहकर फल की ओर भी चला जाता है सो हमारी चेष्टा पूर्ण नहीं होती सो फल भी अधूरा ही मिलता है. चिंतन, मनन ध्यान भी कर्म हैं और निर्धरित कर्त्तव्यों का पालन भी. यदि पहली श्रेणी के कर्म हेतु के लिये किये गए हों, और कर्त्तव्य, मात्र कर्त्तव्य हेतु तो पहले कर्म बांधने वाले होंगे. मन को सात्विक बनाना भी यदि कुछ पाने की इच्छा से हुआ तो मुक्ति दूर ही रहेगी. कर्ता भाव जब तक नहीं छूटता तब तक फल की इच्छा बनी ही रहेगी, यदि कर्म हमारे द्वारा हो रहे हैं, हम नहीं कर रहे हैं तभी हम फल की आशा से बंधेंगे नहीं.  

Tuesday, August 28, 2012

भक्त वही जो कुछ न चाहे


जुलाई २००३ 
भक्ति स्वयं फलरूपा है, अर्थात भक्ति का फल और भक्ति है, अपरा के बाद परा भक्ति ! जीवन मुक्त ही सच्ची भक्ति कर सकता है ऐसी भक्ति जो कुछ चाहती नहीं, सिर्फ देना चाहती है, अपना एकांतिक प्रेम उस प्रभु को, जो एकमात्र प्रेम करने योग्य है, वह सभी के भीतर है, कण-कण में है, अतः भक्त के लिये कोई पराया नहीं रहता. परमात्मा का प्रेम हमारे अंतर में हजार गुना होकर बल्कि अनंत गुना होकर प्रकाशित होता है. हमें उसके प्रेम का अधिकारी बनना है और उसकी सरल, सहज राह है विनम्रता की राह. वैसे तो परमात्म प्रेम सहज प्राप्य है, पर मन इसे देख नहीं पाता, जब शरणागति की भावना उपजती है, अपने अंतर को शांत बनाने की इच्छा बलवती होती है, तो भक्ति प्रकट होती है और आगे का मार्ग सरल हो जाता है. 

परम प्रेम ही मुक्त करेगा


जुलाई २००३ 
परमात्मा अकाल है, अर्थात समय से परे है. उसे जान लें तो मन में जागृत अवस्था में भी सुषुप्ति का अनुभव हो सकता है, तब हम जगत में सभी कर्त्तव्यों का पालन करते हुए भी भीतर शिला की नाईं अडिग रह सकते हैं. उसका ज्ञान होते ही सारा का सारा विषाद न जाने कहाँ चला जाता है. जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब विभिन्न प्रकार के बर्तनों में एक सा नहीं दिखाई देता जिसमें पानी स्थिर है स्वच्छ है, उसमें प्रतिबिम्ब स्पष्ट होगा. जिसमें पानी गंदला है, उसमें स्पष्ट नहीं होगा, जिसमें पानी हिल रहा है वहाँ प्रतिबिम्ब भी टुकड़ों में दिखेगा. वह परमात्मा संतों के हृदय में स्पष्ट दिखता है और हमारे हृदय में स्पष्ट नहीं दिखता. जैसे-जैसे उसकी ओर हृदय जाता है, विकार अपने आप दूर होने लगते हैं. अध्यात्म का यही अर्थ है, यह हमें इतना विशाल बना देता है कि सारा ब्रह्मांड अपना लगता है. ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम ही हमें सारी बुराइयों से बचा लेता है.  

Monday, August 27, 2012

प्रेम गली अति सांकरी


जुलाई २००३ 
चींटी को अगर हिमालय जितना विशाल मिश्री का पहाड़  मिल जाये तो वह उसका कितना अनुभव कर सकती है? उसी तरह उस परमात्मा का बखान हमारी अल्प मति कितना कर सकती है.? वह अनंत है उसे जानने के लिए किये हमारे सारे प्रयत्न विफल हो जाते हैं. उसकी कृपा सदा ही बरस रही है, हमने अहंकार का छाता लगा लिया है जिसके कारण वह हमें छूती ही नहीं. पर जब उसकी कृपा को हम महसूस करते हैं, तब वह हमारे भीतर शक्ति देता है, मोक्ष की इच्छा को जन्म देता है. वह हमारे मन को हर लेता है, वह ज्ञान की कुंजी देता है. उसने हमें अपने समान बनाया है, हमारे भीतर ज्ञान, प्रेम और ऊर्जा का अनंत स्रोत उसने दिया है. नश्वर सम्बन्ध बनाकर हम उस भूले रहते हैं और जीवन समाप्त हो जाता है. रेत की दीवारों पर खड़ा यह जगत हमें सदा खुद से मिलने में बाधा बना रहता है. उसके और खुद के मिलने में कोई अंतर नहीं है. उसके घर का रास्ता खुद से होकर ही जाता है और जब वहाँ से साधक लौटता है तो दो नहीं होते, एक ही रहता है. 

Friday, August 24, 2012

कल कल छल छल बहती वाणी


जुलाई २००३ 
संतों ने यूँ ही नहीं कहा है कि मानव जन्म दुर्लभ है, और उससे भी दुर्लभ है सत्य को जानने की जिज्ञासा. दुःख से मुक्त होना तो सभी चाहते हैं पर सारा दुःख असत्य के कारण है इस सत्य से आँखें चुराए रहते हैं, न तो दुःख दूर होते हैं न सत्य की मीठी छाँव का ही अनुभव कर पाते हैं. जिसे संतों का सत्संग मिलता है उससे बढ़कर भाग्यशाली कौन हो सकता है. अमृत के समान मीठे वचन जिसके अंतः करण को स्वच्छ करते हैं, निरंतर गिरती जलधार की तरह संतों की वाणी कानों से होती हुई मन तक पहुंचती है, मन झोली फैलाये तत्पर रहता है और उन मोतियों को एकत्र करता है. दुःख की आग में जलते हुए मानवों पर उनकी वाणी शीतल फुहार बन कर बरसती है. वे सत्यद्रष्टा हैं और प्रेम तथा करुणा वश वे हम सभी को उसका दर्शन कराना चाहते हैं. वे जीवन को उत्सव बनाने के मार्ग के बारे में सरल शब्दों में बताते हैं. ज्ञान के प्रति, प्रेम के प्रति उनके मन में कितनी ललक है, वही ललक हमारे भीतर उठे, स्वर्ण मृग की तरह व्यर्थ की कामनाएं हमारे जिस मन को अपने पीछे लगाये रहती हैं, वह मन मर्यादा में रहना सीखे.