Sunday, March 31, 2013

जगता है जब भीतर प्रेम


जून २००४ 
प्रेम से परिवर्तन सम्भव है, प्रेम हमारे भीतर एक क्रांति का उदय करता है, हम भीतर पिघल जाते हैं. गुरु के चरणों में जब हमारा सिर झुकता है तो भीतर एक घटना घटती है, अपने सुख-दुःख, पाप-पुन्य, गुण-अवगुण सभी को गुरु अथवा ईश चरणों में समर्पित करके जब हम मुक्त हो जाते हैं तो कृपा का बादल मन के आंगन में बरसता है, अंतर भीग जाता है और प्रेम की उर्जा भीतर उदय होती है. हम अपने स्वभाव को पा जाते हैं, प्रेम हमें हमारे स्वभाव से मिलाता है, वास्तव में हम दूसरे को प्रेम कर नहीं होते अपनी आत्मा से ही कर रहे होते हैं, क्योंकि सीधे-सीधे उस तक हमारी पहुंच नहीं है, हमें दूसरे के वाया जाना पड़ता है, सभी के भीतर वही स्वभाव है, जो प्रेम का स्रोत है. सच्चा प्रेम वहीं से उपजता है और वहीं पहुंच जाता है.

Friday, March 29, 2013

बस निमित्त भर हो जाएँ..



जब तक हमारे जीवन में राग-द्वेष हैं, तब तक हमें कर्म करने ही पड़ेंगे, साधना करते-करते जब मन खाली हो जायेगा, तब अस्तित्त्व हमारे द्वारा काम कराएगा. जैसे मैले कपड़े को तब तक धोया जाता है जब तक उसमें मैल रहता है ताकि वह स्वच्छ होकर पुनः इस्तेमाल किया जा सके, वैसे ही मन जो विषादग्रस्त हो गया है, उसे जगत की परिस्थितियाँ पटक-पटक कर निर्मल करती हैं, सुख-दुःख दोनों इसलिए आते हैं कि हम उन्हें त्याग कर आगे निकल जाएँ, खाली मन में प्रेम का उदय होता है, जिससे वह आत्मकल्याण की बात सोचता है, भीतर की भलाई की बात सोचता है. ऐसा मन अन्यों के लिए उस औषधि की तरह हो जाता है जो ऊपर से तो कड़वी होती है पर उसका असर लाभप्रद होता है. वह बदले में किसी से कुछ नहीं चाहता, कोई अपेक्षा उसे जगत से नहीं रहती, लेकिन कोई भी वास्तविक अर्थों में निरपेक्ष होकर नहीं रह सकता, शरीर के निर्वाह के लिए तो उसे जगत का आश्रय लेना ही होगा, समाज का, शास्त्रों का गुरु का ऋणी भी होना पडेगा, समाज उसे सुरक्षा प्रदान करता है, परिवार उसे स्नेह देता है, गुरु उसे ज्ञान देते हैं, तब जाकर वह इस योग्य बनता है कि निर्भय होकर स्वयं को स्वालम्बी घोषित कर सके, और यदि उसे एक बार सार्मथ्य मिल जाता है, उसका आत्मबल बढ़ जाता है तो उसे अपनी सारी क्षमता का उपयोग क्या अब उनकी सेवा में नहीं लगाना चाहिए जिनके कारण वह यहाँ तक पहुंचा है, यहीं अस्तित्त्व उसे अपना उपकरण बना लेता है.

Thursday, March 28, 2013

तू प्यार का सागर है


जून २००४ 
संतजन कहते हैं, सुख को पकड़ना नहीं है, सुख तो स्वाभाविक है, उसे पकड़ने जायेंगे तो वह  दुःख में बदल जायेगा. दुःख को भी पकड़ना भी नहीं है, उसे पकड़ने से वह बढ़ जायेगा, उसे भी छोड़ना है, वह कम हो जायेगा. दुःख का जाना भी स्वाभाविक है और जो बचेगा वह सहज सुख ही होगा. इच्छा को पूरी करने का ज्वर जब चढ़ता है तो दुःख बढ़ता है, इच्छा को समर्पित कर देना है, यदि वह श्रेयस्कर होगी तो अपने आप पूरी हो जायेगी, इच्छा का त्याग करते ही सुख आता है. मन का सहज स्वभाव तो आनंद ही है, कोई भी विक्षेप होता है तो वह ढक जाता है, उसके दूर होते ही पुनः मन अपने सहज स्वरूप में आ जाता है. जो सहज है, वही सुखकर है, ईश्वर की उपस्थिति उसी आनंद में ही सम्भव है. वह हमें सहज प्राप्य है, वह सागर है, हम तरंगों, बुलबुलों, लहरों, बुदबुदों की तरह हैं, हम उसी से बने हैं और उसी में हैं. हमारी आस्था का केन्द्र वही है, वह यही चाहता है कि हम उसे अपने भीतर पहचानें.

Tuesday, March 26, 2013

मुक्त करे आनंद



अस्तित्त्व हमें बोलने, सुनने, देखने, सूँघने, व छूने की शक्ति प्रदान करता है ताकि हम उसके आनंद में भागीदार हो सकें. वह जब अपने आनंद को बांटना चाहता है तो इस सुंदर जगत का निर्माण करता है, अपने से ही वह इसे गढ़ता है, फिर जैसे माँ बच्चे को जन्म देती है, फिर उसे स्नेह देती है और स्नेह पाती है, वैसे ही वह भी आनंद का आदान-प्रदान करता है. मोह वश जैसे कभी सन्तान ही दुःख भी पाती व देती है, वैसे ही हम भी अपने कृत्यों के कारण दुःख पाते हैं, व उसे दुःख देते हैं, क्योंकि उसकी सबसे बड़ी पूजा प्रसन्न चित्त रहना है. चित्त जब निर्मल हो, प्रसन्न हो, समता में हो तब हम उसके निकट हैं और लेन-देन चल रहा है.

Friday, March 22, 2013

मुक्त करेगा प्रेम


जून २००४ 
संतजन कहते हैं, परमात्मा अन्तर्यामी है, वह सभी के हृदय का साक्षी है, वे आनन्दस्वरूप हैं, पर भक्तों के प्रेम में वे भी आनंद पाते हैं. जिस तरह भक्त भगवान को प्रेम करते हैं, वे भी करते हैं. प्रेम के इस आदान-प्रदान में भक्त और भगवान एक अनोखे आनंद का अनुभव करते हैं. हर वस्तु का स्वभाव ही उसका धर्म है, हमारा स्वभाव आनंद है उसमें बाधा आते ही हम विचलित हो जाते हैं, हमारा सहज स्वभाव ही प्रेम पाना व प्रेम देना है, पर यह प्रेम सहज और विशुद्ध होना चाहिए अग्नि की तरह, सूक्ष्म होना चाहिए आकाश की तरह, ईश्वर की तरफ प्रेम भरी नजर उठते ही सद्गुरु की कृपा होती है, वह हमें रसमय, मधुमय बनाते हैं.

Thursday, March 21, 2013

मुक्त करेगा ध्यान


जून २००४ 
मन हमें किस तरह अपने जाल में उलझा लेता है, हमें खबर तक नहीं होती. बहुत बड़ा शिकारी है यह मन, जन्मों-जन्मों से हम इसके शिकार होते आये हैं, तभी सद्गुरु कहते हैं, “मन के मते न चालिए” कैसे हमारा मन ही हमारा शत्रु बन जाता है, कैसा भयभीत करता है यह पागल मन. जिसे जानने का हम भ्रम पालते हैं. हम अपनी बेवकूफियों का शिकार बनते रहते हैं और अपने इर्द-गिर्द का वातावरण भी दूषित करते हैं. हम स्वयं को ही नहीं जान पाते और अन्यों को जानने का झूठा दम भरते हैं, किसी के बारे में कोई राय कायम करने से पूर्व, कोई बात कहने से पूर्व सौ बार सोचना चाहिए. सद्गुरु ठीक कहते हैं ऊपर-ऊपर से लगता है कि हम सुधार कर रहे हैं मन का, पर जो भीतर कर्म के बीज पड़े हैं, वे तो तभी जायेंगे जब हम ध्यान की गहराई में पहुंचेंगे. अभी बहुत सफर तय करना है, अभी तो शुरुआत है. जब पहली सीढ़ी पर कदम रखा है तो लक्ष्य भी एक न एक दिन मिलेगा ही. सद्गुरु का साथ हर क्षण हमारे साथ है, वह हर तरह से हमारी सहायता करते हैं. वह स्वयं पूर्णकाम हैं, धन्य हैं वे आत्माएं जो स्वयं पवित्र होकर दूसरों का मार्ग प्रशस्त करती हैं. किसी न किसी जन्म में, सम्भव है इसी जन्म में, हम भी किसी के काम आ सकें, पहले तो स्वयं का कल्याण करना है, मुक्त होना है. हर कीमत पर बन्धनों को तोड़ कर फेंकना है, अंतिम बार हो यह बंधन, आगे नहीं !

Wednesday, March 20, 2013

मुक्त हुए मिटती माया


जून २००४ 
मन की सौम्यता बनाये रखना ही अध्यात्म का लक्ष्य है, हमारा मन जब संसार की ओर उन्मुख होता है तो अपनी सौम्यता खो सकता है यदि सचेत न रहा, जब भीतर जाता है तो शांत अवस्था को प्राप्त होता है यदि सजग रहा, वहीं उसका वास्तविक घर है, जहाँ उसे पूर्ण विश्राम मिलता है. संतजन कहते हैं शरीर तो वह उपकरण है जो आत्मा को अपनी गरिमा प्रदान करने के लिए मिला है, मन भी वह उपकरण है जो उच्च चिंतन व मनन करने के लिए मिला है, व्यर्थ चिंतन करके सुखी-दुखी होने के लिए नहीं है. भीतर जाकर जो लौटा है उसके लिए संसार स्वप्न की भांति हो जाता है. वह  स्वाधीन हो जाता है, मुक्ति का सुख निराला है, जो शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता.