Monday, September 22, 2014

पल पल रहे जागता मन जब

मार्च २००७ 
प्रेम का मार्ग अति कठिन है, प्रेम किसी क्रिया या पदार्थ पर निर्भर नहीं करता. मन रूपी दर्पण पर जमी धूल सामने हो तो आत्मा रूपी प्रेम नहीं दिखता जब क्रिया या पदार्थ के प्रति आसक्ति के प्रति सजग होकर कोई उसे त्याग देता है तो उसमें एक नई जागृति उत्पन्न होती है और वह अपने मन पर लगी धूल साफ करने लगता है. यह जागृति ही प्रेम को जन्म देती है. जो जागता है उसका ध्यान परमात्मा करता है, जागरण का अर्थ है आत्मा में स्थित हो जाना और आत्मा परमात्मा का अंश है. जागना यानि सजगता हमें पल-पल मुक्त रखती है. यही जीवन मुक्ति है. भीतर से ऐसी मुक्तता का अनुभव करना हमें प्रेम सिखाता है. वही सहजता है, वही योगी का लक्ष्य है, ध्यानी का और ज्ञानी का लक्ष्य है. हर जाता हुआ क्षण हमें विश्रांति का अनुभव दे और हर आता हुआ शक्ति का तो हम कार्य करते हुए भी आनन्द का अनुभव करते हैं तथा कुछ न करते हुए भी तृप्ति का. सजगता आती है सजग रहने से जैसे तैरना आता है तैरने से, इसमें किसी व्यक्ति, वस्तु, क्रिया पर हमें निर्भर नहीं रहना है. सद्गुरु ने यह मार्ग दिया है, अब चलना तो स्वयं ही होगा. यह तलवार की धार पर चलने जैसा है पर इस पर चलने का बल परमात्मा हमें देता है, उसकी कृपा तो बरस रही है अनवरत !


Saturday, September 20, 2014

उससे मिलना जब हो जाये

मार्च २००७ 
हम व्यर्थ ही मन में संकल्पों का जाल बुनते हैं और व्यर्थ ही विपदाओं को मोल लेते हैं. प्रभु के भक्त के लिए एक क्षण के लिए भी उसका विस्मरण विपदा के समान ही तो है, आत्मा का सूर्य जब पल भर के लिए भी संकल्प रूपी बादल से ढक जाये तो कैसी छटपटाहट सी होती है, कोई भीतर से हमें कुरेदता है. जितना हम उससे प्रेम करते हैं उससे कहीं ज्यादा वह हमसे प्रेम करता है. वह भी तो इस बात के लिए प्रतीक्षित रहता है कि कोई उसे पुकारे. हम जिस क्षण असजग हो जाते हैं तभी अभाव सताता है, वास्तव में अभाव उसी का होता है जिसे भरना हम बाहरी वस्तुओं से चाहते हैं. 

Friday, September 19, 2014

बना साक्षी सुख-दुःख का जो

मार्च २००७ 
जब गुरू जीवन में आते हैं तो जीवन को एक सही मार्ग मिलता है. हम साक्षी भाव को प्राप्त होते हैं. देह नित नाश की ओर जा रही है. हम स्वयं मरने वाले नहीं है, जड़ प्रकृति को अपना मान कर ही हम उपाधियों को प्राप्त होते हैं. सुखी-दुखी होने पर यह देखना चाहिए कि सुखी-दुखी कौन हो रहा है ? हम बेहोशी में स्वयं को ही सुखी-दुखी मान लेते हैं. साक्षी भाव में आते ही हम स्वयं को मुक्त अनुभव करते हैं. जब भीतर का वातावरण शांत हो, प्रेमपूर्ण हो, आनन्दपूर्ण हो और संतुष्टि से भरा हो तो मानना चाहिए कि साक्षी भाव जग रहा है. पूर्ण सजग रहकर इसे बनाये रखना है तथा मन, बुद्धि आदि में कोई हलचल हो भी तो उसे देखने मात्र से वह नष्ट हो जाती है. 

Thursday, September 18, 2014

नित्य निरंतर जो बढ़ता है

मार्च २००७ 
दो तरह का प्रेम होता है एक साधक का, एक सिद्ध का. पहला हमें करना है दूसरा अपने आप होता है. हमारी साधना लौकिक है और यह दूसरा प्रेम दिव्य है, इसे पाने के लिए कीर्तन, स्मरण तथा श्रवण साधनों से भक्ति के द्वारा अंत करण की शुद्धि करनी होगी. तब अहंकार नही रहता, संसार की वस्तुओं की कामना नहीं भी रहती तथा हृदय की समता बनी रहती है, फिर वह दिव्य प्रेम स्वतः ही प्रकट होता है. ऐसा प्रेम जो कभी घटता नहीं, नित्य बढ़ता ही रहता है, ऐसा प्रेम जो दोष नहीं देखता, जो सदा एक के प्रति होते हुए भी सारी सृष्टि के लिए होता है.


Tuesday, September 16, 2014

जाग सके तो जाग

मार्च २००७ 
ईश्वर कृपा रूप है, उसकी कृपा हर पल, हर स्थान पर बरस रही है. हम कृपा के सागर में ही रह रहे हैं पर हम इसे महसूस नहीं कर पाते. ज्ञान, कर्म और उपासना के द्वारा हम इसे महसूस करने के योग्य बन सकते हैं. ज्ञान का अर्थ है स्वयं के वास्तविक रूप का ज्ञान अर्थात आत्मा का ज्ञान, कर्म का अर्थ है निष्काम कर्म अर्थात जो सहज रूप से होते हैं न कि किसी कामना वश, उपासना का अर्थ है भक्ति, जो हमें ईश्वर के निकटतर लेती जाये. मात्र शाब्दिक ज्ञान हमें कहीं नहीं ले जायेगा वरण अनुभव करना होगा. अभी तो हम असजग हैं, स्वप्न में हैं, केवल रात्रि को ही स्वप्न नहीं देखते, दिन में भी भीतर जो अंतर धारा चल रही है वह भी तो स्वप्न ही  है. बीच में कभी क्षण भर के लिए स्वप्न टूटता है. काश ! यह हमारे जीवन की रात्रि का अंतिम स्वप्न हो. सन्त हमें जगाने आते हैं, वह जो स्वयं जगा है वही तो दूसरों को जगा सकता है.


Monday, September 15, 2014

कुछ देना न लेना मगन रहना

मार्च २००७
जैसी दृष्टि वैसी ही सृष्टि दिखाई पडती है. परमात्मा का नशा शेष सारे नशों को तोड़ देता है, इसका लक्षण है जागरण. परमात्मा को पाने की स्थिति कोई रूखी-सूखी नहीं है. यह प्रेम से भरी है. यह हरी-भरी है. यहाँ नाद है, गुंजन है. यह संपदा इतनी बड़ी है कि अहोभाग व्यक्त करना भी ओछा लगता है. तब मौन ही एक मात्र सहारा रह जाता है. यह मौन अपने भीतर बहुत कुछ छिपाए है. यह उदासीनता नहीं है, यह पूर्ण तृप्ति है. अब कुछ कहना शेष नहीं रह गया, कुछ पाना नहीं, कुछ जानना नहीं, कुछ जताना भी नहीं. बस गूंगे की मिठाई की तरह भीतर ही भीतर उस रस का अनुभव करते जाना. यह जग नहीं समझता क्योंकि जिसने पाया है वही तो जानेगा.


Monday, September 8, 2014

भीतर एक अछूता देश

मार्च २००७ 
क्रिया और पदार्थ दोनों से परे है आत्मा, हम कितना भी जप, तप, ध्यान आदि करें, सब मन व बुद्धि के स्तर तक ही रहेगा तथा पदार्थ तो वहाँ तक भी नहीं ले जाते जहाँ से मन व बुद्धि लौट-लौट आते हैं. वह अछूता प्रदेश है. वहाँ कुछ भी नहीं है, न कोई करने वाला न क्रिया, न दृश्य न द्रष्टा, केवल शुद्ध चेतना ही वहाँ है. वही शुद्ध चेतना, परमात्मा या आत्मा कहलाती है. वही चेतना जब संसार की ओर मुड़ती है तो जीवात्मा कहलाती है.