Friday, September 11, 2026

विसर्जन


विसर्जन 

राजमहल में ‘गणेश उत्सव’ की तैयारी हर वर्ष की तरह ज़ोर-शोर से चल रही थी। राज्य के मुख्य मंदिर से निकाल कर मूर्ति को दालान में रखा जाता था और उसकी सार्वजनिक पूजा होती थी। दस दिनों के बाद उसे पुनः मंदिर में स्थापित कर दिया जाता था। सदा से ऐसा ही होता आ रहा था। किंतु इस बार देश का वातावरण बदला हुआ था। आज़ादी का संग्राम धीरे-धीरे ज़ोर पकड़ रहा था। यह ज़रूरी था कि सभी जातियों के लोग इसमें भाग लें। महामंत्री ने पेशवा से कहा, जन सैलाब उमड़ा चला आ रहा है, सभी के भीतर गणपति के दर्शनों का उत्साह है। जनता अपने अधिकारों के प्रति जाग रही है, ऐसे में केवल कुछ लोगों को ही दर्शन के लिए आने देना उचित नहीं होगा। पेशवा ने मंज़ूरी दे दी, और उस वर्ष जनता बिना किसी भेदभाव के गणपति उत्सव में सम्मिलित हुई। अब दसवाँ दिन आ गया था, जब पुरानी प्रथा के अनुसार मूर्ति को पुनः उसके मूल स्थान पर ले जाना था। किंतु पंडितों ने कहा, दर्शन के समय मूर्ति को स्पर्श करने वालों में हर जाति के लोग थे, अब मूर्ति पवित्र नहीं रह गयी है, इसे मंदिर में स्थापित नहीं कर सकते। समस्या गंभीर थी, पेशवा के समझाने पर भी नियम के पक्के पंडित मान नहीं रहे थे।अंततः इसका उपाय खोजा गया विसर्जन में, पंडितों ने कहा, इस मूर्ति को जल में विसर्जित कर दिया जाये और मंदिर में दूसरी मूर्ति की स्थापना हो। उस वर्ष के बाद ही मूर्ति विसर्जन की प्रथा का सूत्रपात हुआ।   


Friday, September 4, 2026

शिक्षक दिशा दिखाते जग को

हर नया दिन अपने साथ एक नयी प्रेरणा और नया संदेश लेकर आता है। आज शिक्षक दिवस है, बचपन से लेकर आज तक न जाने कितने ही शिक्षकों ने हमारे जीवन को गढ़ा है। सर्वप्रथम हमारे दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता और भाई-बहन हमारे शिक्षक होते हैं,। जीवन की पहली पाठशाला अर्थात घर,  जो भी संस्कार बालमन पर डालता है, वह जीवन भर उसके साथ रहते हैं। ईमानदारी, सत्य, पुस्तकों से प्रेम, भक्ति, सेवा और अनुशासन का जो बीज बचपन में माता-पिता बच्चे के मन में रोपते हैं, उसी को शिक्षक अपने स्नेह से सींचते हैं। स्कूल और कॉलेज में जो शिक्षा दी जाती है, वह मात्र आजीविका प्राप्त करने के लिए सक्षम बनाने की नहीं होती, वह जीवन में अपने पैर थिर करके खड़े होने की शक्ति भी प्रदान करती है। आज उन सभी शिक्षकों के प्रति आदर व सम्मान व्यक्त करने का दिन है, जिन्होंने अपने ज्ञान और प्रेम से हमारे मनों को प्रशस्त किया है। आज समाज में शिक्षा एक व्यापार बनती जा रही है,।मंहगे स्कूलों में जाने वाले बच्चे स्वयं को एक अभिमान से भर लेते हैं और उनके वे साथी जो ऐसे स्कूलों में नहीं पढ़ सकते, हीनभावना का शिकार हो जाते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस काल में आज शिक्षक की भूमिका भी बदल रही है। किंतु कंप्यूटर से कितनी भी सही जानकारी मिल जाये, एक शिक्षक की सजग दृष्टि विद्यार्थी के ह्रदय की भावनाओं को समझ लेती है, और बिना मानवीय स्पर्श से प्राप्त की गई उच्च से उच्च शिक्षा व्यक्ति को एक संवेदनशील नागरिक नहीं बना सकती।  

कृष्णम् वन्दे परमानन्दम वंदेहम्

आज कृष्ण जन्माष्टमी है। पाँच हज़ार वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण इस धरती पर आये और आज तक अपने अनंत प्रेम व अनंत ज्ञान की वर्षा में भिगो रहे हैं। उनका जन्म व हर कर्म दिव्य था, इसलिए आज भी हम उनके प्रेम को अनुभव करते हैं। कृष्ण कितने विनम्र थे, इसका भान उनके  जीवन की कितनी ही घटनाओं से मिलता है। राजसूय यज्ञ में वह अपने लिए जो कार्य चुनते हैं, वह था, यज्ञ में पधारे ब्राह्मणों और अतिथियों के पैरों का प्रक्षालन और उनकी जूठी पत्तलें उठाना। कृष्ण इतने पूज्य और सम्मानित थे कि उनकी अग्रपूजा की गयी थी, फिर भी उन्होंने अपने लिए ये कार्य चुने। ऐसा करके उन्होंने यह संदेश दिया कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। कार्य का महत्व उसके पीछे के भाव से होता है, उनके ह्रदय में सभी के लिए अथाह प्रेम था, जिसे व्यक्त करने के लिए उन्होंने सेवा के ये कार्य चुने। कृष्ण को हम ब्रह्मांड का स्वामी मानते हैं, सृष्टि का कारण मानते हैं, पर वह स्वयं को गोपियों व ग्वालों के प्रेम का ऋणी मानते हैं। उनसे प्रेम करना मानो स्वयं को उनके आत्मीयों में शामिल कर लेना है। सारी प्रकृति उनसे प्रेम करती है, वे स्वयं गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं। यमुना नदी, कालिया नाग, कदंब का वृक्ष, गौएँ और बंदर सभी तो उनकी लीला में शामिल हैं। हज़ारों वर्षों से कृष्ण की कथा ने कवियों और भक्तों के दिलों को आकर्षित किया है और यह आकर्षण बढ़ता ही जा रहा है। 

Thursday, August 27, 2026

मन को जिसने जान लिया है

जब कोई ध्यान करता है तो उसे महसूस होता है, मन बहुत भागता है। भागते हुए मन में उष्णता है, जीवन है, तभी मन भागता है। विरोधात्मक मूल्य एक दूसरे के पूरक हैं। स्थिर रहना और भागना दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। हमें भागते हुए मन के साथ भागना है।मन को भगाने से वह स्थिर हो जाता है, रोकने की चेष्टा से भागता है। जब मन भागता है, शरीर असहज होता है, बेचैन होता है। कोई भी बीज जब फूटता है तो दो तरफ़ से  फूटता है। बेचैनी का एहसास है, तो जीवन है। बेचैनी इसलिए है कि हम चाहते हैं, सब जल्दी हो जाए। आदमी के सामने कई चुनाव होते हैं, इसके कारण वह भ्रम में पड़ जाता है। भ्रम से दूर होने के दो उपाय हैं, या तो उसे स्वीकार कर लें या उसे छोड़ दें. बुद्धि हो तो भ्रम भी होता है ।बेचैनी से शरीर में व्यर्थ की क्रिया होती है। यह स्वाभाविक है, लेकिन यही प्रगति की निशानी है।मन में भ्रांति होना भाग्यशाली है। आज मैं बहुत उलझन में हूँ, जब ऐसा प्रतीत हो तो आप लक्ष्य के निकट ही हैं। भ्रम अनंत आकाश की तरफ़ खोल देता है। गुरु के पास खुला आसमान है। भ्रम छूटने के लिए भ्रम होना भी ज़रूरी है। भ्रांति भी एक शक्ति है। घूमता हुआ अग्नि का बिंदु, गोला लगता है। घूमता हुआ मन भी कुछ और लगता है। एक पड़ाव छूटा, दूसरी तरफ़ चल पड़ा।  खाली होते ही अपने में स्थिर हो जाता है। हमारे पास तीन शरीर हैं,  पहला भौतिक या स्थूल शरीर। दूसरा विचार व भावनाओं से बना है, सूक्ष्म शरीर।सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर से एक डेढ़ फ़ुट बड़ा है ।वहाँ बिना इन्द्रियों के काम होता है। तीसरा कारण शरीर चैतन्य से बना है। बुद्धि और शक्ति से बना है। गहरी नींद और ध्यान में हम कारण शरीर में होते हैं। जिससे आनंद व शक्ति मिलती है। 

Wednesday, August 19, 2026

शक्ति केंद्र जब जागेंगे भीतर

विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन यदि कोई है तो वह 'योग' है। योग हमें अपने भीतर केंद्रित होना सिखाता है। मानव के भीतर जो सुप्त शक्तियाँ हैं, उन्हें जगाने का उपाय बताता है। मानव देह में मूलाधार पर स्थित चक्र या केंद्र पर एक सकारात्मक व एक नकारात्मक, उत्साह और आलस्य, ये दो भाव विद्यमान हैं। आलस्य सभी को सहज ही प्रकृति द्वारा दिया गया है, उत्साह बीज रूप में विद्यमान है। इसीलिए हम आज के काम को कल पर टाल देते हैं। जब तक डेड लाइन न दी जाये, लोग काम पूरा नहीं करते। परीक्षा सिर पर न हो तो विद्यार्थी पढ़ाई नहीं करते। आलस्य का अर्थ है देह में ऊर्जा की कमी का अनुभव हो रहा है। योग के द्वारा ऊर्जा प्राप्त करके मन में उत्साह के बीज को अंकुरित करके इसे जगाया जा सकता है। इसी तरह स्वाधिष्ठान केंद्र पर भी दो भाव हैं, कामनायें तथा सृजन। यदि हम अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति में ही लगे रहेंगे तो सृजन की क्षमता बीज रूप में सुप्त रहेगी। योग के द्वारा हम इस शक्ति को भी जगा सकते हैं। कला, संगीत व साहित्य की तरफ़ यदि आपका रुझान कम है तो योग साधना के बाद वह सहज ही जगने लगेगा। मणिपुर चक्र पर ध्यान करके उदारता व मुदिता के बीजों को को जगाया जा सकता है, वरना प्रकृति से प्राप्त ईर्ष्या व लोभ की भावना जीवन भर दंश देती रहेगी। ह्रदय के केंद्र पर प्रेम जगता है तो साधक को सारे विश्व के प्रति अपनापन महसूस होता है। इस केंद्र पर प्रकृति ने हमें भय की भावना दी है, जो अपने अस्तित्त्व की रक्षा के लिए आवश्यक है, किंतु यदि हृदय में केवल भय ही भय हो तो तो व्यक्ति का पूरा विकास कैसे संभव हो सकता है। प्रेम का बीज फले-फूले इसके लिए योग साधना सहायक है। विशुद्धि चक्र पर प्रकृति ने दुख का भाव अनुभव करने की क्षमता दी है, जब कोई दूर जा रहा हो तो गला भर आता है, रोते समय गला रूँध जाता है। कृतज्ञता की भावना यहाँ बीज रूप में दी गई है, जिसे जितना बढ़ाया जाएगा, जीवन में समृद्धि बढ़ती जाएगी। आज्ञा चक्र पर क्रोध स्वाभाविक भावना है, लेकिन सजगता का बीज हमें रोपना है। तभी सहस्रार पर ऊर्जा का फूल खिलकर चारों ओर अपनी सुगंध फैलाएगा। यही योग का लक्ष्य है। 

Sunday, August 16, 2026

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं

आज यह विचार करने की बहुत ज़रूरत है कि वास्तव में स्वाधीनता क्या है? क्या राजनीतिक रूप से स्वाधीन देश में निवास करने मात्र से हम स्वयं को स्वाधीन मान सकते हैं ? जब तक हम मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं होते, स्वाधीनता भ्रम ही बनी रहती है। किसी का मन यदि भय से ग्रस्त है, दूसरों से तुलना करता है, सदा कुछ न कुछ पाने की फ़िराक़ में लगा रहता है, तो वह मन परतंत्र ही कहा जायेगा। जब हम भीतर अतृप्त बने रहते हैं, जीवन की दौड़ में स्वयं को पिछड़ गया मानते हैं, तो हम उस मानसिकता के ग़ुलाम हैं, जो जीवन को एक संघर्ष में बदल देती है। जीवन एक कला है, कोई युद्ध नहीं। जिस भी परिस्थिति में किसी को रखा गया है, वह उसके विकास के लिए कोई न कोई रास्ता अवश्य दिखाती है। किंतु जो मन मुक्त नहीं है, वह इस खुले द्वार को देख ही नहीं सकता। जीवन हमारे चारों ओर हवा और धूप की तरह बिखरा है, लेकिन हम उसकी ओर नज़र नहीं उठाते। जीवन ऊर्जा श्वासों के रूप में दिन-प्रतिदिन क्षीण हो रही है, उसकी भरपाई के रूप में हमारे ऋषियों ने ध्यान-प्राणायाम की अद्भुत विद्या सिखायी है। जिसके द्वारा हम जीवन के स्रोत से जुड़ सकते हैं और स्वयं के भीतर मुक्ति का द्वार पा सकते हैं। मृत्यु यदि जीवन का अंत है तो जीवन, मृत्यु का भी अंत हुआ। इस रहस्य को भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं। आत्मा शाश्वत है, आत्मा ही वह जीवन है जो मृत्यु का अंत है। ध्यान में हम उसी आत्मा का अनुभव करते हैं, वहीं सच्ची मुक्ति का अहसास होता है। वहाँ कोई दूसरा नहीं है, इसलिए भय, तुलना, आगे-पीछे, छोटा-बड़ा भी कुछ नहीं है। वहाँ हर व्यक्ति स्वतंत्र है, तब स्वयं पर शासन करने की विधि ज्ञात होती है। हमारे शास्त्र हमें इसी मोक्ष की याद बार-बार दिलाते हैं। 

Monday, August 10, 2026

जीवन एक यात्रा सुंदर

जीवन एक यात्रा है, एक ऐसी यात्रा जिसमें हर पड़ाव पर कुछ बोझ हल्का होता जाता है। कितना सारा सामान उठाकर यात्री घर से निकलता है, पर मार्ग में उसे जिन-जिन वस्तुओं की ज़रूरत पड़ती जाती है, वे समाप्त होती जाती हैं और धीरे-धीरे गठरी हल्की होने लगती है। जिस स्थान पर यात्री को जाना है, वहाँ सब कुछ है, वहाँ कुछ भी ले जाने की ज़रूरत नहीं है। जो भी उसे चाहिए, केवल रास्ते के लिए है। अन्तिम लक्ष्य आने से पहले न जाने कितने पड़ावों से होकर उसे गुजरना है। बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था, पढ़ाई, विवाह, नौकरी, सेवा निवृत्ति, धर्म, अध्यात्म, सेवा, रुचियाँ, कलाएँ, संगीत, मनोरंजन, भक्ति, प्रेम, घृणा, ईर्ष्या, सत्य, असत्य, जागरण, निद्रा, स्वप्न, कर्म, ज्ञान, अध्ययन, प्रयत्न, व्यायाम, विश्राम, ध्यान, योग और भी न जाने कितने पड़ाव उसके जीवन में आते हैं। हर जगह अपने पूर्व कर्मों के अनुसार वह देर-सेवर पहुँचता है, अपनी सामर्थ्य और रुचि के अनुसार हर पड़ाव पर नये कर्म करता है, नये कर्मफल बाँधता है। जो आगे की यात्रा में उसके काम आयेंगे। कर्मफलों की गठरी बाँधे वह चलता रहता है। जब तक इनकी समाप्ति नहीं होगी, यात्रा जारी रहेगी। इनका निपटारा ही यात्रा का अंत है। यह जन्मों-जन्मों की यात्रा है। यदि नये कर्म न करे, पुराने कर्मों के फलों को अनासक्त भाव से सह ले। हर सुख-दुख को साक्षी भाव से देखकर आगे बढ़ जाये तो धीरे-धीरे उनका बोझ कम होता जाता है, वह हल्का हो जाता है, ख़ाली हो जाता है और यही तो घर जाना है! 

Saturday, August 8, 2026

जीवन में जब ध्यान सधेगा

यदि जीवन में संतुलन हो, तो हर बाधा को आसान से पार किया जा सकता है। वर्तमान जीवन में गति है, पर ठहराव नहीं है। ऐसे में ध्यान एक ऐसा उपाय है जो भीतर संतुलन लाता है। ध्यान का प्रभाव डीएनए स्तर तक होता है. यह शरीर में कोर्टिसोल के स्तर को कम करता है और सेरोटोनिन व ऑक्सीटोन का स्तर बढ़ाता है. ध्यान मन को शांत करने की या कुछ भी न करने की कला है। जिसमें मन सरलता से एक गहरे मौन में डूब जाता है।यह गति से स्थिरता की और शब्द से नि:शब्द की यात्रा है। ध्यान मन को नियंत्रित करना नहीं है, न ही किसी एक बिंदु पर मन को एकाग्र करना है बल्कि मन के विचारों का साक्षी भाव से अवलोकन करना है।जिससे साधक सहज ही विचारों के पार चला जाता है और एक गहरे विश्राम का अनुभव करता है। वह अपने भीतर स्थित चेतना से जुड़ जाता है और सहज ही आनंद का अनुभव करता है। जब मन शांत और सहज होता है तो बुद्धि अति श्रेष्ठ निर्णय लेने की स्थिति में होती है और भविष्य की योजना बना सकती है। ध्यान चित्त को अतीत में पश्चाताप और भविष्य की आशंका से मुक्त करता है।







Sunday, August 2, 2026

हर विभूति का स्रोत एक है

एक चित्रकार, लेखक, कवि या शिल्पी मूलतः सृष्टा होता है। उसके लिए कला का सृजन कर पाना ही अपने आप में मुख्य बात है, न कि उससे किसी तरह का लाभ, नाम, यश या धन कमाना। सभी कलाएँ कलाकार के माध्यम से प्रकट भर हो रही हैं, उनके पीछे प्रेरक तत्व तो एक वही है। कलाओं का सृजन एक उसी स्रोत से होता है। कृष्ण भगवद् गीता में कहते हैं, जगत में जो कुछ भी सुंदर, शक्तिशाली, ज्ञानवान या श्रेष्ठ है, वह उन्हीं का अंश है। किसी व्यक्ति में नेतृत्व क्षमता या कला सृजन की क्षमता है तो वह ईश्वर की दिव्य शक्ति का ही एक रूप है। हर किसी की योग्यता ईश्वर द्वारा दिया गया एक उपहार है। इस धारणा के अनुसार चलने से मन में समता की भावना बढ़ती है।व्यक्ति के अहंकार का नाश होता है और वह सुख-दुख के पार चला जाता है। मन में सागर की तरह ज्वार-भाटा उठते रहते हैं किंतु आत्मा सदा असंग है। मन चंद्रमा की तरह घटता-बढ़ता है पर आत्मा आकाश की तरह निरंजन है। 

Tuesday, July 28, 2026

गुरुतत्व जागे जब भीतर

 गुरु पूर्णिमा के अवसर पर 

गुरुतत्व उस बोध को कहते हैं, जो यह बताता है कि शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चेतना ही एकमात्र सत्य है। यह जगत दर्पण में दिख रहे नगर की भाँति है;अथवा तो जगत वह स्वप्न है जिसे हम खुली आँखों से देखते हैं। न जाने कितनी देहें हमने ग्रहण कीं और कितनी बार मृत्यु ने इस स्वप्न को तोड़ दिया, किंतु पुनः जैसे नींद में ही हम नयी देह लेकर एक नया स्वप्न देखने लगते हैं। आत्मा एक है, वह भिन्न-भिन्न उपाधियाँ ग्रहण करती है, पर स्वयं सदा पूर्ण बनी रहती है। जैसे सागर में हज़ारों लहरें उठती हैं पर जल तत्व वैसा ही बना रहता है। अज्ञान दशा में जीव सुख-दुख, मान-अपमान आदि में अपना जीवन बिताता है पर जब गुरुतत्व भीतर प्रकट होता है तो वह आनंद के एक महासागर में निमग्न हो जाता है और जीवन मुक्त रहकर जगत में अपने कर्त्तव्य निभाता है। 

Wednesday, July 22, 2026

जीवन में जब योग सधेगा

योग की परंपरा हज़ारों वर्ष पुरानी है, पर आज भी जीवंत है क्योंकि समय के साथ उसमें परिवर्तन होते रहे और सामान्य जन के मध्य भी उसकी लोकप्रियता बनी रही। प्राचीन काल में हर बार संध्या वंदन के समय ध्यान भी किया जाता था। यह जीवन का एक अंग था, इसके लिए अलग से आयोजन करने की आवश्यकता नहीं थी, किंतु कालान्तर में ध्यान केवल विशेष साधना का अंग बन गया। इसका परिणाम यह हुआ कि मानव अपने आपसे दूर होता गया। वास्तव में हर मानव भौतिक व आत्मिक दोनों का मेल है, पर आज आत्मा की बात करने पर लोग इस तरह देखते हैं, जैसे किसीभूत की बात हो रही हो। देह के भीतर जो चैतन्य शक्ति है, वही तो आत्मा है, जब वह विश्राम में होती है, तब उसकी उस अवस्था को ध्यान कहते हैं और जब वह विचार या ज्ञान प्राप्त करने में लगी होती है, तब उसे मन या बुद्धि कहते हैं। हमारे भीतर जहाँ से 'मैं हूँ' की अनुभूति होती है, वह जीव है, जीव जब यह जान लेता है कि वह आत्मा  से अलग नहीं है, वह आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। जब तक कोई योग को अपने जीवन का अंग नहीं बना लेता, वह इस तथ्य से अनभिज्ञ ही रहता है और स्वयं को देह, मन व बुद्धि मानकर संसार में सुख-दुख के झूले में झूलता रहता है। जब योग के द्वारा मन, बुद्धि व अहंकार अपने स्रोत से जुड़ जाते हैं, तब पहली बार ऐसे आनंद की अनुभूति होती है, जिसका कोई कारण नहीं है। तब जीवन में आने वाली कोई भी परिस्थिति प्रभावित नहीं करती। 

Sunday, July 19, 2026

मन जब भीतर मुड़ जाएगा

 मानव की दृष्टि सदा बाहर की तरफ़ रहती है। सभी इंद्रियाँ मन को बाहरी जगत की खबर देने के लिए तत्पर रहती हैं। जरा कहीं खटका हुआ, कान उधर मुड़ जाते हैं, जरा कहीं सुगंध की लहर आयी, नासिका सजग हो जाती है। इस तरह हमारी सारी ऊर्जा जो हम भोजन और नींद से प्राप्त करते हैं, जगत का ज्ञान प्राप्त करने में ही व्यय होती रहती है। ऐसे में जब कोई ध्यान करने के लिए कहता है, तो आधे घंटे के लिए भी शांत होकर इंद्रियों को भीतर की ओर मोड़ने का अभ्यास नहीं सध पाता। उस समय भी मन बाहर की ओर ही जाता है, बंद आखों से ही हम कल्पना में देख लेते हैं कि शायद दरवाज़े पर कोई आया है। अथवा सुगंध बता रही है कि आज खाने में क्या बना है। इस तरह भीतर जाने का एक और अवसर निकल जाता है। इसलिए ध्यान में बैठने से पहले ही मन को यह समझा देना चाहिए, कि उसे अगले कुछ समय तक केवल देह के भीतर चल रहे कार्य-कलापों पर भी ध्यान देना है। सबसे पहले श्वास पर ध्यान टिकाना है, इसके बाद नासिका के आगे के स्थान पर। इस तरह इंद्रियाँ कुछ देर के लिए शांत रहना सीख जायेंगी और यह भी समझ जायेंगी कि हर समय हमें उनकी ज़रूरत नहीं है, आख़िर गहरी नींद में भी तो मन जगत से विमुख होता है।वास्तव में ध्यान जागते हुए नींद में रहना ही है, जब मन जागे-जागे सोया हुआ है, वही ध्यान है। ऐसे में मन स्वयं को देख पाने में समर्थ होता है, वरना तो वह जगत को देखने में ही लगा रहता है।  

Friday, July 17, 2026

मन के पार ही वह मिलता है

जगत में सब कुछ दो पर टिका है, दिन-रात, सुख-दुख, आना-जाना, जन्म-मृत्यु!! मन भी इसी जगत का भाग है, वह दो के बिना रह ही नहीं सकता, जहाँ दो मिटते हैं, वहाँ मन, अमन हो जाता है। इसलिए जगत में इतनी अशांति है, क्योंकि मन को अमन बनाने की सहज कला ही मानव भूलता जा रहा है। प्रकृति के सान्निध्य में सहज ही मन थिर हो जाता है, इतना बड़ा आकाश और इतनी बड़ी धरती देखकर मन उतने समय के लिए एक में टिक जाता है। ईश्वर, गुरुजन अथवा बड़ों के आगे झुकते हुए भी मन एक हो जाता है, हाथ जोड़ते हुए भी उसी एकत्व का अनुभव होता है। शुद्ध प्रेम का स्वाद लेना हो तो मन को एक होना सीखना होगा। जहाँ तुलना होगी, स्पर्धा और ईर्ष्या होगी, वहाँ मन बँटा रहेगा। जहाँ बिखराव है, दूरी है, वहाँ दुख है, पीड़ा है। इसलिए योग के पथ पर चलना हरेक के लिए कितना आवश्यक है। कोई संगीतज्ञ, कवि, कलाकार या मूर्तिकार इस एकत्व का अनुभव करके आनंदित होता है, और उस आनंद को अपनी कला के माध्यम से जगत में प्रसारित करता है। संत अपने भीतर हर क्षण एकत्व का अनुभव करता है, सारा ब्रह्मांड उसे एक जीवित इकाई प्रतीत होता है। उसका मन आत्मा के रस में डूबकर आत्मा ही बन जाता है, जैसे रस में डूबा रसगुल्ला रस ही बन जाता है, या आग में पड़ा लोहा आग ही बन जाता है। 

Wednesday, July 15, 2026

मुक्ति की यदि चाह है भीतर

सत्य के साधक को हर तरह से आत्मनिर्भर होना है। अपने जीवन में आने वाले हर सुख-दुख का उत्तरदायित्व स्वयं पर लेना है। इस जगत में कोई किसी को आराम तो पहुँचा सकता है, पर सुखी तो भगवान भी नहीं कर सकता। इसलिए अपने सुख के लिए किसी पर निर्भर होना या किसी अन्य को अपने दुख के लिए ज़िम्मेदार मानना ऐसा ही है, जैसे पानी को तलवार से काटना। किसी के पास सारे ऐशो-आराम हों किन्तु यदि उसे अपने सुख के लिए किसी का मुँह देखना पड़ता है तो वह उसका ग़ुलाम है। सबसे बड़ी आज़ादी है, अपने सुख के लिए स्वयं पर निर्भर होना। दुनिया की किसी भी वस्तु का मोहताज न होना पड़े, किसी भी व्यक्ति और किसी भी परिस्थिति को अपने दुख के लिए ज़िम्मेदार मानने की भूल न करे तभी  इस पथ में वह आगे बढ़ सकता है। इस जगत में आज तक न कोई किसी को उसकी मर्ज़ी के बिना सुखी या दुखी कर सका है, न ही कर पाएगा। इसीलिए कृष्ण ने भगवद् गीता में जगत से मिलने वाले सुख-दुख, हानि-लाभ व जय-पराजय में व्यक्ति को समता में टिके रहने को कहा है। जो समता में स्थित होना सीख जाता है, वह मुक्ति की ओर कदम बढ़ा ही चुका है। 

Monday, July 13, 2026

करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान

 जब सत्य की अभीप्सा भीतर जगती है, जीवन को एक दिशा मिल जाती है। इसके पूर्व मानव का लक्ष्य भौतिक जीवन को सुंदर, सुविधापूर्ण और सुखी बनाने तक ही सीमित रहता है। किंतु भौतिक जीवन को कितना भी बेहतर बनाओ, इधर-उधर कोई न कोई कमी सालती ही रहती है। कभी आपसी मेलज़ोल ठीक बना नहीं रह पाता। संबंधों में अहंकार आड़े  आ जाता है तो कभी रूप, धन या यश की कमी खलती है। कहते हैं न कि, किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता,  कभी जमीं तो कभी आसमां नहीं मिलता! इसके विपरीत जब जीवन में एक उच्च लक्ष्य मिल जाता है, तब छोटी-मोटी बातें प्रभावित ही नहीं करतीं। संतों की वाणी जैसे एक नयी दुनिया के दरवाज़े खोल देती है। दृष्टि बाहर से मुड़कर भीतर की तरफ़ जाती है। पहले-पहल तो भीतर कुछ भी नज़र नहीं आता। बल्कि अनगढ़ और अस्त-व्यस्त विचारों की एक दुनिया ही सामना करती है। किंतु सतत अभ्यास से एक दिन मन स्थिर होने लगता है और स्वयं के प्रति कुछ भरोसा जगता है। योग के प्रति रुचि भी जागती है और अपनी दिनचर्या में उसे समुचित स्थान मिल जाता है। 

Sunday, July 12, 2026

जागे जब अभीप्सा मन में

जीवन प्रतिक्षण नये रूप में सम्मुख आता है। मौसम बदलते हैं तो चर्या भी बदल जाती है, मन भी बदल जाता है। विश्व की राजनीति का असर एक छोटे से गाँव में रह रहे किसान को भी झेलना पड़ता है। उसी तरह हर व्यक्ति के कर्म का असर पूरे संसार पर पड़ता है। कर्म चाहे मानसिक हो या भौतिक, उसकी तरंगें दूर-दूर तक फैल जाती हैं। यदि कोई समाज योग और अध्यात्म में रुचि रखता है तो निश्चय ही उसके आसपास का वातावरण शांति से भरा होगा। जहाँ भाषा की शुद्धता व सौम्यता का ध्यान रखा जाता हो, उस परिवार में आपसी कलह व द्वेष पनप ही नहीं सकते। जिस संस्था का प्रमुख अपने कृत्यों से आत्मीयता का वातावरण पैदा करे, वहाँ विकास सहज ही होता है। इसी प्रकार जहाँ मार्गदर्शन विद्वत्जनों, लेखकों साहित्यकारों का सम्मान होता है, लोग उनकी बात को सुनते हैं और उसका आदर करते हैं, वह समाज आगे बढ़ता है। यदि कोई अपने जीवन में सार्थकता का अनुभव करना चाहता है तो उसे निरन्तर ऊँचाई की तरफ़ देखना होगा, अपने सम्मुख उच्च आदर्शों को बनाये रखना होगा।छोटे-छोटे कदम उठाकर भी एक दिन उस मंज़िल को पाया जा सकता है, जिसकी अभिलाषा अंतर की गहराई में प्रायः सुप्त अवस्था में ही बनी रहती है। उस अभीप्सा को जगाना ही साधक का प्रथम कर्त्तव्य है। 

Monday, April 13, 2026

भावलोक के पार गया जो


भावलोक के पार गया जो


मन का स्वभाव है नीचे की ओर बहना, यह पानी की तरह तरल है। बुद्धि का स्वभाव है ऊपर की उठना, यह अग्नि की भाँति तेजपूर्ण है। इसलिए मन के लिए नदी की तरह बहते रहने की प्रार्थना की जाती है, रुका हुआ मन, एक ही बात पर अटका मन, पोखर में रुके पानी के समान दूषित हो जाता है। बुद्धि के लिए सूर्यदेव से प्रार्थना की जाती है। जैसे प्रकाश में सभी कुछ स्पष्ट दिखायी देता है। प्रखर बुद्धि में अपने दोष व कमियाँ स्पष्ट दिखायी दें, जिससे ठोकर खाने व दुख उठाने के अवसर न आयें। बुद्धि के पार ही भावलोक है, भावना से युक्त हुआ मन-बुद्धि जीवन में सरसता का अनुभव करता है, अन्यथा सब कुछ रुखा-सूखा सा प्रतीत होता है। भावना से परे आत्मा का लोक है जहाँ केवल प्रकाश ही प्रकाश है।


Tuesday, February 3, 2026

तेन त्यक्तेन भुंजीथा

तेन त्यक्तेन भुंजीथा

परमात्मा हर पल हमारे मन का द्वार खटखटाता है, हम कभी खोलते ही नहीं। वह तो स्वयं प्रकट होने को आतुर है, वह प्रतिपल बरस रहा है, उसे देखने की नजर भीतर पैदा करनी है। चेतना का आरोहण करना है, भीतर जो अनंत ऊर्जा है उसे एक आकार देना है। जो स्वयं के प्रतिकूल हो वह कभी किसी दूसरे के साथ भूलकर भी नहीं करना है, क्योंकि दूसरों को दिया दुःख अंततः अपने को ही दिया जाता है। हमें अपनेहोनेकी सत्ता को सार्थक करना है, अपने होने के प्रयोजन को सिद्ध करना है।हम अपनी पूर्ण क्षमता को विकसित कर सकें, जो बीज में सुप्त है, वह फूल बन कर खिले। जीवन का अर्थ क्या है, इसे जानें। हम किस निमित्त हैं, हम किसका माध्यम हैं, किसके यंत्र हैं, किसके खिलौने हैं, इस विशाल आयोजन में हमारा भी योगदान हो। हमारेपास जो भी है, देह, मन, बुद्धि सभी उसके काम आ जाये, हम उसके सहचर बन जाएँ। सन्नाटे में भी जो हमारे साथ रहता है, अँधेरी स्याह रात्रि में, निस्तब्धता में भी जो हमारे निकटतम है, उसके हाथ में स्वयं को सौंप कर निश्चिन्त हो जाना है।जिसे ऐसी प्रसन्नता चाहिए जो अपह्रत न हो सके, खंडित न हो सके, बाधित न हो सके, उसे अपना अंतःकरण अस्तित्त्व के प्रति खोल ही देना होगा।  समता, स्थिरता, संतुलित रहना ये सभी तो सहजता से मिलते हैं। समाधान साथ-साथ चलता रहे तो अंतःकरण मोद से भरा रहता है। जो संकल्प को छोड़ना जानता है, वही उसे सिद्ध भी करता है, जो त्यागना सीख गया, वह सब पाना सीख गया!

Friday, January 23, 2026

बुद्धियोग जब सध जाएगा


मैं मेरे का भाव उत्पन्न करने वाली, राग-द्वेष पैदा करने वाली, एक दायरे में सीमित करने वाली तथा अखंड तत्व के प्रति उदासीन रहने वाली चार तरह की बुद्धियाँ अनर्थकारी हैं। ऐसी बुद्धि, जो ईश्वरीय ऐश्वर्य का अनुसन्धान करने वाली हो, प्रकृति के रहस्यों को समझने वाली, उसको सराहने वाली हो, अर्थकारिणी है। ईश्वर का सौन्दर्य चारों ओर बिखरा पड़ा है। ब्रह्मांड के असंख्य नक्षत्रों, ग्रहों, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी और पृथ्वी पर बर्फीले पर्वत, नीला सागर, हरियाली, विशाल वन संपदा उसके ऐश्वर्य के रूप में हमें  प्राप्त है और उसका वैभव मीठे फलों, पंछियों की बोली और जीवन के पोषक तत्वों के रूप में हमें प्राप्त है।



Thursday, September 25, 2025

पल-पल जब यह याद रहेगा

पल-पल जब यह याद रहेगा 

जीवन वैसा ही बन जाता है, जैसा हम उसे बनाते हैं। जीवन में हास्य, मधुरता, प्रेम और रस हो ऐसा कौन नहीं चाहता ? किंतु इन्हें दिन-प्रतिदिन जीवन में पिरोना पड़ता है। सुमधुर संगीत सुनें तो मन स्वयं ही ठहर जाता है। अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करें तो मन रस का अनुभव करता ही है। अस्तित्त्व के साथ एकता का अनुभव प्रेम की एक सहज अवस्था में ले जाता है। जीवन में एक लय, अनुशासन और प्रवृत्ति व निवृत्ति में एक सामंजस्य बना रहे तो हास्य की कमी नहीं रहती। हर पल जीवन हमें न जाने कितने अनमोल उपहार दे रहा है।उसके प्रति कृतज्ञता की भावना हमें भीतर से तृप्त करती है। देवी माँ की आराधना के यह नौ दिन हमें इसी बात का स्मरण कराने आते हैं।