Monday, September 10, 2012

मन हो जैसे खुला गगन



मन की कामनाओं की पूर्ति के लिए हम परिस्थितियों के गुलाम बन जाते हैं, सब कुछ होते हुए भी अभाव का अनुभव करते हैं, किसी के पास भोजन हो, वस्त्र हों, और घर हो फिर उसे क्या चाहिए, लेकिन मन इच्छाएं खड़ी किये जाता है और उसमें जो बाधा डालता है उस पर क्रोध जगाता है, सूक्ष्म अहंकार भी उसमें सम्मिलित होता है. हमें खुद पर इतना तो वश होना ही चाहिए कि वस्तुओं को उसके सही उपयोग की दृष्टि से ही आंकें. जिसका मन कभी खाली होता ही नहीं तो तन रूपी घर में रहने वाली आत्मा को कहाँ स्थान मिलेगा, वह सिकुड़ कर रहने के लिए विवश हो जाती है. जैसे ही हम अपनी सूक्ष्मतम भावनाओं के प्रति सजग हो जाते हैं, अनावश्यक अपने आप झर जाता है. मन खाली होने लगता है. तब हम ईश्वर की उपस्थिति को महसूस करने लगते हैं.उसकी याद ही मन को व्यर्थ की कामना में उलझने से बचाती है. ज्ञान भी तभी भीतर टिकता है. अखंड शांति का भाव जगता है.

Sunday, September 9, 2012

कृष्ण से कोई दूर नहीं है


अगस्त २००३ 
कृष्ण की वाणी अमोघ है, अमूल्य है, वह हमें ज्ञान का उपहार देते हैं, जिसे पाकर हम कृतकृत्य हो जाते हैं, कितने सरल शब्दों में कितनी उच्च बात वह कह जाते हैं, उनका प्रेम अनंत है, वह प्रेमस्वरूप हैं, तभी वह संसार के हर प्राणी से प्रेम करते हैं, हित चाहते हैं सभी का और जो भी उनकी शरण में जाता है, उसके कुशल क्षेम की रक्षा का भार वह स्वयं ले लेते हैं. वह जानते हैं हमारे लिये क्या उचित है क्या नहीं, वह हमारी भौतिक और आध्यात्मिक दोनों मांगों को स्वीकारते हैं, वह हमें पूरा का पूरा अपनाते हैं और स्वयं को भी पूरा का पूरा दे डालते हैं, वह कुछ शेष नहीं रखते, वह दूरी नहीं चाहते. वह प्रेम के बदले मात्र प्रेम ही चाहते हैं. वह सफलता असफलता को संसार के नजरिये से नहीं देखते. वह हमारे मन को पढ़ना जानते हैं और उसी के अनुरूप ज्ञान देते हैं. कृष्ण से हमारी निकटता भावना के स्तर पर है और आत्मिक स्तर पर भी, बल्कि वह स्वयं ही हमारी आत्मा है, तभी वह इतना अपना लगता है. उसकी आँखें देखना चाहें तो मीरा की आँखें देखनी होंगी, वह और हमारा अपना आप एक ही है, इस एकता की अनुभूति में अनोखा आनंद है, शांति है और प्रेम है. यहाँ कोई भेद नहीं, यह सहना है उस अथाह प्रेम को जो भक्त के भीतर उमड़ता है तो कचोट कर रख देता है. 

Friday, September 7, 2012

दीप जले आस्था का भीतर


अगस्त २००३ 
हमारा जीवन निरंतर एक नदी की तरह अपने मूल से निकल कर अपने मूल में ही मिलना चाहता है, नदी का उद्गम व सागर दोनों जल के ही रूप हैं. उसी तरह हम जहां से आये हैं और जहां जाना है दोनों एक ही हैं, यह बीच का समय जो हम धरा पर बिताते हैं, तैयारी का समय है, तैयारी उससे मिलने की. जन्म के समय जैसी निर्दोषता शिशु में होती है वैसी ही निर्दोषता स्वयं में लानी है, शिशु जैसे खाली होता है सारे पूर्वाग्रहों से, वासनाओं से, हमें जगत से गुजर कर, अनुभवों के बाद स्वयं को वहाँ ले जाना है, संसार की वास्तिवकता को जानकर उससे परे हो जाना है. तृष्णा की आग जब जलाये तब जाग कर देखना है, अपनी ही वाणी जब शत्रुता निभाए तब सचेत होना है, भीतर संशय जब फन उठाये तो आस्था का दीप जलाना है. कोई व्यर्थ की चिंतना चले तो पूछना है, क्या अपनी उर्जा इस काम के लिए व्यय करना ठीक है, मन जब अहंकार को लगी ठेस के कारण व्यथित हो जाये तो हँसते हुए उसे देखना है, जैसे नासमझ बच्चे की हरकतें देखकर हम हँसते हैं. आज जो विचार है कल वही वाणी में उतरेगा और परसों वही कर्म में, विचार पर ही रुक जाएँ तो बहुत सारी ऊर्जा बच जाएगी. तभी निर्लिप्त होकर हम इस जगत में रह सकते हैं. तभी उस अवस्था का अनुभव अभी कर सकते हैं जो चिन्मय है, शाश्वत है, अजर है, नित्य है, शांत है, प्रेम है, आनंद है.

Thursday, September 6, 2012

एक देश ऐसा भी है


अगस्त २००३ 
‘’हम उस देश के वासी हैं, जहाँ शोक नहीं, जहाँ आह नहीं’’, जहाँ हम जमीन से ऊपर उठ जाते हैं. जहाँ हमारा मन, मन नहीं रहता, वह शुद्ध चेतना से संयुक्त हो जाता है. जहाँ कोई रूप नहीं, आकार नहीं, जिसका कोई नाम नहीं, जहाँ समय का बोध नहीं रहता, जहाँ स्थान का भी कोई बोध नहीं रहता. जब मन बिना किसी कारण के पूर्ण आनंदित रहता है, सभी के भीतर उस ब्रह्म के दर्शन होते हैं, सभी के साथ आत्मीय सम्बन्ध प्रतीत होता है,एक अद्भुत शांति का आभास होता है तब उसी लोक की झलक मन को मिली होती है. शास्त्रों की बातें तभी समझ में आती हैं, वरना शास्त्र अपना मूल अर्थ छिपाए ही रखते थे. उन्हें पढ़कर बुद्धि से जानना और है, जीवन में उतारना और है. हम ईश्वर की ओर एक कदम बढाते हैं तो वे हजार कदम हमारी ओर बढाते हैं. वह अनंत है सो उसका हर काम अनंत है.

Tuesday, September 4, 2012

एक ही माला के सब मोती


अगस्त २००३ 
जीवन के रंग विचित्र हैं. हम सभी एक विशाल अथवा कहें अनंत सृष्टि के भाग हैं, आपस में सभी जुड़े हैं, उस परमात्म तत्व के द्वारा. वह तत्व भीतर-बाहर हर जगह है, एक सूक्ष्म तन्तु के रूप में उसने सभी को बांध रखा है. कृष्ण ने गीता में कहा ही है कि यह सारा जगत मुझ धागे में मोतियों की भांति पिरोया हुआ है. यहाँ कोई भी एक से जुदा नहीं. एक ही आत्मा सभी के भीतर है, सभी को सुख-दुःख समान रूप से व्यापते हैं. पर जो इस संसार से परे हो जाता है, वह इस जगत को परमात्मा की नाईं द्रष्टा भाव से देखता है. जो कुछ भी इस जगत में जहाँ कहीं भी, जिस किसी के साथ भी हो चुका है, हो रहा है गहराई से सोचें तो खेल ही लगता है, नाटक की तरह हम अपने पात्र निभाएं तो खेल मजेदार है और यदि उसे सच्चा मानने लगें तो बुद्धि चकरा जायेगी, पर इसका पार न पा सकेंगे. यहाँ एक को खुश करो तो दूसरे को नाराज करना ही पड़ता है. सभी को साथ लेकर चलना हो तो अंतर में शुद्ध प्रेम होना चाहिये, ऐसा विशाल हृदय जो कोई भेद नहीं मानता, मानवेतर सृष्टि से भी उतना ही प्रेम रखता है. जो वस्तुओं का गुलाम नहीं, जो जीवनमुक्त है. 

Monday, September 3, 2012

भीतर गूंजें गान अनोखे


अगस्त २००३ 
हमारी साधना का एकमात्र उद्देश्य अंतःकरण की शुद्धि है, अंतःकरण चित्त, बुद्धि, मन, अहंकार सभी को धारण करता है. सोचने की शक्ति भी यहीं है, हमारी सोच ही साधना का मार्ग तय करती है. बाह्य साधन तो मात्र तैयारी के लिये हैं. मानसिक स्थिति ही हमारी सही स्थिति को दर्शाती है. जब चित्त शुद्ध होगा तभी उसमें परमात्मा का वास होगा, अंतःकरण की शुद्धि का सबसे बड़ा साधन है अपने दोषों को देखना. सदगुरु रूपी आईने में हमें अपने दुर्गुण स्पष्ट दिखने लगते हैं, परदोष देखने की प्रवृत्ति, अधीरता, तितिक्षा की कमी, वाणी का असंयम और भी कई दोष जिन्हें हमें एक-एक कर के निकालना है, तभी चित्त शुद्ध होगा. सदगुरु इसके लिये एक सरल उपाय बतलाते हैं, जब संसार का चिंतन बंद करके हम परमात्मा का चिंतन करेंगे तो मन में विकार नहीं जगेंगे. दोष तभी आते हैं जब हम सांसारिक सुख चाहते हैं, फिर ध्यान में पूर्व संचित संस्कारों का क्षरण होगा और तब मन ठहर जाता है. भीतर मौन जगता है, उस मौन में संगीत सुनाई देता है. वह संगीत इतना सूक्ष्म होता है कि गहन मौन में ही हम उसे ग्रहण करते हैं. हमारा एक मात्र लक्ष्य यदि सत्य को जानना है तो व्यर्थ के कार्यों में स्वयं को लगाना अनुचित होगा. हमारा प्रत्येक क्षण उसी आत्मभाव को प्राप्त करने में लगे जो अमृतत्व है, जो हममें अनंत ऊर्जा का संचार करता है, जो कल्याण मय है, जो हमें आगे बढ़ते रहने को प्रेरित करता है. वही हमारा साध्य है.

Sunday, September 2, 2012

मन की मनसा मिट गयी, भरम गया सब टूट


जुलाई २००३ 
“मन की मनसा मिट गयी, भरम गया सब टूट” जब कोई आग्रह नहीं बचता, मात्र उसी को पाने का आग्रह हो, तब एक ही क्षण में सदगुरु दृश्य रूपी मैल दूर कराने की क्षमता रखते हैं, पर हमें उसके लिये स्वयं को तैयार करना है. सकाम भाव से कर्म करने की प्रवृत्ति का नाश हो, मन तुलना न करे, अच्छे-बुरे की भावना से भी ऊपर उठे, सिर्फ कार्य को नहीं कारण को भी देखे, और दोनों से निर्लिप्त रहे. यह जगत एक स्वप्न की नाई ही है जो प्रति पल गुजर रहा है. फिर इस गुजरने वाले दृश्यों को द्रष्टा की नाईं देखने में ही जीवन जा रहा है, ज्ञान दृश्य और द्रष्टा दोनों को शांत करता है, फिर मात्र एक आत्म सत्ता ही शेष रहती है, जिसके कारण यह जगत दृश्य मान है, हमें इस स्वप्न में अभिनय करना है, सो सजग होकर करेंगे कि यह सब तो अभिनय ही है, वास्तव में हम न करते हैं न भोगते हैं, शरीर करता है और मन भोगता है, हम न मन हैं न शरीर, सो व्यर्थ ही अधिक करने और अधिक पाने की इच्छा अपने आप शांत हो जाती है, मन में समता की भावना दृढ़ हो जाती है, भटकन तत्क्षण समाप्त हो जाती है. आत्मा की झलक हमें मिलने लगती है जो भव्य है.