फरवरी २००५
जीवन में ज्ञान हो और वह ज्ञान आचरण
में भी उतरे तभी शांति का अनुभव हो सकता है ! आनन्द का अनुभव हमें तभी होता है जब
भीतर विरोध नहीं रहता. हमारा किसी से विरोध हो अथवा किसी का हमसे विरोध हो, हमारे
कारण कोई दुखी हो अथवा हम किसी के कारण दुखी हों, दोनों ही स्थितियों में हम ईश्वर
का विरोध करते हैं. हमें जो कुछ भी चाहिए उस परम ने हमारे ही भीतर भर दिया है, हम
हृदय का कपाट बंद करके बाहर घूमते रहते हैं. थक-हार कर दुखी होते हैं अपने भीतर
बहते हुए शीतल झरने पर नहीं आते, जो प्रेम से, आनन्द से निरंतर बह रहा है. हम उस
प्रभु के गीत गाते हैं फिर भी कभी अहंकार, कभी हीनता से ग्रसित हो जाते हैं. जगत
के साथ एक्य का अनुभव होने पर दोनों ही विलीन हो जाते हैं.