Sunday, September 1, 2013

हर अंतर में वही विराजे

फरवरी २००५ 
जीवन में ज्ञान हो और वह ज्ञान आचरण में भी उतरे तभी शांति का अनुभव हो सकता है ! आनन्द का अनुभव हमें तभी होता है जब भीतर विरोध नहीं रहता. हमारा किसी से विरोध हो अथवा किसी का हमसे विरोध हो, हमारे कारण कोई दुखी हो अथवा हम किसी के कारण दुखी हों, दोनों ही स्थितियों में हम ईश्वर का विरोध करते हैं. हमें जो कुछ भी चाहिए उस परम ने हमारे ही भीतर भर दिया है, हम हृदय का कपाट बंद करके बाहर घूमते रहते हैं. थक-हार कर दुखी होते हैं अपने भीतर बहते हुए शीतल झरने पर नहीं आते, जो प्रेम से, आनन्द से निरंतर बह रहा है. हम उस प्रभु के गीत गाते हैं फिर भी कभी अहंकार, कभी हीनता से ग्रसित हो जाते हैं. जगत के साथ एक्य का अनुभव होने पर दोनों ही विलीन हो जाते हैं.    

Saturday, August 31, 2013

सहज घटे सो ही सच्चा

फरवरी २००५ 
यदि अध्यात्म का समग्र रूप हमें देखना हो तो उसमें नैतिकता, ध्यान, जीवन जीने की कला सभी कुछ आ जाते हैं. हम आध्यात्मिक हैं या नहीं इसका पता हमारे आचरण से लगता है, सच्चाई, ईमानदारी, सादा जीवन और ईश्वर पर अखंड विश्वास ये सभी हों तो हम ध्यान में प्रवेश पाते हैं. ध्यान मन के पूर्व संस्कारों को मिटाता है. जो विचार पहले कष्ट देते थे अब उनका असर नहीं होता, जो वस्तुएं पहले आकर्षक लगती थीं अब उनका कोई महत्व नहीं रह जाता, मन खाली हो जाता है तो उसमें प्रेम और शांति के फूल लगते हैं, सहज प्रसन्नता जीवन का अंग बन जाती है. मन की ख़ुशी किसी बाहरी वस्तु पर आधारित न होकर अपने ही कारण से होती है. तब यह किया, यह करना है जैसे विचार भी नहीं सताते, जो भी करना हो वह  अपने आप सहज भाव से होता है. बिना किसी प्रयास के किया गया कार्य भार नहीं होता. तब शास्त्रों के वचन सत्य घटित होते लगते हैं. परमात्मा के साथ एक्य का अनुभव होने लगता है. उन क्षणों में ही हम पूर्ण अध्यात्मिक होते हैं.

Thursday, August 29, 2013

हद, बेहद दोनों टपे

जनवरी २००५ 
हद टपे सो औलिया, बेहद टपे सो पीर
हद, बेहद दोनों टपे, ताको कहे फकीर

जैसे सोना आग में जाकर तपता है तो उसकी चमक बढ़ जाती है वैसे ही मन को जब साधना में तपाते हैं तो हम उस मूल तक पहुंच जाते हैं जिसे वेदों में गाया गया है. जिसे नेति-नेति कहकर अवर्णनीय कहा गया है. जो इस जगत का आधार है, इसे बनाता है, पालता है और नष्ट करता है. जो सत्य है, शिव है, सुंदर है. जो नित्य है, प्रेम है, आनन्द है. जो जानने योग्य है , पाने योग्य है. हमारे मन का भी वही मूल है. विचारों और भावों के रूप में मन की कई शाखायें हैं, उन पर कामनाओं के फल लगे हैं, हम ज्यादातर इन फलों में ही उलझे रहते हैं, कभी–कभी तने तक पहुंच जाते हैं, पर मूल तक पहुंचने के लिए हमें मनके पार जाना होगा. ध्यान तथा समाधि में हमें उस मूल की झलक मिलती है. और जिसने एक बार शांति रूपी गंगा जल पा लिए वह नाले के पानी का क्या करेगा, हीरा पाकर कोई कांच का टुकड़ा क्यों लेगा ? वह तो औरों को भी आनन्द रूपी हीरे को पाने के लिए प्रेरित करेगा.

Tuesday, August 27, 2013

ज्ञान वही जो आये अनुभव में

जनवरी २००५ 
देह में प्रतिक्षण संवेदनाएं हो रही हैं, जैसे अहंकार जगते ही मन स्थिर नहीं रहता, अहंकार को चोट लगने पर तो और भी अस्थिर हो जाता है, तो देह में भी इसका भास होता है. मन में कोई भी उत्तेजना जगे तो तन संवेदनाएं जगाने लगता है. मन सुखद संवेदनाओं को तो चाहता है, जो आकर कुछ देर बाद अपने आप चली जाती हैं, पर दुखद को नहीं, उनका विरोध करता है, विरोध करते ही और दुखद संवेदनाएं आ जाती हैं. एक श्रंखला ही बनने लगती है, यदि हम इन्हें सजग होकर देखें तो धीरे-धीरे खत्म होने लगती हैं. वास्तव में प्रतिक्रिया जगाने वला मन ही सुख-दुख का भागी होता है. यदि भीतर केवल साक्षी रहे तो बड़ी से बड़ी बात भी कोई दुःख नहीं दे सकती. यह अनुभव की बात है. धीरे धीरे हमें इसे अनुभव में उतारना होगा और फिर यह स्वभाव का अंग बन जायेगा. 

Monday, August 26, 2013

चलें मूल की ओर

जनवरी २००५ 
हमें चिंता से चिन्तन की ओर जाना है, चिंता नश्वर की होती है, चिन्तन शाश्वत का होता है. अपने भीतर छिपे उस तत्व को प्रकट करना है. देह जड़ है, मन, बुद्धि भी जड़ है जड़ का चिन्तन हमें जड़ बना देता है, संवेदनशीलता खो जाती है, बुराई के प्रति हम आँख मूंद लेते हैं. चेतन का चिन्तन सदा प्रकाश से भर देता है, आगे बढ़ने की एक ललक, एक प्यास, एक तड़प, एक अग्नि भीतर जलती रहती है. उसी के प्रकाश से फिर जड़ भी दिव्यता को प्राप्त हो जाता है. मन भावों को जन्म देता है, भीतर एक गीलापन उगता है, जो हमें अपने मूल स्वभाव की ओर ले जाता है. 

Thursday, August 22, 2013

स्वयं को खो क्या जग का पाना

जनवरी २००५ 
हम भगवान को तो मानते हैं पर भगवान ‘की’ नहीं मानते, यदि हम key को भी अपना लें तो जीवन की कई गुत्थियाँ सुलझ जाती हैं. हम जितना-जितना बाहर सुख खोजते हैं, उतना उतना सत्य से दूर होते जाते हैं. तब मानव अपने स्वार्थ के लिए वस्तुओं को ही नहीं व्रतों, नियमों यहाँ तक की नीतियों में भी परिवर्तन कर लेते हैं. क्षणिक सुख के पीछे लालायित होकर अपने को नीचे गिराने में भी आज कोई शर्म की बात नहीं समझता. लोग रिश्वत लेने को तो फिर भी बुरा मानते हैं पर रिश्वत देने को नहीं. आज भ्रष्ट आचरण को सामान्य जीवन का अंग मान लिया गया है, क्योंकि समाज के उच्च कहे जाने लोग ही इसे अपनाते हैं. अपनी इच्छा को ही सर्वोपरि  मानने वाला समाज नीति, कानून तथा धर्म की परवाह करना ही छोड़ देता है.




Wednesday, August 21, 2013

अभय हुये जो बनें अहिंसक

जनवरी २०१३ 
भय और हिंसा समानार्थी शब्द हैं, अभय और अहिंसा का एक ही अर्थ है. यदि हमें रोग, बुढ़ापे तथा मृत्यु का भय है तो हम हिंसक हैं, किसी भी प्रकार का तनाव हिंसा ही है, यदि हम मन को समत्व भाव स्थित नहीं रख पाते, अनुकूल परिस्थिति में प्रसन्न तथा प्रतिकूल परिस्थिति में दुखी हो जाते हैं तो भी हम हिंसा में विश्वास रखते हैं. अहिंसा का पालन करने वाला कभी भयभीत नहीं होता. पूर्णता में जीना और पूर्णता में मरना उसके लिए सहज होता है.