Wednesday, December 4, 2013

मन के विश्राम में आत्मा का राम है

अप्रैल २००५ 
हम सभी का लक्ष्य आनन्द है, शांति है, प्रेम है, ऐसा प्रेम जो सदा एक सा हो, सतत् आनन्द तथा कभी न छूटने वाली शांति... और यही हमारा मूल स्वभाव है, प्रभु ने हमारी रचना इन्हीं तत्वों से की है, पर काल के प्रभाव से हम इस बात को भूल गये हैं और बाहर इन्हीं की खोज करते हैं, ये कभी तो हमें प्रयत्न पूर्वक मिल जाते हैं कभी छूट जाते हैं, सुख-दुःख के चक्र में हम निरंतर घूमते रहते हैं. हम सोचते हैं ये ऐसी वस्तुएं हैं जिनके लिए बड़ा ही श्रम करना पड़ता है, फिर इन्हें पाना होता है. पर ईश्वर अवश्य ही हमारी इस मूर्खता पर मन ही मन हँसता होगा, वह जब देखता होगा, इनकी प्राप्ति के लिए लोग न जाने कितने व्रत, उपवास, जप-तप करते हैं, पर अपने स्वभाव में कभी नहीं ठरते. वह सोचता होगा इन्हें भटक कर अंततः तो घर लौटना ही है. ये जब ईश्वर को भी खोज रहे होते हैं तो उससे इन्हीं की मांग करना चाहते हैं. ईश्वर, आनन्द, शांति और प्रेम सब एक के ही अनेक नाम हैं, ये तो हरेक के भीतर हैं पर मानव की दौड़ बाहर ही बाहर है, भीतर की उसे खबर ही नहीं, भीतर के नाम पर उसके पास कामनाओं से भरा मन है, वही तो सबसे बड़ी बाधा है भीतर जाने में ! 

Tuesday, December 3, 2013

पार हुआ जो तीन गुणों से

अप्रैल २००५ 
ईश्वर अकारण दयालु है, परम मित्र है, परम स्नेही है, सुह्रद है, हितैषी है, अपना है और सदा हमारे साथ है. इतना सब होते हुए भी मानव दुखी है, यह कैसा विरोधाभास है, कैसे विडम्बना है ? हम ईश्वर की तथाकथित भक्ति तो करते हैं पर उससे दूर-दूर ही रहते हैं उससे डरते हैं, या तो अपने आप से डरते हैं या ईश्वर इतना शुद्ध है कि हमारे भीतर की अशुद्धता उसके निकट  जाते ही स्पष्ट दिखाई देने लगती है, या हम ईश्वर से दूर-दूर का ही नाता रखना चाहते हैं, हम डरते हैं कि प्रभु हमसे कुछ छीन न ले, हम निरे बच्चों का सा व्यवहार करते हैं उसके सम्मुख ! हम नाटक करते हैं, स्वयं को धोखा देते हैं, क्योंकि उसे तो धोखा दिया ही नहीं जा सकता. कृष्ण कहते हैं कि प्रकृति अपने गुणों के अनुसार ही वर्तती है और गुणों के वशीभूत हुए प्राणी भिन्न-भिन्न व्यवहार करते हैं, और यह गुण उन्हें कर्मों के अनुसार मिलते हैं, हमारा अधिकार कर्म करने तक ही है. पूर्व आदतों के अनुसार ही यदि कर्म करते रहे तो जीवन पूर्ववत ही बना रहेगा, ध्यान से हम संस्कारों को बदल सकते हैं जिनसे सात्विक स्वभाव को प्रप्त होंगे. गुणों को बदलना हमारे हाथ है यह जानने के बाद कौन है जो प्रकृति के वशीभूत होकर कर्म करेगा, सजग व्यक्ति अपना निर्माता स्वयं होता है.


Sunday, December 1, 2013

आज तोड़ दें सब जंजीरें

अप्रैल २००५ 
अनंत धैर्य तथा अखंड भरोसा हमें शुभ की ओर ले जाता है. हमारा मन जो आज हमारा शत्रु प्रतीत होता है, साधना की अग्नि में तपकर मित्र हो जाता है. फिर वह स्वतः ही परम की ओर जाता है, आत्मा के सान्निध्य का रस प्राप्त करने के बाद  पुनः झूठे रस को पाकर संतुष्ट नहीं होता, बल्कि उसी दिव्य रस को चखना चाहता है. वर्तमान के क्षण में वही दिव्यता हमें मिलती है, हर आने वाला क्षण अपने भीतर अनंत प्रेम छिपाए है. शुद्ध वर्तमान हमें मुक्त कर देता है. उसमें रहने वाला मन एक उन्मुक्त पंछी की तरह खुले गगन में उड़ान भर सकता है, अन्यथा भूत तथा भावी की जंजीरें बंधीं हो तो पंछी कैसे उड़ेगा. अतीत का पश्चाताप तथा भविष्य की आशंका की जंजीरें बांध दें तो वह नहीं उड़ पायेगा, ज्ञान की तलवार से इन्हें काट सकते हैं. भूत कभी लौट कर नहीं आता और भविष्य अनिश्चित है, जिन पर न हमारा वश है और जो न हमें तृप्त कर सकते हैं. जिसके मन में पूर्ण की चाह उठे वह सदा वर्तमान में ही रहता है वही ज्ञानी है और वही पूर्ण तृप्ति का अनुभव करता है.

Thursday, November 28, 2013

मन ही रचता सुख-दुःख सारे

अप्रैल २००५ 
सन्त कहते हैं, भीतर कितनी शांति है, कितना प्रेम और कितना आनन्द.. भीतर आत्मा है, ईश्वर है और बाहर भी उन्हीं का प्रसार चहूँ ओर हो रहा है. प्रकृति के सुंदर रूप, झीलें, हिमाच्छादित पर्वत, वनस्पतियाँ, फूल, झरने, शीतल हवाएं, वर्षा, विविध सुगंधें, और न जाने कितने-कितने अनुपम पदार्थ, मानव, पशु-पक्षी, चाँद, तारे, ग्रह-नक्षत्र सभी कुछ कितना अद्भुत है. इन सबको रचने वाला स्वयं कितना अद्भुत होगा. सन्त कहते हैं वह हमारे भीतर है, वह जो मिलकर भी नहीं मिलता, जो बिछड़कर भी नहीं बिछड़ता, जो दूर भी है और पास भी, जो दीखता भी है और नहीं भी दीखता, जो सदा एक सा है, नित्य है, शुद्ध है, पूर्ण है, बुद्ध है, जो प्रेम है, रस है, आनन्द है, शांति है, सुख है पर जिसके जगत में दुःख भी है और पीड़ा भी, असत्य भी, घृणा भी. सभी कुछ उसी से उपजा है, उसी की लीला है, राम है तो रावण भी है, कृष्ण है तो कंस भी है. इस जगत में सारे विरोधी भाव हैं, रंग हैं, वरना किसी की महत्ता का भान कैसे होता. मरीज न हो तो वैद्य का क्या काम, माया न हो तो माया पति का क्या कार्य, पर सन्त कहते हैं जगत के इन द्वन्द्वों के मध्य रहते–रहते हमें बहुत समय हो गया, सुख-दुःख के चक्र में फंसकर हम अनेकों बार वही वही कर्म ही करते आए हैं, हमें इनसे ऊपर उठना है, द्वन्द्वातीत होना है हमें, पर हमारा मन इनसे ऊपर उठना चाहता ही नहीं वह किन्हीं विश्वासों, पूर्वाग्रहों, मान्यताओं में बंधा स्वयं तो अशांत होता ही है और हम जो उसके इशारों पर चलते हैं व्यर्थ ही फंस जाते हैं.

Wednesday, November 27, 2013

स्वयं को ही उपहार बना लें

अप्रैल २००५ 
सत्संग से जीवनमुक्ति मिलती है. सहजता आती है. निर्मोहता, निसंगता तथा स्थिरमन की निश्चलता आती है. जीवनमुक्ति का अर्थ है अपने आस-पास कोई दुःख का बीज न रह जाये. दिव्य स्पंदनों का आभा मंडल इतना शांत होता है कि भीतर के विकारों से हमें मुक्ति मिल जाती है. सारी कड़वाहट खो जाती है, मन खिल उठता है. हम पुनः नये हो जाते हैं. वर्तमान यदि साधना मय है तो भावी सुंदर होगा ही. इस मन को शुभता से भर कर हमें जगत के लिए उपहार स्वरूप बनना है न की भार स्वरूप. वह अकारण हितैषी परमात्मा अनंत काल से हमें प्रेम करता आया है. हम उसे समझ न पायें पर उसके प्रेम को तो अनुभव कर ही सकते हैं . 

Tuesday, November 26, 2013

बनी रहे वह स्मृति पल पल

अप्रैल २००५ 
हम सोचते हैं कि मन सध गया, पर यह सूक्ष्मरूप से अहंकार को सम्भाले रहता है. देहात्म बुद्धि में रहने पर मन हावी हो जाता है. आत्मा में जो स्थित हो गया उसे कोई बात विचलित नहीं कर सकती. जगत में रहकर अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए वह अलिप्त रह सकता है. वह अपनी मस्ती में रहता है, परम की स्मृति उसे प्रफ्फुलित किये रहती है. आनन्द का एक स्रोत उसके भीतर निरंतर बहता रहता है, एक पल के लिए भी यदि उसमें अवरोध हो तो उसे स्वीकार नहीं होता. एक क्षण के लिए भी मन में छाया विकार उसे व्यथित कर देता है. जगत उसके लिए परमात्मा को पाने का साधन मात्र बन जाता है. वह खुद को जगत के लिए उपयोगी बनाने का प्रयत्न करता है. वह प्रेम ही हो जाता है.

Monday, November 25, 2013

कुछ मोती अनमोल

अप्रैल २००५ 
दीवानगीये इश्क के बाद आखिर आ ही गया होश
और होश भी ऐसा होश कि दीवाना बना दे ! 

दीवाने से कभी मत पूछो कि क्या लोगे
अगर बोल बैठा तो क्या दोगे ?

मांगो.. मांगो.. मांगो तो सही मांगो
और सही का मतलब वही मांगो
कभी कुछ, कभी कुछ  
इससे तो बेहतर है नहीं मांगो !


देना न भूलो, देकर भूलो !