Sunday, December 15, 2013

मीरा के प्रभु गिरधर नागर

मई २००५ 
कन्हैया की छवि मीरा के मन में समा गयी है, उसके प्रति अपार प्रेम का अनुभव उसे होता है. जब उसका नाम हृदय में आता है (जो कि निरंतर आता ही रहता है) तो एक आनंदी भाव छा  जाता है, उसके लिए बहुत अश्रु भी बहाये हैं उसने, उसकी रग-रग में वही है, एक-एक कोशिका में, वही भीतर है और वही बाहर है, वही प्रेम है, वही विरह है, वही अपना है, वही अपनों में भी है, वही सद्गुरु है, वही आत्मा है, तभी वह इतना प्यारा है. वह क्या है इसे कौन बयाँ कर सकता है, उसे तो महसूस किया जा सकता है, उसे पिया जा सकता है, भीतर ही भीतर अमृत की तरह वह रिसता जो है, अंतर को भिगो देता है, वह रसपूर्ण है, वह मधुर है, वह इतना मृदु है कि... वह इतना आनन्दमय है कि.. वह जब निकट होता है तो जैसे सब कुछ मिल गया हो, फिर दुनिया में कुछ भी पाने जैसा नहीं रह जाता, यह जगत तब फीका लगता है, उसके प्रेम का अनुभव जिसे हुआ है वही जानता है. वह मस्त कर देता है, उसके लिए मन दीवाना हो जाता है, वह जब कृपा करता है तभी यह खजाना मिलता है, वह एक बार जिसका हाथ थाम लेता है, उसे कभी नहीं छोड़ता, वह सच्चा मीत है, वह मीरा के योग-क्षेम का भार उठाता है. 

Saturday, December 14, 2013

जब आवे संतोष धन

गोधन, गजधन, गाजिधन और रतनधन खान, 
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान


मन जब संतोष पा लेता है, तुष्ट हो जाता है, तृप्त हो जाता है, तब संसार उसे नचाता नहीं. अनासक्त होकर जब हम कर्म करते हैं, तब कर्म बंधन नहीं बनता, कर्म तो हमें करना ही है, कर्म किये बिना हम क्षण भर भी नहीं रह सकते, प्रसन्न तभी रह सकते हैं जब संतुष्ट रहते हैं, संतुष्टि अपने आप में सबसे बड़ी सम्पदा है.. कभी कभी ऐसा लगता है, तुष्टि हमें आगे बढने से रोकती है, किन्तु इसमें सच्चाई नहीं है, तुष्ट व्यक्ति की सारी ऊर्जा उसके पास रहती है, वह  जिस तरह चाहे उसका उपयोग कर सकता है, साथ ही इस जगत के सारे कार्यों का लक्ष्य अंततः आनंद प्राप्ति ही है, तो यदि वह सुन्तुष्टि के रूप में हमें पहले से ही प्राप्त है तो श्रेष्ठ है, संसार से सुख पाना हो तो उसके आगे-पीछे घूमना पड़ता है, वह सुख क्षणिक होता है, कम-ज्यादा भी होता रहता है, भीतर का सुख अनवरत है, सहज है, अपना है, हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, वह  तृप्ति का सुख है, संतोष का सुख है. ईश्वर का सुख है, आत्मा का सुख है, वह एक बार किसी को मिल जाये तो कभी छिनता नहीं, वह समाधि का सुख है.  

Friday, December 13, 2013

सांसों की माला में.... तेरा नाम

मई २००५ 
‘नाम न बिसरे, नाम न बिसरे, ऐसी दया करो महाराज ! नाम में बहुत शक्ति है नाम के रूप में एक दिव्य चेतना हमारे अस्तित्त्व को ढक लेती है, हम उसके प्रभाव से ऊपर उठ जाते हैं, तब तुच्छ विकार हम पर प्रभाव नहीं डाल सकते. नाम और नामी में अटूट सम्बन्ध है. नाम में अदृश्य रूप से नामी के सभी गुण विद्यमान रहते हैं, नामी हमसे छिपा है पर उसका नाम सहज प्राप्य है. उसका सुमिरन हो तो नामी को एक न एक दिन प्रकट होना ही पड़ता है. नामी की कृपा का अनुभव जब होता हैतो हम जैसे बादशाह बन जाते हैं, एक अखंड शांति का सागर हमारे चारों ओर लहराने लगता है. प्रेम की लहर भीतर उठती है जिसमें मन, प्राण सब भीग जाते हैं. मन जैसे रूपांतरित हो जाता है.  

Thursday, December 12, 2013

करणीय होता रहे त्याज्य जाये छूट हमसे

मई २००५ 
ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में हम उसी के प्रतिनिधि हैं, उसने हमें अपने सा सिरजा है, इस जगत में हम अमृत पुत्रों के समान निडर, निर्भीक तथा प्रेम भरा जीवन व्यतीत कर सकते हैं. मोह और प्रमाद के कारण ही हम ऐसा नहीं कर पाते और अपनी अपार क्षमताओं से वंचित ही रह जाते हैं. वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के साथ स्वयं को एक मानना ही मोह है. प्रयत्न पूर्वक जो करना चाहिए उसकी विस्मृति ही प्रमाद है. धर्म को जानते हुए भी उसकी ओर न चलना, अधर्म को जानते हुए भी उससे दूर न जाना भी प्रमाद है. मन व इन्द्रियों की व्यर्थ चेष्टा का नाम भी प्रमाद है. मोह और प्रमाद से मुक्त हुई आत्मा ही सतोगुण में स्थित होती है. सात्विकता का फल है निर्मलता, रजोगुण से मोह बढ़ता है, जिसका फल है दुःख. तमोगुण का फल अज्ञान है. धीरे-धीरे हमें सतोगुण से भी पार जाना है, क्योकि ये तीनों गुण एक दूसरे में बदलते रहते हैं. कृष्ण कहते हैं गुणातीत ही उनका सच्चा भक्त है.


Wednesday, December 11, 2013

सच की नाव खेवइया सतगुरु

मई २००५ 
जब भी हमने चित्त को मैला किया, हमें दंड मिला है, हम स्वयं को दुखी बनाते हैं और दुखी व्यक्ति दूसरों को भी दुख देता है. जैसा-जैसे चित्त निर्मल होता है, हम सुखी होते हैं और स्वयं सुखी व्यक्ति औरों को भी सुख देता है. जब-जब हम सजगता त्याग देते हैं, पहले अपनी हानि होती है फिर दूसरों की हानि होती है. जब यह बात समझ में आती है तभी वास्तविक रूप से हम धर्म का जीवन जीते हैं. धर्म की रक्षा करें तो धर्म हमारी रक्षा करता है. सत्य के निकट होते ही शांति, प्रेम तथा आनन्द का अनुभव होता है तथा सत्य से दूर जाते ही पीड़ा का, पीड़ा का अनुभव भला कौन चाहता है ?


सागर छल छल छलके भीतर

अप्रैल २००५ 
हमें सूक्ष्म दृष्टि का विकास करना होगा, तब सत्य हमारे मन, कर्म तथा वाणी में प्रकटेगा. सूक्ष्म को देखने की शक्ति हमारे भीतर है पर उस शक्ति से हम परिचित नहीं है. बाहर की दुनिया में प्रतिस्पर्धा, लोभ, उत्तेजना के अनेक अवसर हैं, अहंकार को पोषित किया जाता है. हम सत् से असत् की ओर बढ़ते हैं. भीतर के संसार में इतनी गहराई है कि उसका कोई अंत नहीं है पर भीतर की दुनिया के साथ हमारा सम्पर्क नहीं होता, बाहर से हमें भीतर की ओर जाना है, तो असत् से सत् की ओर चलना होगा. सत् के प्रति प्रेम ही हमारे आत्मा की प्यास है. इसे दुनियावी वस्तुओं से बहलाया नहीं जा सकता. वह केवल और केवल उसी सागर को चाहती है जो अनंत प्रेम, शांति और आनन्द का स्रोत है. न जाने कितने शरीर हमने धारण किये हैं, सदा आत्मा की उपेक्षा करके मन को प्रमुखता दी है जिस कारण हम ढगे गये हैं. रेगिस्तान के मरुस्थल जैसा जीवन जीया है पर भीतर की यात्रा हमें उस सागर तक ले जाती है.


Monday, December 9, 2013

खो जाए मन द्वार खुले तब

अप्रैल २००५ 
साधक को जीवन में दुःख को पहचानना जरूरी है, पहले उसे स्वीकारना फिर उसे दूर करने की चेष्टा करनी है. जीवन भर अर्थार्थी ही नहीं बने रहना है. अर्थार्थी से आर्त तथा आर्त से जिज्ञासु बनना ही पड़ेगा. पग-पग पर जीवन में हमें दुःख मिलता है, हमारा मन ही सबसे ज्यादा दुःख देता है, इसे जानना अध्यात्म का पहला कदम है. तभी तो हम मन के पार जायेंगे, मन के पार क्या है यह जिज्ञासा तभी उठती है जब हम मन को समझ जाते हैं. मन के पार की झलक ध्यान में मिलती है, जब कोई विचार नहीं रहता, वहाँ, जहाँ कुछ भी नहीं है, वही शून्य है, वही पूर्ण है, वही आत्मा है. इसकी तलाश ही दुखों से मुक्ति की तलाश है. हम ध्यान सीख लेते हैं तो पुनः पुनः ताजा होकर जगत में लौट आते हैं. सारा विषाद घुल जाता है, सारी सृष्टि के साथ प्रेम का सम्बन्ध बन जाता है.