Saturday, November 15, 2014

प्रेम गली अति सांकरी

अप्रैल २००७ 
संत कहते हैं हम लाख चाहें, शब्दों से अपनी बात समझा नहीं सकते, जो काम मौन कर देता है वह शब्द नहीं कर पाते. हम अपने व्यवहार से, भीतर छिपी करुणा से किसी हद तक अपने विरोधी को भी प्रभावित कर सकते हैं. भीतर जो प्रतीक्षा है उसी में सारा रहस्य छिपा है. आतुरता, प्यास यही साधना की पहली शर्त है. ज्ञान को जितना भी पढ़ें, सुनें, गुनें, तृप्ति नहीं मिलती. वह परमात्मा कितना ही मिल जाये ऐसा लगे कि मिल तो गया है फिर भी मिलन की आस जगी रहती है. प्रेम में संयोग और वियोग साथ-साथ चलते हैं. इसलिए भक्त कभी हँसता है कभी रोता है, वह ईश्वर को अभिन्न महसूस करता है पर तृप्त नहीं होता, फिर उसे सामने बिठाकर पूछता है, पर दो के बीच की दूरी भी उसे सहन नहीं होती. वह स्वयं मिट जाता है केवल ईश्वर ही रह जाता है. ज्ञानी भी एक है, और कर्मयोगी के लिए यह सारा जगत उसी एक का स्वरूप है. एक का अनुभव ही अध्यात्म की पराकाष्ठा है.

Thursday, November 13, 2014

तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई

अप्रैल २००७ 
जिस तरह मिट्टी अग्नि में तपकर प्याला बन जाती है और उपयोग में आती है, वैसे ही हमारा यह माटी का तन जब ईश्वर की लगन रूपी लौ में तप जाता है तब यह उसके हाथों का उपकरण बन जाता है और काम में आता है. ईश्वर की लगन भी क्रमशः तीव्रतर होती जाती है, पहले राख में छिपी अंगारे की तरह जो ऊपर से दिखायी भी नहीं देती, हमारे भीतर छिपी रहती है, फिर तपते हुए लाल अंगारे की तरह जो प्रकाश भी देता है व ताप भी, फिर गैस की नीली लपट की तरह और फिर माइक्रोवेव ओवन की तरह जो नजर भी नहीं आती बस चुपचाप अपना काम करती रहती है. ज्ञान पा लिया है साधक को यह अहंकार भी छोड़ना होगा पर नहीं मिला है, सदा यह संदेह भी नहीं रखना है. मध्यम मार्ग पर चलना श्रेष्ठ है. आत्मा का परमात्मा से नित्य का संबंध है, हमें बनाना नहीं है, हम स्वयं आत्मा हैं यह बात जितनी भीतर दृढ़ हो जाएगी तो उतना ही हम परमात्मा से अभिन्नता अनुभव कर सकेंगे, और तब शेष ही क्या रहा ?


Wednesday, November 12, 2014

कोई नहीं वहाँ रहता अब

अप्रैल २००७ 
साधक का मन जब ख़ाली हो जाता है, कोई वस्तु नहीं मांगता, कुछ नहीं चाहता, जैसे यह है ही नहीं ! कुछ छूट भी  जाये तो भीतर एक कतरा भी न हिलता, कुछ हो तभी न हिलेगा, मन की गहराई में कुछ भी नहीं है वहाँ सब कुछ अचल है वहाँ कोई हलचल नहीं... वहां से केवल एक पुकार आती है कि कैसे इस जगत को कुछ दे दें, देने की बात ही अब प्रमुख है. प्रभु भी तो हर पल दे ही रहा है. अपना प्रेम, करुणा, और कृपा..सद्गुरु भी यही कर रहे हैं. साधक उनके जैसे बनने का प्रयत्न तो कर ही सकता है ! वह दे और बस ! एक क्षण भी वहाँ रुके नहीं, उस लेने वाले का आभार लेने के लिए बल्कि उसका आभारी हो कि वह वहाँ है ताकि उसके भीतर प्रेम जगे... न जाने कितने जन्मों से वह लेता आया है..अब और नहीं !


Sunday, November 9, 2014

शरण गये सो तृप्त भये

अप्रैल २००७ 
धर्म को यदि धारण नहीं किया तो व्यर्थ है, नहीं तो हमारी हालत भी दुर्योधन की तरह हो जाएगी, जो कहता है मैं धर्म जानता हूँ पर उसकी ओर प्रवृत्ति नहीं होती और अधर्म जानता हूँ पर उससे निवृत्ति नहीं होती. जितनी हम उठा सकें उतनी जिम्मेदारी हमें उठानी ही चाहिए. जैसे-जैसे हम किसी काम को करने का बीड़ा उठाते हैं वैसे-वैसे हममें और शक्ति भरती जाती है ! हम स्वयं ही अपनी शक्ति पर संदेह करते हैं और फिर आत्मग्लानि से भर जाते हैं. वास्तव में सारे गुण हमारे भीतर ही हैं, यह मानकर चलना है. अवगुण तो एक आवरण की तरह ऊपर-ऊपर ही हैं. यदि हम शरण में जाते हैं तो ईश्वर की पवित्रता हमारे सारे दोषों को दूर करने में सहायक होती है. वह पावन है और उसकी निकटता में हम भी पावन हो जाते हैं. जो शक्ति उससे मिलती है वह सृष्टि के हित में लगने लगती है, क्योंकि हम स्वयं तो तृप्त हो जाते हैं, जो एक बार सच्चे हृदय से शरण में गया वह तृप्त ही है !


Saturday, November 8, 2014

वर्तमान का पल ही अपना

अप्रैल २००७ 
कभी-कभी साधक को लगता है जैसे कुछ छूटा जा रहा है, लेकिन वह क्या है उस पर ऊँगली रखना कठिन है. भीतर एक बेचैनी सी होती है, मगर इतनी तीव्र भी नहीं, बस मीठी-मीठी आँच सी बेचैनी. उसे लगता है ईश्वर ने उसे इतना ज्ञान, इतना प्रेम और इतना समय दिया है उसका लाभ जग को नहीं मिल रहा है, वह तो हर पल सौ प्रतिशत लाभ में ही है. उसे ज्ञात हो गया है कि भुक्ति, मुक्ति और भक्ति ये तीन पदार्थ हैं, जिनमें से किसी को भी पाना है तो हमें वर्तमान में जीना शुरू कर देना चाहिए. जो भी घटित होता है वह वर्तमान में ही होता है. भूत हो चुका, भविष्य अभी हुआ नहीं. भूत में चिंता है, भविष्य में डर है, आनंद वर्तमान में ही है.

Tuesday, November 4, 2014

बन जाये मन अपना राधा

अप्रैल २००७ 
कृष्ण हमारी आत्मा है, मन की भीतर लौटती हुई धारा ही राधा है. जैसे-जैसे मन भीतर जाता है उसे आत्मा से प्रेम हो जाता है. उसे प्रेम रोग लग जाता है. “दिल हमको लुटा बैठा, हम दिल को लुटा बैठे, क्या रोग लगा बैठे...” जिसके रोम-रोम में प्रेम का रोग लगा है वह है भक्त. दोनों का मिलन ही विश्राम को प्रकट करता है. वास्तव में हमारा मन, बुद्धि समाधान चाहते हैं, जगत उसे समाधान दे नहीं सकता, परमात्मा ही दे सकता है, जो आत्मा रूप में हमारे भीतर है. संसार में उलझा हुआ मन अपने पद से नीचे गिर जाता है, शहजादे से भिखारी बन जाता है. वह जो आत्मा की तरंग है उसी की जाति का है उसी को भुलाकर विजातीय से प्रेम करने लगता है, पर खुद से मिलने की जब याद आती है तो भीतर मिलने की तड़प जगती है और मन भीतर लौटने लगता है.  

Monday, November 3, 2014

सहज मिले सो मीठा होए

अप्रैल २००७ 
अनात्मा से सुख लेने की चेष्टा यदि होती है, कुछ करने की इच्छा यदि अभी भी भीतर है, कुछ करके मान पाने इच्छा ! तो अभी पूर्ण शरणागति नहीं हुई है. आत्मा बलवती होती है जब हम उससे जुड़ते हैं. जब हम अकर्ता भाव में आ जाते हैं तो जो कुछ भी होता है वह सहज भाव से होता है. प्रत्यक्ष ज्ञान होने पर स्वयं को आत्मा रूप के अनुभव में सहजता ही सबसे बड़ा लक्ष्ण है. हम जितना सहज होकर जीते हैं सभी के साथ आत्मभाव में रहते हैं. जड़-चेतन दोनों के प्रति सहज प्रेम का अनुभव करते हैं. जो हम नहीं है वह कहना या मानना ही अहंकार है. यदि हम अभी भी स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि मानते हैं, औरों के दोष हम तभी देख पाते हैं. दूसरों के दोष देखने से हम कर्म बांधते हैं. खुद के दोष प्रज्ञा दिखाती है, और इन्हें देखने से हम कर्मों से छूटते  जाते हैं !