Tuesday, January 21, 2020

करुणा का जब जन्म हो भीतर



जीवन को गहराई से देखें तो एक सन्नाटा ही हाथ लगता है. किसी भी बात का जवाब नहीं मिलता, जैसे कोई पूछे भाषा का जन्म कैसे हुआ, स्वर व अक्षर किसने बनाये, कोई नहीं बता सकता. अनादि काल से यह चली आ रही है, चीजें हैं और हमें उनके स्रोत का कोई ज्ञान नहीं है. सन्त और शास्त्र कहते हैं, पहले स्वयं को जानो फिर जगत का रहस्य अपने-आप खुल जायेगा. स्वयं का होना और उसे जानना एक ही बात है, क्योंकि स्वयं ही तो स्वयं को जान रहा है, वहां कोई दूरी नहीं है. हमारा खुद का होना जब सत्य प्रतीत होता है, फिर उसी मौन से सामना होता है, किंतु यह मौन एक अनुपम शांति का अहसास कराता है. बुद्ध कहते हैं, इसी शांति से करुणा का जन्म होगा. मानव होने की पराकाष्ठा है करुणा. यह तभी जन्मती है जब भीतर कोई भय नहीं बचता, न ही घृणा या द्वेष. किसी भी बुद्ध के लिए जगत में कोई भी दूसरा नहीं है, उनका ही एक फैलाव है. उनके प्रेम की धारा सहज ही जगत की ओर बहती है. घ्यान की गहराई में ही स्वयं का बोध होता है, इसीलिए ध्यान का इतना महत्व है.

Friday, January 17, 2020

सत्य समान तप नहीं दूजा



आज के बदलते हुए दौर में आरम्भ से ही बच्चों को योग और ध्यान से परिचित कराना आवश्यक बन गया है. बच्चों को सत्य आसानी से अनुभव में आता है क्योंकि उनके पास अहंकार की कोई बाधा नहीं होती, न ही वे हर बात को बुद्धि से तोलते हैं. वे सीधे हृदय से ही अनुभव करते हैं. बुद्ध कहते हैं, जीवन में सभी कुछ परस्पर निर्भर है और नश्वर है. प्रकृति निरन्तर परिवर्तित हो रही है. ध्यान की गहराई में जब देह, मन, भावना, विचार सब कुछ स्पष्ट बदलते हुए दिखाई देते हैं तब उनके द्वारा प्रभावित होने का डर नहीं रहता. सत्य कभी बदलता नहीं और जगत एक सा रहता नहीं, इस बात को जब भीतर अनुभव कर लिया जाता है तो जीवन सरल हो जाता है, प्रेममय हो जाता है और सारा विषाद खो जाता है. वर्तमान में टिकना ही जागरण है. वर्तमान के क्षण में ही जीवन से मुलाकात हो सकती है. जैसे ही मन अतीत या भविष्य में जाता है, सत्य से नाता टूट जाता है. अतीत जा चूका, वह मिथ्या है, भविष्य अभी आया नहीं, केवल यही क्षण सत्य है. इस क्षण में पुरे होश के साथ जीना ही साधक का कर्त्तव्य है. ऊर्जा का सरंक्षण तभी सम्भव है.

Thursday, November 7, 2019

गहरे पानी पैठिये


जगत में जिस किसी को भी जिस शै की तलाश है, उसे पाने के लिए खुद ही वह बन जाना होता है. इस जगत का अनोखा नियम है यह, यहाँ स्वयं होकर स्वयं को पाना होता है. तपता हुआ सूरज बन कर ही प्रकाश फैलाना सम्भव है, हिम शिखर हुए बिना शीतलता क्योंकर बिखरेगी, प्रेम यदि पाना है तो स्वयं प्रेम बने बिना कहाँ मिलेगा इसी तरह शांति का अनुभव भी शांत हुए बिना नहीं खिलेगा. आनन्दित हुए बिना ख़ुशी की कामना व्यर्थ है. हम कर्म के द्वारा ख़ुशी पाना चाहते हैं, यह हिसाब ही गलत है. कर्म जब आनंदित होकर किया जायेगा तभी वह निष्काम होगा। सन्त कहते हैं, वास्तव में इस जगत में हमें कुछ पाने जैसा क्या है, जो भी कीमती है, वह परमात्मा ने मन की गहराई में छिपा दिया है, अब कीमती वस्तु इधर-उधर तो रखी नहीं जा सकती न, हम बाहर से जब मुक्त हों तब मन में उतरें और उसे खोज लें, यही काम करने योग्य है.

Wednesday, November 6, 2019

तोरा मन दर्पण कहलाये



मन दर्पण है, परमात्मा  बिम्ब है, जीव प्रतिबिम्ब है. यदि मन का दर्पण स्वच्छ नहीं है तो प्रतिबिम्ब स्पष्ट नहीं पड़ेगा. संसार भी तब तक निर्दोष नहीं दिखेगा जब तक मन निर्मल नहीं होगा. हम अपने मन के दुर्भाव को जगत पर आरोपित कर देते हैं और व्यर्थ ही अन्यों को दोषी मानते हैं. जब भी हमने किसी की निंदा की है, अपना मत ही थोपा है. जगत जैसा है वैसा है, हम निर्णायक बनते हैं अपनी समझ के अनुसार, हमारी समझ न तो पूर्ण है न ही निर्मल है. यदि भीतर क्रोध है तो वह बाहर आने का मार्ग खोजेगा, यदि भीतर ईर्ष्या है तो वह रास्ता निकल लेगी. हम अन्यों को इसका कारण मानेंगे और एक दुष्चक्र में फंस जायेंगे. हमारी दृष्टि जैसी होगी सृष्टि वैसा ही रूप धर लेगी. यदि मन खाली हो अर्थात उसका कोई मत न हो तो दुनिया जैसी है वैसी ही दिखेगी. इसीलिए सन्त कहते हैं, अहंकार को त्यागे बिना शांति का अनुभव हो नहीं सकता. जब मन किसी भी धारणा, विचार या मान्यता से बंधा न हो तो जल की तरह बहता रहता है और उसमें अंतर की शांति का अनुभव सहज ही होता है .

Thursday, October 3, 2019

मौन से ही वह द्वार खुलेगा



संत कहते हैं, शब्दों का इतना ही कार्य है कि भीतर मौन को उत्पन्न कर दे. मौन लक्ष्य है, शब्द साधन हैं. जैसे यदि कोई व्यक्ति एक प्रश्न पूछता है, फिर जवाब की प्रतीक्षा में रुक जाता है, उस क्षण भीतर मौन है. जवाब देने वाला व्यक्ति शब्दों के माध्यम से ही उत्तर देता है, पर सुनने वाला यदि उत्तर से संतुष्ट नहीं होता, तो भीतर एक अन्य प्रश्न का जन्म होता है, मौन खंडित हो जाता है. यदि उत्तर उसे स्वीकार्य है तो फिर एक क्षण के लिए मौन का अनुभव उसे हो सकता है. मौन का यह क्षण इतना छोटा होता है कि हम उसे चूक ही जाते हैं. उस मौन से ही अस्तित्त्व का द्वार खुलता है. शास्त्रों का प्रयोजन इतना ही है कि हमें भीतर के उस मौन से परिचित करा दे, विचार का जन्म किसी न किसी इच्छा के कारण होता है, इसीलिए मन से इच्छाओं के त्याग पर इतना जोर दिया गया है. भीतर जब मौन होता है, तब मन खो जाता है, चेतना केवल अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित रहती है.

Wednesday, October 2, 2019

शब्दों के वह पार मिलेगा



समय परिवर्तन का ही दूसरा नाम है. जब मन थम जाता है, भीतर एक शांति और स्थिरता का अनुभव होता है, लगता है समय ठहर गया है. सारी सृष्टि मन से ही उत्पन्न होती है. मन में विचार जब तेजी से चल रहे हों, लगता है समय भी भाग रहा है. मन द्वारा किया गया परमात्मा का चिंतन हमें परमात्मा से दूर ही करता है, उसके निकट जाना हो तो हर चिंतना का त्याग करना होगा. शब्दों से जिसे जाना ही नहीं जा सकता ऐसा वह परम अस्तित्त्व है. इसीलिए वह समयातीत भी है और शब्दातीत भी, और उसका होना या न होना शब्दों द्वारा सिद्ध भी नहीं किया जा सकता और खंडित भी नहीं किया जा सकता.

Tuesday, October 1, 2019

थम कर पल भर बैठा हो जो



हम साध्य और साधन का भेद नहीं कर पाते इसलिए सदा असंतुष्ट बने रहते हैं. हमारे लिए जगत साध्य है और परमात्मा उसे प्राप्त करने का साधन, जबकि संसार को साधन बनाकर हमें स्वयं और परमात्मा के पास पहुँचना है. इस जगत में हम जो कुछ भी करते हैं वह कुछ न कुछ बनने अथवा पाने के लिए करते हैं. जो हमारे पास है, जैसे हम हैं, वह पर्याप्त नहीं है. यह दौड़ कभी खत्म होती नजर नहीं आती, संत कहते हैं यदि कोई थम जाये और जैसा वह है, जो उसके पास है, उसका मूल्यांकन करे अथवा तो कुछ भी न करे बस तटस्थ होकर रहे तो धीरे-धीरे वह प्रकट होने लगता है जो उसका मूल स्वभाव है. अपने स्वभाव में विश्राम पाते ही लगता है वह तो पहले से ही मिला हुआ है, जिसकी उसे तलाश है. इस ठहरने में एक बात और घटती है जो आवश्यक बदलाव है वह अपनेआप ही होने लगता है.