Tuesday, July 31, 2012

छूटें जब आग्रह तब वह आता है


जून २००३ 
देह को जन्मने के बाद जो नाम दिया गया है, वह तो बदला जा सकता है लेकिन तन के भीतर जहाँ से खुद के होने की सत्ता का भान होता है, वह अपरिवर्तनीय है. वही वास्तव में हम हैं, और वह सभी के भीतर है. सभी के भीतर वही चैतन्य है. उस का अनुभव करने के लिये ही हम शरण में जाते हैं, उसका अनुभव होने के बाद एक मदहोशी एक सात्विक मस्ती का अनुभव होता है, शरण में जाने का अर्थ है कोई आग्रह न रखना, अस्तित्त्व ने जो हमारे लिये तय किया है उसे स्वीकार करना, वैसे भी हम जो चाहते हैं, वह सभी होता कहाँ है और जो होता है वह भाता नहीं, जो भाता है वह टिकता नहीं फिर जो नहीं भाता वह भी नहीं टिकेगा तो अप्रिय को देखकर हमें परेशान होने की आवश्यकता नहीं है. सारे आग्रह जब छूट जाते हैं तो जीवन सहज हो जाता है, भीतर की गाठें खुलने लगती हैं, प्रकाश हो जाता है.    

Monday, July 30, 2012

खिला रहे भीतर इक सूरज


जून २००३ 
आदि शंकराचार्य ने प्रार्थना की थी कि उन्हें मोक्ष भी नहीं चाहिए, क्योंकि वे भक्ति को मोक्ष से बढ़कर मानते थे. भक्ति हमें जीते जी मोक्ष प्रदान करती है. भक्ति रूपी सूर्य जब भीतर के आकाश में खिलता है तो विकार अंधकार दूर होता है, ज्ञान कमल खिल जाता है. लेकिन यह सूर्य सदा खिला रहे पुनः हम मोह निशा में न सो जाएं इसके लिए सतत् प्रयास करना होता है. इस प्रयास में हम अकेले नहीं होते, सत्शास्त्रों का सँग, सदगुरु का प्रेम और सबसे बढ़कर हमारी आत्मा में स्थित परमात्मा की सद्प्रेरणा, सभी हमारे साथ हैं. हमारे भीतर अनंत प्रेम है वही रूप बदल-बदल कर काम, मोह तथा आसक्ति का रूप ले लेता है. जैसे शुद्ध आत्मा ही विकारी बुद्धि, चित्त व अहंकार का रूप ले लेती है. आकाश अपने आप में शुद्ध है अनंत है पर उस पर बादल छा जाते हैं तो उसका निज स्वरूप स्पष्ट नहीं होता. ऐसे ही प्रेम को हमें यदि उसके शुद्ध स्वरूप में जानना है तो काम, मोह और आसक्ति को मोड़ देना होगा, कामना भी उसी की, मोह भी उसी का, आसक्ति भी उसी में तो ये सभी प्रेम में बदल जाती हैं.    

Friday, July 27, 2012

शरण में उसकी आना होगा


 जून २००३ 
जिसका मन स्थिर नहीं है, वह क्षण-क्षण में रुष्ट-तुष्ट होता है, और ऐसे मन का विश्वास नहीं किया जा सकता. हम स्थिर मना बनें यही साधना का लक्ष्य है. भगवद् गीता का मूल उपदेश भी यही है. इसका उपाय भी कृष्ण ने बताया है, परमात्मा में मन लगाएं तो वह अपने आप ही जगत के उतार-चढ़ाव के द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है. एक बार कोई उसकी शरण में आ जाये वह हर पल उसे अपनी निगरानी में रखते हैं, उसके कुशल-क्षेम की जिम्मेदारी ले लेते हैं. फिर वह इधर-उधर जाना भी चाहे तो उसे रास नहीं आता. परमात्मा हमारे मन की गहराई में स्थित है, उसका स्मरण करते करते हम वहीं पहुंचते जाते हैं, जो ज्ञान, प्रेम और सामर्थ्य हमारे भीतर सुप्त है धीरे-धीरे प्रकट होने लगता है. हम वर्तमान में रहना सीख जाते हैं, क्योंकि तब भूत या भविष्य का कोई अर्थ नहीं रह जाता, हम थे, हम हैं, हम रहेंगे यह भाव दृढ़ होता जाता है. तब यह छोटे-छोटे ताप आदि हमें हिला नहीं पाते. परम रहस्य स्वयं खुलने लगते हैं, भीतर-बाहर उसी एक परमात्मा की सत्ता का दर्शन होता है. उसका प्रेम अनुपम है, वह अवर्णनीय है, वह मात्र अनुभव से ही जाना जा सकता है. उसकी कृपा और सदगुरु का ज्ञान साधक की यही सबसे बड़ी पूंजी होती है.


अनोखे अनुभव


जून २००३ 
सदगुरु बादल प्रेम के हम पर बरसे आज, अंतर भीजी आत्मा हरि भई वह आज !
उसे पुकारो तो वह एक क्षण की भी देर नहीं लगाता, भीतर बाहर हर जगह उसी का दीदार होता है, वह हमारे भीतर विद्यमान है, उसी की ज्योति से सारा विश्व प्रकाशित है, उसकी ही अध्यक्षता में परा व अपरा प्रकृति अपना कार्य कर रही है. वह हमें हर क्षण अपने निकट आने का आमन्त्रण देता है. उसने हमें अपने समकक्ष बनाया है. छोटे-छोटे सुखों के प्रलोभन, पुराने संस्कार हमें अपने पथ से विचलित करते हैं, पर निरंतर साधना से हम उसकी समीपता पा लेते हैं. हमारा व्यक्तिगत अनुभव वास्तव में हमारा नहीं है, महाचित्त का विशाल अनुभव है, हमारी आत्मा विशिष्ट नहीं है सभी के भीतर वही आत्मा है. सभी को अनुभव समान नहीं होते क्योंकि चित्त भिन्न भिन्न हैं.


Wednesday, July 25, 2012

चलती रहे यात्रा अविरत


जून २००३ 
हमारी यात्रा निर्विघ्न चलती रहे, इसका सतत् प्रयास करना है. सदगुरु की दी हुई औषधि का पान नियत समय पर करें, तभी यह जन्म जन्मान्तर का रोग दूर हो सकता है. यह भव रोग बहुत बलशाली है पर गुरुज्ञान उससे भी अधिक सबल है यदि उसे उपयोग में लायें. सब घटों में वह ईश्वर है, लेकिन गुरु के घट में वह प्रकट हुआ है. लकड़ी में जैसे अग्नि छुपी है, दूध में जैसे मक्खन है, वैसे ही सबके अंतर में निर्विकार परमात्म आनंद है. इस जगत की चाल ऐसी है कि ईश्वर सदा सर्वदा विद्यमान होते हुए भी सभी इसे समझ नहीं पाते. वही इस पथ का अधिकारी है जो संसार की असारता को जानकर उसके पीछे छिपे रहस्यों को जानना चाहता है, जो इस भाग-दौड़, आपाधापी से ऊब कर कुछ ऐसा पाना चाहता है, जो सदा एक सा है, जो परम है.

प्रभुता से प्रभु दूर


जून २००३ 
मन जब वर्तमान में नहीं होता तो चिंता आकर घेर लेती है. वर्तमान में अपार शक्ति है, इस क्षण में यदि मन टिक जाये तो मन स्थिर ही नहीं रहता बल्कि निर्दोष हो जाता है. सहज शांति का अनुभव होता है. ‘लघुता से प्रभुता मिले, प्रभुता से प्रभु दूर’ संभवतः जब हम विनम्र होते हैं तभी वर्तमान में टिक पाते हैं, जैसे ही अहंकार आ जाता है तो मन भूत या भविष्य की उलझनों में फँस जाता है. भगवद् अनुभव से हम वंचित रह जाते हैं. हम ईश्वर की कृपा के लिये लालायित रहते हैं लेकिन एक बार जब कृपा का अनुभव होने लगता है तो उसे भूल जाते हैं. उसकी कृपा का आनंद ही हमें उसकी कृपा से वंचित कर देता है तभी कृष्ण ने गोपियों को अपना वियोग दिया था, ताकि वे उसे भूलें नहीं.
कभी-कभी किसी से कोई काम कराने के लिए हम क्रोध का आश्रय लेते हैं, यदि भीतर प्रेम है और सजग रहकर केवल ऊपर से क्रोध कर रहे हैं तब भी इसका बीज कहीं अंदर है, तभी यह संभव है, क्षणिक क्रोध भी तभी होता है जब भीतर इसका संस्कार हो. संस्कार को जड़ से मिटाए बिना शाश्वत सुख का अनुभव नहीं हो सकता, सजगता ही इसके लिये साधन है.

Tuesday, July 24, 2012

अनुशासन जीवन में सौंदर्य भरता है


जून २००३ 
जीवन जीना एक कला है और जीवन में अनुशासन रखना भी. प्रकृति के सारे कार्य अपने निर्धारित समय पर सम्पन्न होते हैं, एक पल के लिये भी वह नहीं चूकती, लेकिन मानव सदा आपने प्रमाद भरे मन के कारण चूक जाता है. ज्ञान ही उसका एक मात्र आधार है जिस पर उसे अपने जीवन की इमारत को खड़ा करना है, जनक को ज्ञान हुआ तो वे विदेही कहलाये, यह ज्ञान कि वह मरणधर्मा शरीर नहीं है, अमर ऊर्जा हैं, कि यह तन जो हर क्षण क्षय की ओर बढ़ रहा है, सारी शक्ति और समय का हरण कर लेता है, इसे स्वस्थ रखने, सजाने, संवारने, खिलाने-पिलाने में ही सारा समय नष्ट न करके आत्मा को पुष्ट बनाएँ. आत्मा की पुष्टता हमारे मन पर निर्भर करती है, मन जो खाली हो, जगत के हित की बात सोचता हो, प्रेम से परिपूर्ण हो. ऐसा मन हमें व्यर्थ के कार्यों से बचाता है, शक्ति का अपव्यय नहीं होता. उस समय व शक्ति का उपयोग ही हम ध्यान में, सत्शास्त्रों के अध्ययन में लगा सकते हैं. सुमिरन में लगा सकते हैं.