संत कहते हैं, शब्दों का इतना ही
कार्य है कि भीतर मौन को उत्पन्न कर दे. मौन लक्ष्य है, शब्द साधन हैं. जैसे यदि कोई
व्यक्ति एक प्रश्न पूछता है, फिर जवाब की प्रतीक्षा में रुक जाता है, उस क्षण भीतर
मौन है. जवाब देने वाला व्यक्ति शब्दों के माध्यम से ही उत्तर देता है, पर सुनने
वाला यदि उत्तर से संतुष्ट नहीं होता, तो भीतर एक अन्य प्रश्न का जन्म होता है,
मौन खंडित हो जाता है. यदि उत्तर उसे स्वीकार्य है तो फिर एक क्षण के लिए मौन का
अनुभव उसे हो सकता है. मौन का यह क्षण इतना छोटा होता है कि हम उसे चूक ही जाते हैं.
उस मौन से ही अस्तित्त्व का द्वार खुलता है. शास्त्रों का प्रयोजन इतना ही है कि
हमें भीतर के उस मौन से परिचित करा दे, विचार का जन्म किसी न किसी इच्छा के कारण
होता है, इसीलिए मन से इच्छाओं के त्याग पर इतना जोर दिया गया है. भीतर जब मौन
होता है, तब मन खो जाता है, चेतना केवल अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित रहती है.
Thursday, October 3, 2019
Wednesday, October 2, 2019
शब्दों के वह पार मिलेगा
समय परिवर्तन का ही दूसरा नाम है.
जब मन थम जाता है, भीतर एक शांति और स्थिरता का अनुभव होता है, लगता है समय ठहर गया
है. सारी सृष्टि मन से ही उत्पन्न होती है. मन में विचार जब तेजी से चल रहे हों,
लगता है समय भी भाग रहा है. मन द्वारा किया गया परमात्मा का चिंतन हमें परमात्मा
से दूर ही करता है, उसके निकट जाना हो तो हर चिंतना का त्याग करना होगा. शब्दों से
जिसे जाना ही नहीं जा सकता ऐसा वह परम अस्तित्त्व है. इसीलिए वह समयातीत भी है और
शब्दातीत भी, और उसका होना या न होना शब्दों द्वारा सिद्ध भी नहीं किया जा सकता और
खंडित भी नहीं किया जा सकता.
Tuesday, October 1, 2019
थम कर पल भर बैठा हो जो
हम साध्य और साधन का भेद नहीं कर
पाते इसलिए सदा असंतुष्ट बने रहते हैं. हमारे लिए जगत साध्य है और परमात्मा उसे
प्राप्त करने का साधन, जबकि संसार को साधन बनाकर हमें स्वयं और परमात्मा के पास
पहुँचना है. इस जगत में हम जो कुछ भी करते हैं वह कुछ न कुछ बनने अथवा पाने के लिए
करते हैं. जो हमारे पास है, जैसे हम हैं, वह पर्याप्त नहीं है. यह दौड़ कभी खत्म
होती नजर नहीं आती, संत कहते हैं यदि कोई थम जाये और जैसा वह है, जो उसके पास है,
उसका मूल्यांकन करे अथवा तो कुछ भी न करे बस तटस्थ होकर रहे तो धीरे-धीरे वह प्रकट
होने लगता है जो उसका मूल स्वभाव है. अपने स्वभाव में विश्राम पाते ही लगता है वह
तो पहले से ही मिला हुआ है, जिसकी उसे तलाश है. इस ठहरने में एक बात और घटती है जो
आवश्यक बदलाव है वह अपनेआप ही होने लगता है.
Sunday, September 29, 2019
अमन हुआ जो मुक्त वही है
जब तक मन संकुचित है वह डोलेगा
ही, ऐसा मन अशांति का ही दूसरा नाम है. जो मन दिखावा करता है, तुलना करता है, वह
उद्ग्विन हुए बिना नहीं रहेगा. स्वार्थ से भरा हुआ मन भी अकुलाहट से भर जाता है. विशाल
मन का अर्थ है अमनी भाव में आ जाना. संत कहते हैं अमन हुए बिना समाधान नहीं मिलता.
क्योंकि मन होने का अर्थ ही है अहंता का होना, जो है वह अपने अस्तित्त्व की रक्षा
के लिए अन्य का विरोध करेगा ही, इसीलिए सिर काटने और घर जलाने की बात कबीर कह गये
हैं. मन के मिटे बिना आत्मिक शांति का अनुभव नहीं किया जा सकता. चेतना जब पूर्ण
विश्राम में होती है, अर्थात समाधि में होती है, तब मन खो जाता है. जब हम
विचारधारा में बह जाते हैं मन के प्रभाव में होते हैं, जब हम विचार के साक्षी होते
हैं, अप्रभावित बने रह सकते हैं. किंतु समाधि का अनुभव शून्यता में ही किया जा
सकता है.
Monday, September 23, 2019
जिस अंतर में प्रेम जगा हो
हम सबने
सुना है परमात्मा प्रेम है, इसका अर्थ हुआ जो नास्तिक हैं उनके जीवन में प्रेम
नहीं है, पर ऐसा तो जान नहीं पड़ता. प्रेम तो जीव-जन्तुओं में भी होता है, हर मानव
का पोषण प्रेम से ही होता है. परमात्मा जिस प्रेम से बना है, वह खालिस है, शुद्ध
है, ऐसा स्वर्ण है जिसमें कोई मिलावट नहीं है, और संसार में जिसे हम प्रेम कहते
हैं वह मोह, क्रोध, ईर्ष्या जैसे अवगुणों से मिश्रित है. परमात्मा सबसे समान प्रेम
करता है, हम केवल अपनों को ही करते हैं, अपनों की परिभाषा किसी के लिए सारा जगत होती
है, किसी के लिए उसका देश होती है, किसी के लिए मात्र उसका परिवार होती है तो किसी
के लिए केवल उसकी देह और मन ही होती है. परमात्मा जिस प्रेम का नाम है वह अनंत है,
उसमें सरलता है, सहजता है. वह सदा है, प्रतिपल उसके बढ़ने का अनुभव होता है. संसार
का प्रेम घटता-बढ़ता रहता है. जिसने अपने मन को इतना विशाल बना लिया है कि उसमें सब
कुछ समा जाये वही कोई सुहृद उस परम प्रेम का अनुभव करता है.
Sunday, September 22, 2019
भवचक्र से पार हुआ जो
यह दुनिया मानो एक
रंगशाला है, जिसमें अलग-अलग देश अपनी भूमिकाएं निभा रहे हैं, छोटे देश, बड़े देश,
बीच के देश. कुछ युद्ध के लिए लालायित देश, कुछ शांति प्रिय देश....सभी की
अपनी-अपनी भूमिका है जिसे वह निभा रहे हैं. निर्देशक कहीं नजर तो नहीं आता पर वह
है जरूर, सभी सोचते हैं जिसमें उनका लाभ हो ऐसे कदम उठायें, उसके लिए अन्य देशों
की हानि भी उन्हें मंजूर है. इस खेल-तमाशे में इतना जोश जनता के भीतर भर दिया जाता
है कि अक्सर वह अपना होश ही गंवा बैठती है. अनेक कष्टों का सामना भी वह कर लेती है
जब उसे राष्ट्रहित और धर्म के नाम पर भावनात्मक रूप से उकसाया जाता है. आज सारी
दुनिया में यह हो रहा है, न जाने कितनी बार मानव सभ्यता अपने विकास की चरम सीमा पर
पहुँची पर इसी उन्माद के कारण उसका विनाश हुआ. यहाँ भीड़ को प्रेरित करके कुछ भी
कराया जा सकता है, व्यक्ति की बात कौन सुनता है. जब कोई एक देश, दूसरे के तेल
संस्थानों पर बेवजह हमला कर देता है, और कोई इसकी जिम्मेदारी भी नहीं लेता, तो यही
लगता है कि मानव की बुद्धिहीनता की कोई सीमा नहीं है. यहाँ ज्ञान भी अनंत है और
अज्ञान भी, यहाँ एक ही सम्प्रदाय के लोग आपस में तो लड़ते रहते हैं पर दूसरे सम्प्रदाय
के खिलाफ बोलने से भी गुरेज नहीं करते. संत
कहते हैं, सम्प्रदाय छिलका है धर्म भीतर का फल है, पर ये छिलके पर ही अटके हुए हैं,
वास्तविक धर्म से तो इनका अभी वास्ता ही नहीं पड़ा शायद इसी को हमारे शास्त्रों में
लीला कहा गया है.
Friday, September 20, 2019
तू ही जाननहार जगत में
जगत में दो ही तो
हैं एक नाम-रूप का अनंत विस्तार और दूसरा उसे जानने वाला, एक दृश्य दूसरा दृष्टा. हम
यदि दृश्य के साथ एक होकर स्वयं को देखते हैं तो सदा विचलित रहते हैं, क्योंकि
दृश्य सदा ही बदल रहा है. साथ ही जानने वाले से हम विलग ही रह जाते हैं. यदि
द्रष्टा के साथ एक होकर रहते हैं तो दृश्य हम पर प्रभाव नहीं डालता, पर दृश्य की
असलियत को हम जान लेते हैं. जो सदा बदलने वाला है उसकी मैत्री हमें कठिनाई में डाल
दे इसमें कैसा आश्चर्य?. जिसका स्वभाव ही अचल है उसका सान्निध्य पाना ही योग में
स्थित रहना है.
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