Sunday, December 8, 2013

शरण में आये हैं हम तुम्हारी

अप्रैल २००५
गुरु हमारी संवेदनाओं और भावनाओं को परिष्कृत करते है. वे हमें प्रकाश, सत्य और अमरता की ओर ले जाना चाहते हैं. मन को देह से ऊपर उठाना सिखाते हैं. मन के पार जाते ही भीतर अपने आप परिवर्तन होने लगता है. हमारे भीतर सत्य को जानने के लिए जो कुछ भी होता है अपने आप ही होता है, वह कृपा के कारण ही है, हम केवल साक्षी मात्र बनते हैं. हमारा कार्य केवल शरण में जाना है, हमारे इर्द-गिर्द न जाने कितने बंधन घेरा डाले खड़े हैं, इन बन्धनों को तोड़ना हम नहीं जानते. अपने मन के हाथों हम बार-बार दुःख पाते हैं. अपनों से लड़ाई करना कितना कठिन है. सद्गुरु हमारे मन को मजबूत करते हैं, उसे सही मार्ग देते हैं, ध्यान, प्राणायाम की विधियाँ बताते हैं. मन तब सजग होता है, नित्य-अनित्य को पहचानने लगता है, भीतर प्रज्ञा जगती है, हम आत्मा को जानने के अधिकारी बनते हैं.

Saturday, December 7, 2013

तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्हीं हो


हम जिसका चिंतन करते हैं वैसे ही हो जाते हैं. यदि हम कृष्ण का चिन्तन करते हैं तो धीरे-धीरे उसके गुणों को धारण करने लगते हैं. कृष्ण को सात्विक भोजन पसंद था, पसंद है और पसंद रहेगा, उसे संगीत से प्रेम है, वह निडर है, प्रेमी है, नटखट है, विनोदी है, वह सुन्दरता का सिरमौर है. वह क्या नहीं है, ऐसा होने पर भी हमसे दूर नहीं जाता, निकटस्थ है, भक्तों के हृदय में स्वयं को प्रकट कर देता है. वह आत्मा का सखा है, गुणात्मक रूप से आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं. मन व बुद्धि सीमित हैं जो उसे नहीं जान पाते, लेकिन मन द्वारा किया गया उसका चिन्तन मन को शुद्ध बनाता है, शुद्ध मन में आत्मा की झलक मिलती है. तब मानव यह जानने लगता है जो दिख रहा है वह अस्थिर है, जो अदृश्य है वही वास्तविक है. आत्मा की ही सत्ता से मन व बुद्धि कार्य कर रहे हैं, प्रमुख वही है और यह आत्मा, परमात्मा का अंश है सो सभी कुछ उसी का ही हुआ ! 


Friday, December 6, 2013

निज गरिमा में रहना सीखें

अप्रैल २००५ 
हम दुखकार हैं, जैसे चित्रकार चित्र बनाता है, कुम्भकार घट बनाता है, उसी प्रकार हम जीवन में नित नये दुखों का निर्माण करते हैं. फिर स्वयं ही सहानुभूति के पात्र बनते हैं, अपनी भी और दूसरों की भी. परमात्मा के सम्मुख जाकर दुखों से छुड़ाने के लिए प्रार्थना करते हैं, वह भी सोचता होगा, मैंने तो मानव को समर्थ बनाया है, वह अपनी शक्ति भुलाकर क्यों दुखी होता है. ईश्वर प्रेम व शांति की मूरत है, जब वह अपनी गरिमा में रह सकता है तो फिर मानव क्यों नहीं रह सकता. देह, मन, बुद्धि जो हमारे लिए साधन रूप थे, हमारी सेवा के लिए मिले थे, हमसे सेवा मांगते हैं. शुद्र, वैश्य आदि कोई जन्म से नहीं होता, जो देह को ही आत्मा मानता है, वह शुद्र है, जो मन, बुद्धि तथा अहंकार को आत्मा मानते हैं वे क्षत्रिय या वैश्य हो सकते हैं, आत्मा को ही आत्मा जानने वाला ब्राह्मण है, ब्रह्म को जानने का अधिकारी है, तथा उसके आनन्द को पा सकता है. ऐसा आनन्द जो कभी घटता-बढ़ता नहीं, जो सापेक्ष नहीं है, जो अनंत मात्रा का है, जो अनंत काल के लिए है, जिसे पाने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता, जो हमें सहज ही प्राप्त है.   


Thursday, December 5, 2013

ऐसे जग सुंदर हो जाये

हमारा तन स्वस्थ रहे ताकि हम साधना कर सकें, साधना करें ताकि मन स्वस्थ रहे, मन स्वस्थ रहे ताकि अंतर साधना हो सके, अंतर साधना हो ताकि मन निर्मल हो, मन निर्मल हो ताकि उसमें परम सत्य का प्रकाश हो, परम सत्य को पायें क्यों कि सत्य ही शिव और सुंदर है, शिव को पायें ताकि हम सभी के लिए सुखद हो जाएँ, हमारे होने से जड़-चेतन किसी को कोई उद्वेग न हो, न ही हमें किसी से कोई उद्वेग हो. सौन्दर्य को पाकर हम चारों ओर सुन्दरता बिखेरें. कुछ भी ऐसा न कहें, सोचें, न करें जो इस जगत को क्षण भर के लिए भी असुन्दर बना दे. ईश्वर की इस सुंदर सृष्टि को देख-देख हम चकित होते हैं, विभोर होते हैं, भीतर प्रेम का अनुभव करते हैं तो और भी चकित होते हैं, कैसे अद्भुत भाव भीतर जगते हैं, यह क्या है? कौन है? किसे अनुभव होता है? कौन अनुभव कराता है? कौन प्रेम देता है? कौन प्रेम लेता है ? ये सारे भाव शब्दों की पकड़ में नहीं आते. संतों की आँखों से ये पल-पल झरते हैं. 

Wednesday, December 4, 2013

मन के विश्राम में आत्मा का राम है

अप्रैल २००५ 
हम सभी का लक्ष्य आनन्द है, शांति है, प्रेम है, ऐसा प्रेम जो सदा एक सा हो, सतत् आनन्द तथा कभी न छूटने वाली शांति... और यही हमारा मूल स्वभाव है, प्रभु ने हमारी रचना इन्हीं तत्वों से की है, पर काल के प्रभाव से हम इस बात को भूल गये हैं और बाहर इन्हीं की खोज करते हैं, ये कभी तो हमें प्रयत्न पूर्वक मिल जाते हैं कभी छूट जाते हैं, सुख-दुःख के चक्र में हम निरंतर घूमते रहते हैं. हम सोचते हैं ये ऐसी वस्तुएं हैं जिनके लिए बड़ा ही श्रम करना पड़ता है, फिर इन्हें पाना होता है. पर ईश्वर अवश्य ही हमारी इस मूर्खता पर मन ही मन हँसता होगा, वह जब देखता होगा, इनकी प्राप्ति के लिए लोग न जाने कितने व्रत, उपवास, जप-तप करते हैं, पर अपने स्वभाव में कभी नहीं ठरते. वह सोचता होगा इन्हें भटक कर अंततः तो घर लौटना ही है. ये जब ईश्वर को भी खोज रहे होते हैं तो उससे इन्हीं की मांग करना चाहते हैं. ईश्वर, आनन्द, शांति और प्रेम सब एक के ही अनेक नाम हैं, ये तो हरेक के भीतर हैं पर मानव की दौड़ बाहर ही बाहर है, भीतर की उसे खबर ही नहीं, भीतर के नाम पर उसके पास कामनाओं से भरा मन है, वही तो सबसे बड़ी बाधा है भीतर जाने में ! 

Tuesday, December 3, 2013

पार हुआ जो तीन गुणों से

अप्रैल २००५ 
ईश्वर अकारण दयालु है, परम मित्र है, परम स्नेही है, सुह्रद है, हितैषी है, अपना है और सदा हमारे साथ है. इतना सब होते हुए भी मानव दुखी है, यह कैसा विरोधाभास है, कैसे विडम्बना है ? हम ईश्वर की तथाकथित भक्ति तो करते हैं पर उससे दूर-दूर ही रहते हैं उससे डरते हैं, या तो अपने आप से डरते हैं या ईश्वर इतना शुद्ध है कि हमारे भीतर की अशुद्धता उसके निकट  जाते ही स्पष्ट दिखाई देने लगती है, या हम ईश्वर से दूर-दूर का ही नाता रखना चाहते हैं, हम डरते हैं कि प्रभु हमसे कुछ छीन न ले, हम निरे बच्चों का सा व्यवहार करते हैं उसके सम्मुख ! हम नाटक करते हैं, स्वयं को धोखा देते हैं, क्योंकि उसे तो धोखा दिया ही नहीं जा सकता. कृष्ण कहते हैं कि प्रकृति अपने गुणों के अनुसार ही वर्तती है और गुणों के वशीभूत हुए प्राणी भिन्न-भिन्न व्यवहार करते हैं, और यह गुण उन्हें कर्मों के अनुसार मिलते हैं, हमारा अधिकार कर्म करने तक ही है. पूर्व आदतों के अनुसार ही यदि कर्म करते रहे तो जीवन पूर्ववत ही बना रहेगा, ध्यान से हम संस्कारों को बदल सकते हैं जिनसे सात्विक स्वभाव को प्रप्त होंगे. गुणों को बदलना हमारे हाथ है यह जानने के बाद कौन है जो प्रकृति के वशीभूत होकर कर्म करेगा, सजग व्यक्ति अपना निर्माता स्वयं होता है.


Sunday, December 1, 2013

आज तोड़ दें सब जंजीरें

अप्रैल २००५ 
अनंत धैर्य तथा अखंड भरोसा हमें शुभ की ओर ले जाता है. हमारा मन जो आज हमारा शत्रु प्रतीत होता है, साधना की अग्नि में तपकर मित्र हो जाता है. फिर वह स्वतः ही परम की ओर जाता है, आत्मा के सान्निध्य का रस प्राप्त करने के बाद  पुनः झूठे रस को पाकर संतुष्ट नहीं होता, बल्कि उसी दिव्य रस को चखना चाहता है. वर्तमान के क्षण में वही दिव्यता हमें मिलती है, हर आने वाला क्षण अपने भीतर अनंत प्रेम छिपाए है. शुद्ध वर्तमान हमें मुक्त कर देता है. उसमें रहने वाला मन एक उन्मुक्त पंछी की तरह खुले गगन में उड़ान भर सकता है, अन्यथा भूत तथा भावी की जंजीरें बंधीं हो तो पंछी कैसे उड़ेगा. अतीत का पश्चाताप तथा भविष्य की आशंका की जंजीरें बांध दें तो वह नहीं उड़ पायेगा, ज्ञान की तलवार से इन्हें काट सकते हैं. भूत कभी लौट कर नहीं आता और भविष्य अनिश्चित है, जिन पर न हमारा वश है और जो न हमें तृप्त कर सकते हैं. जिसके मन में पूर्ण की चाह उठे वह सदा वर्तमान में ही रहता है वही ज्ञानी है और वही पूर्ण तृप्ति का अनुभव करता है.