जो कर्म में अकर्म को
देखता है और अकर्म में कर्म को देखता है, वही कर्मयोगी है. जो सबमें आत्मा को
देखता है और आत्मा में सबको देखता है. वास्तव में वही देखता है. भगवद गीता के ये
दो श्लोक कितने अद्भुत हैं. हम जगत में जितने भी कर्म करें उनका कर्ता स्वयं को न
मानें, सभी कर्म प्रकृति के गुणों के अनुसार हमसे हो रहे हैं और जब हम ध्यान में
हों अर्थात कुछ भी न कर रहे हों तो भी हमसे बहुत कुछ हो रहा होता है. जो चेतना एक
के भीतर है वही सबके भीतर है तथा सब कुछ उसी के भीतर है.
Thursday, January 31, 2013
Wednesday, January 30, 2013
ज्ञान के पीछे सुख छिपा है
फरवरी २००४
हममें से हर कोई प्रेम का आदान-प्रदान करना चाहता है, प्रेम ही जीवन का आधार है, पर
जब हमारा प्रेम जगत पर आश्रित होता है, तो वह मोह कहलाता है और दुखदायी होता है. क्योंकि
जगत बदलने वाला है, वह अनुकूल भी हो सकता है और प्रतिकूल भी. प्रेम का प्रतिदान
मिल भी सकता है और उसका अपमान भी हो सकता है. वह प्रेम जब भक्ति बन जाता है तो
हजार गुणा होकर हमें वापस मिलता है. ईश्वर उसे तत्क्षण स्वीकारते हैं और हमें भी
अपना प्रेम देते हैं. संत हर क्षण उस प्रेम का पान करते रहते हैं. साधना का ध्येय
उस परम प्रेम को पाना ही तो है, जहाँ उसके प्रति भक्ति की अखंड धारा प्रतिपल हमारे
भीतर बहती रहे. हम क्षण-क्षण उस प्रसाद को पाते रहें और जगत में लुटाते रहें, और
वह क्षमता हममें से हर एक के पास है, उसकी चाबी हमने खो दी है जो हम स्वयं ही ढूँढ
सकते हैं. समाज में यदि सच्चा परिवर्तन लाना है तो हर परिवार में ऐसे दृढ भक्त हों
जो ज्ञान और प्रेम के द्वारा अपने आस-पास के वातावरण को शांत बनाएँ. जहां ज्ञान
होता है सुख वहीं होता है. सुख की कामना की तो दुःख मिलने ही वाला है. ज्ञान की
कामना की तो सुख बरसने लगता है.
Sunday, January 27, 2013
जगा रहे जो मन अपना
फरवरी २००४
हमारा जो कृत्य हमारे लिए या
दूसरों के लिए किसी दुःख का कारण बने वह पाप है और जो सुख दे वह पुण्य है. दुखों
से मुक्ति ही अध्यात्म का लक्ष्य है, इसके लिए पाप से बचना होगा अर्थात चित्त का
शोधन करना होगा, चित्त कब विक्षुब्ध होता है, क्यों होता है, हमारे कारण अन्यों का
चित्त तो विक्षुब्ध नहीं हो रहा इसका ध्यान रखना है. मन ही पुण्य शील है और मन ही
पाप करवाता है. जब हम असजग होते हैं तभी दुःख पैदा करते हैं. मन को गहराई से देखें
तो यह अमनी भाव में चला जाता है वहाँ न पुण्य है न पाप. तब मन संवेदनशील होता है,
जागरूक होता है, इस जगत की सच्चाइयों को भीतर से जान लेता है, अनुभव के द्वारा
पाया ज्ञान ही स्थायी होता है. तब सारे संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं. अपने ही मन
के द्वारा बनाये गए कल्पना के जाल से मुक्ति का अनुभव होता है.
Wednesday, January 23, 2013
त्रितापों से मुक्त करेगा
फरवरी २००४
दुखों का कारण हिंसा है, संसार जो तीनों तापों से पीड़ित है, वह हिंसा के कारण ही,
हम मानसिक, वाचिक और कायिक तीनों प्रकार की हिंसा के शिकार होते हैं तथा दूसरों को
करते हैं. परिवार में दुःख का कारण वाचिक हिंसा है पर इसका आरम्भ तो मन से ही होता
है तथा अंत भी मानसिक संताप में होता है. विरोध, द्वंद्व, आग्रह तथा अपेक्षा सभी
सूक्ष्म हिंसा का रूप हैं. शरणागत होकर हम इनसे मुक्त हो सकते हैं. हमारा मन एक
क्षण के लिए भी विक्षुब्ध होता है या झुंझलाता है तो हम हिंसा कर ही रहे होते हैं.
हमरा मूल स्वरूप प्रेममय है, आनंद हमारा वस्त्र है और शांति हमारा आश्रय. फिर दुःख
से हमारा परिचय कौन कराता है, दुःख जो बाहर से हमें खोजता है, भीतर तो दुःख कहीं
नहीं है. मन जो बाहर से आया है, अधैर्य सिखाता है, असहिष्णु बनाता है, हमें स्वयं
से दूर करता है, स्वयं को अच्छा मानने के कारण अन्यों को बुरा मानता है. अपने
दोषों को नजरंदाज करके अन्यों के दोषों को बढ़-चढ़ा कर देखता है. अपने ही बनाये
सपनों के महल का राजा बन बैठता है. ज्ञान हमें इसकी दासता से बचने का उपाय बताता
है. ज्ञान से ही हिंसामुक्त समाज की रचना हो सकती है, इसकी शुरुआत स्वयं से ही
करनी होगी.
Tuesday, January 22, 2013
अपने ही घर जाना है
जनवरी २००४
हमारे जीवन में अगले पल क्या घटने वाला है इसकी खबर हमें नहीं होती, हम घटनाओं के
साक्षी मात्र होते हैं, पर इस बात से हम अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकते. यदि
उस क्षण हम सजग नहीं रहे जहां से घटनाओं का क्रम बदलने वाला था तो बात हमारे हाथ
से निकल जाती है, पछताने के सिवाय फिर कुछ नहीं रहता. मूलतः हम सभी एक ही वस्तु के
पीछे भाग रहे हैं, वह है चित्त की प्रसन्नता और विश्रांति ! वह हमें अपने घर में
ही मिलती है, अध्यात्म हमारा घर है. पर जैसे हम सफर से लौटते हैं तो पहले घर को
स्वच्छ करते हैं, वैसे ही साधना द्वारा चेतना की शुभ्र नीलिमा को जागृत करना है.
जैसे घर की जमीन में कोई खजाना मिले तो उस पर हमारा ही अधिकार होता है, वैसे ही
भीतर के आनंद पर हमारा सहज ही अधिकार है, जिसके मिलने पर सजगता स्वभाव का अंग हो
जाती है.
Monday, January 21, 2013
सत्यम शिवम सुन्दरम ही अध्यात्म है
फरवरी २००४
हम पदार्थ और ऊर्जा
दोनों से बने हैं. शरीर पदार्थ से बना है, और मन ऊर्जा से, शरीर को स्वस्थ रखने के
लिए हम अनेकों प्रयत्न करते हैं वैसे ही मन को स्वस्थ करने के लिए ही अध्यात्म है.
सौंदर्य प्रियता, सत्य के लिए प्रेम, शुभ के प्रति श्रद्धा ही अध्यात्म है. जब हम
अध्यात्म से दूर होते हैं तो क्रोध, मोह तथा विस्मृति के शिकार होते हैं, तब जीवन
एक दुखद श्रंखला बन जाता है, जिसमें थोड़ी-थोड़ी दूर पर सुख आता तो है पर टिकता
नहीं. सहज प्राप्य प्रसन्नता ही शाश्वत सुख है, जो अध्यात्म की साधना से ही मिलता
है.
Sunday, January 20, 2013
बलिहारी गुरु आपने
फरवरी २००४
अंतररूपी गहन तिमिर को हटाने सदगुरु रूप सूर्य जीवन में आता है. इस सूर्य को अंतर के
प्रेमाश्रुओं का अर्क चढ़ाना है. भावना का तिलक लगाना है, अपने विचार पुष्पों को
उन्हें समर्पित करना है. उनका जीवन जो शुद्ध मणि के समान चमचम चमक रहा है हमें सहज
ही उनकी और आकर्षित करता है, उन आँखों की मस्ती हम पर असर डालती है. वह हमें हमारा
परिचय कराने आते हैं, मनों पर छाये कल्पनाओं के जाल को तोड़ने आते हैं, वह
सत्यस्वरूप हैं, उनमें हम अपने अंतर की कमजोरियों को स्पष्ट रूप से देख पाते हैं,
भय, हिंसा और लोभ को जान पाते हैं. यह जानकारी ही भीतर एक परिवर्तन लाती है. सहज
रूप से हमरे स्व का विस्तार होने लगता है और भीतर का आनंद प्रकट होने लगता है.
Subscribe to:
Posts (Atom)